हजारों आंदोलनों के गवाह जंतर-मंतर को शांत करने के लोकतांत्रिक मायने : अब कहाँ उठेगी आवाजें

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Lokesh Goswami | Rohit Sharma New Delhi :

जंतर-मंतर का प्रदर्शन स्थल, कुछ सौ मीटर तक सपाट सड़क का छोटा सा टुकड़ा भर नहीं, बल्कि देश की वह नब्ज है, जो बताती है कि दिल्ली के अंदर भी छोटे शहरों और गांवों में भारत बसता है। जहां सरकारों के गुलाबी दावों-वादों के इतर जमीनी हालात दूसरे हैं। इसके साथ ही दिल्ली को यह मजबूती से विश्वास दिलाती है कि अभावों और उपेक्षाओं के बावजूद बाकी देशवासियों की लोकतंत्र पर गहरी आस्था बरकरार है। उन्हें यह यकीन है कि बदलावों का रास्ता संसद के रास्ते ही निकलेगा। दिन दर्द और आक्रोश में गुजरता है तो यह सड़क रात उम्मीदें लिए सोती है। लेकिन अब एनजीटी के आदेश के बाद जंतर मंतर अब सुना सा नजर आएगा |

साथ प्रदर्शनकारियों का कहना है की जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन रोकने वाले एनजीटी के फ़ैसले का पुनरावलोकन होना चाहिए। जंतर-मंतर दशकों पुरानी जगह है जहां से वो आवाज़ बुलंद होती हैं जिसे सत्ता के गलियारों में बैठे जनता के नुमाइंदे या फिर प्रशासन में बैठे अधिकारी नहीं सुनते हैं। जिस तर्क के आधार पर प्रदर्शन की जगह को स्थानांतरित करने का फ़ैसला दिया गया है दरअसल उस तर्क की भी गहराई से समीक्षा बेहद ज़रुरी है।

जंतर मंतर का क्या महत्व
धरना-प्रदर्शन और अनशनों में खुद के उत्पीड़न से लेकर राज्य और देश को लेकर चिंताएं आकार लेती है, जो यह आश्वस्त करते हैं कि देश के लोगों में सामाजिक सरोकार अभी जिंदा है। देश-विदेश के घटनाक्रम उन्हें चिंतित करते हैं। जब-जब केंद्र व राज्यों की सरकार सोती या उदासीन नजर आती हैं, तब-तब जंतर-मंतर सत्ताधारियों को सचेत करने का काम करता है।

यह वह सड़क है, जिसपर सत्ता से बेदखल होने के बाद हर राजनेता आकर खड़ा हुआ। सत्तापक्ष के खिलाफ आवाज मुखर की। जंतर-मंतर पर अन्ना आंदोलन और उसके साथ दिल्ली की सत्ता में बड़ा उलटफेर भला कौन भूल सकता है। चाहे निर्भया की सामूहिक दुष्कर्म के बाद हत्या के विरोध की ज्वाला हो या तमिलनाडु में किसानों की खुदकशी या कश्मीरी पंडितों के विस्थापन की खिलाफत की लौ, जंतर-मंतर पर सतत जलती रही है। यमुना-गंगा प्रेमियों ने यहां आकर आंसू बहाए हैं तो केरल में संघ व भाजपा कार्यकर्ताओं की राजनीतिक हत्याओं के विरोध का यह खुला मंच बना है। गौरी लंकेश की हत्या के आरोप को भी इस मंच ने तरजीह दी है। गोहत्या से लेकर गोरक्षा के नाम पर उत्पीड़न तक, हर किसी को पिछले दो दशकों में जंतर-मंतर ने मुकम्मल आवाज दी है। इसने किसी से किसी बात पर भेदभाव नहीं किया। धर्म, जाति, क्षेत्र, भाषा, अमीरी-गरीबी सबकी सरहदें यहां टूटीं। सब एकाकार हुए। म्यांमार से लेकर अफगानिस्तान यहां तक कि अफ्रीकी देशों के लोगों को भी इसने खुले दिल से जगह दी। इसने सियासत का बदसूरत चेहरा भी देखा, तब यह जार-जार रोया। जब इसके आंगन में किसान गजेंद्र सिंह ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली और सियासतदां तमाशबीन बने रहे। अब यह सब इतिहास होने वाला है। यह मंच बदलने वाला है। अब यहां धरना प्रदर्शन नहीं होंगे। यहां अब कोई आवाज मुखर नहीं होगी। उम्मीदों की अलख जगाने वाली यह सड़क भी दिल्ली की सड़कों की भीड़ में कहीं खो जाएगी।

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