नहीं रहे वाजपेयी, अटल रहेगी विरासत।

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Ashish Kedia

 

भारत के एक स्वर्णीम इतिहास का आज अंत हो गया। आज़ादी के 72वें जश्न की अगले ही दिन माँ भारती का एक तेजस्वी सपूत चिर निद्रा में सो गया।

प्रखर तेज, ओजस्वी वाणी, कड़े निर्णय लेने की बेजोड़ छमता और गठबंधन की राजनीति के पुरोधा, अटल बिहारी वाजपेयी आधुनिक भारतीय इतिहास के सबसे ऊंचे कद के नेताओं में से एक रहे।

राजनीतिक विरोधि भी अटल बिहारी वाजपेयी की नेतृत्व क्षमता के कायल रहे। अटल जब तक सक्रिय राजनीति में रहे ध्रुव तारे की तरह चमकते रहे। आज जब वो संसार को विदा कर गए तो अपने पीछे छोड़ गए हैं ऐसी विरासत जिसे भारतीय जनमानस सदियों तक किस्सों – कहानियों में याद कर गौरवान्वित होता रहेगा।

भारत को परमाणु शक्ति संपन्न बनाने वाला ये बड़ा नेता आज भले इस दुनिया में नहीं रहा पर उनका जीवन चरित्र वर्षों – वर्षों तक जनहित की राजनीति को प्रभावित और परिभाषित करता रहेगा।

लगभग चार दशक के लंबे राजनीतिक जीवन में अटल जी अनेकों उतार चढ़ाव देखें, पर उनकी कार्यकुशलता और देशहित में लिए गए फैसलों ने उन्हें भारतीय जनमानस के बीच एक अभूतपूर्व स्थान प्रदान किया। 10 बार लोकसभा और 2 बार राज्यसभा सदस्य रहे वाजपेयी ने देश का सबसे बड़ा राजनीतिक पद लंबे संघर्ष के बाद हासिल किया।

उनके नेतृत्व में बनी पहली सरकार के 13 दिन बाद ही गिर जाने के बाद, अटल नई ऊर्जा और रणनीति के साथ राजनीति में उतरे और 1998 से 2004 तक प्रधानमंत्री रहे।

शांति के लिए उन्होंने बस में बैठ कर लाहौर तक का सफर तय किया तो कारगिल हमलों के दौरान सख़्त फ़ैसले लेने से भी नहीं चूके।

2004 के लोकसभा चुनावों में हुई हार के एक साल बाद ही वाजपेयी ने सक्रिय राजनीति से सन्यास की घोषणा कर दी। बीजेपी की कमान आडवाणी और प्रमोद महाजन के हाथों में सौंपते हुए अटल ने आगे चुनाव ना लड़ने का निर्णय स्पष्ट कर दिया।

6 फ़रवरी 2009 को वाजपेयी सीने में दर्द की शिकायत के साथ एम्स में भर्ती हुई और वेंटीलेटर पर रहने के बावजूद करोंङो भारतीयों की दुआओं के साथ सकुशल बाहर आए।

हालांकि आगे के सालों में पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी का स्वास्थ्य बिगड़ता रहा।

बीते 11 जून को उन्हें बढ़ती परेशनियों के बीच एम्स में भर्ती किया गया था और यहीं पर 16 अगस्त 2018 को उन्होंने आखिरी सांस ली।

राजनीतिक विरोधी और पूर्व कांग्रेसी प्रधानमंत्री ने लोकसभा में एक बार वाजपेयी को भारतीय राजनीति के भीष्म पितामह की संज्ञा दी थी। कवि हृदय वाजपेयी असल मायनो में राजनीति के शिखर पुरूष थे जिन्होंने ऐसा मुकाम हासिल किया जहाँ पहुँचना आने वाले वक्त में शायद ही किसी के लिए मुमकिन हो पाए।

अपनी कविता ‘मौत से ठन गयी’ में अटल जी ने लिखा था, ‘मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं।
मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ,
लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ?”

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