भारत की संस्कृति-सामाजिकता का अनूठा संगम है ग्रेटर नॉएडा का गणेश महोत्सव 

आशीष केडिया 

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भारत एक उत्सव प्रधान देश हैं। ‘सात वार में नौ त्यौहार’ वाले इस देश में फिर भी जीवन की भागदौड़ में सामाजिक उत्सव में लोगों की सहभागिता सिमट सी गई है। ऐसे समय में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा शुरू किये गए गणेश उत्सव की महत्ता और भी बढ़ जाती है।
125 सालों में यह महोत्सव महाराष्ट्र की चालों-खोलियों से निकल कर विस्तृत भारत के विभिन्न गली-मुहल्लों में बिखर गया है। उत्सव का स्वरुप और विलासता दोनों में वक़्त के साथ जरुरी बदलाव तो आए हैं परन्तु सामाजिक सहभागिता का मूल उद्देश्य कहाँ तक सिद्ध होता है ये समझना अत्यंत आवश्यक है। ऐसे महोत्सव से आज की युवा पीढ़ीका जुड़ना इस लिए भी आवश्यक है ताकि ऐसे आयोजनों की निरंतरता सदैव ऐसे ही बनी रहे।
उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नॉएडा में भी गणराज महाराष्ट्र मित्र मंडल द्वारा सम्राट मिहिर भोज पार्क के बाहर आयोजित गणेश-उत्सव में भारत की विशाल संस्कृति की झलक नजर आती है। कहीं हस्तशिल्प की विभिन्न वस्तुयें हैं तो कहीं महिलाओं-पुरुषों के लिए वस्त्र-साज-सज्जा के अन्य उत्पाद।
अब उत्सव मराठी है तो बम्बइया भेल भी मौजूद है और इस हाईटेक सिटी के निवासियों के लिए पिज़्ज़ा की भी व्यवस्था है।
प्रतिदिन संध्या आरती के बाद नित-नए सांस्कृतिक कार्यक्रम भी महोत्सव स्थल पर आयोजित किये जाते हैं जिसमें भी दोनों संस्कृतियों के मिलन का अद्भुत एहसास होता है।  जहाँ एक दिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश की मशहूर रागिनी की प्रस्तुति होती है वहीँ दूसरे दिन विलक्षण कलाकार महाराष्ट्र का अद्भुत लावणी नृत्य प्रस्तुत करते हैं।
इन आयोजनों से जहाँ एक तरफ महाराष्ट्र से यहाँ आ कर बसे लोगों को अपनी संस्कृति का पुनरसंस्मरण होता है वहीँ दूसरी ओर देश के कोने-कोने से आए लोगों को भी भारत की अनूठी विरासत से पहचान हो जाती है।
इसी सामाजिकता-सहभागिता और समन्वय का नाम ही गणेशमहोत्सव है।

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