विशेष लेख : टैगोर सिनेमा हॉलों में राष्ट्रगान की अनिवार्यता पर क्या जवाब देते?

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आजकल राष्ट्रवाद के नाम पर लोगों को तर्कहीन करने, भ्रष्ट और देशद्रोही साबित करने का प्रयास हो रहा है। सिनेमा हॉलों में राष्ट्रगान की अनिवार्यता भी ऐसा ही कुछ संदेश देती है। मानों मनोरंजन की मिठाई पर देशप्रेम का वरक़ लाजिमी है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में संशोधन करते हुए सरकार को फैसला लेने का काम दे दिया है।

लेकिन मेरा सवाल है कि अगर राष्ट्रगान के रचियता रबिंद्र नाथ टैगोर से कोई सवाल करता कि सिनेमा में जन गण मन बजना जरूरी है? वह क्या जवाब देते? कुछ मित्रों को यह सवाल असामयिक, हाईपरबोलिक लग सकता है। लेकिन मैं आपको बता दूं, टैगोर इसका जवाब देकर गए हैं।

आज़ादी से जुड़े आंदोलनों को टैगोर का पूरा समर्थन था, लेकिन देशभक्ति को लेकर उनके मन में कुछ संदेह भी थे। वह मानते थे कि देशभक्ति ‘चार दिवारी’ से बाहर विचारों से जुड़ने की आज़ादी से हमें रोकती है, दूसरे देशों की जनता के दुख दर्द को समझने की स्वतंत्रता को सीमित कर देती है। आज़ादी के प्रति उनके जुनून में बेसबब परंपरावाद का विरोध शामिल था, जो उनके मुताबिक, किसी को भी अपने अतीत का बंदी बना लेता है।

आजादी की लड़ाई के दौरान होने वाले आंदोलनों में अतिरेक राष्ट्रवादी रुख की टैगोर हमेशा निंदा करते थे। यही वजह थी कि वह समकालीन राजनीति से खुद को दूर रखते थे। वह आज़ाद भारत की कल्पना करते थे, लेकिन वह यह भी मानते थे कि घोर राष्ट्रवादी रवैये और स्वदेशी भारतीय परंपरा की चाह में पश्चिम को पूरी तरह नकार देने से कहीं न कहीं हम खुद को सीमित कर देंगे। यही नहीं स्वदेशी की इस अतिरिक्त चाह में हम ईसाई, यहूदी, पारसी और इस्लाम धर्म के प्रति भी असहिष्णु रवैया पैदा कर लेंगे।

टैगोर लगातार अपने लेखन में इस तरह की देशभक्ति की आलोचना करते थे। 1908 में ही वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस की पत्नी अबला बोस की एक आलोचना का जवाब देते हुए उन्होंने अपना मत साफ कर दिया था। लिखा ‘देशभक्ति हमारा आखिरी आध्यात्मिक सहारा नहीं बन सकती, मेरा आश्रय मानवता है। मैं हीरे के दाम में कांच नहीं खरीदूंगा और जब तक मैं जिंदा हूं मानवता के ऊपर देशभक्ति की जीत नहीं होने दूंगा।’

अगर टैगोर का बंगाली उपन्यास ‘घर-बाहर’ आप में किसी ने पढ़ा है तो याद कीजिए। उपन्यास देशभक्ति की रूमानियत पर आधारित है। इसकी कहानी में नायक निखिल सामाजिक सुधार और महिला सशक्तिकरण के लिए आवाज़ उठाता है, लेकिन राष्ट्रवाद को लेकर है। उसकी प्रेमिका बिमला, उसके इस रुख से नाराज़ हो जाती है। वह चाहती है कि निखिल भी अंग्रेज़ों के खिलाफ नारे लगाए और अपनी देशभक्ति का परिचय दे। निखिल का दोस्त संदीप बहुत अच्छा भाषण देता है और एक देशभक्तिपूर्ण योद्धा की तरह नज़र आता है।

बिमला, निखिल को छोड़कर संदीप से प्रेम करने लगी है। इस फैसले के बावजूद निखिल अपने विचार नहीं बदलता और कहता है ‘मैं देश की सेवा करने के लिए हमेशा तैयार हूं, लेकिन मेरी पूजा का हकदार सत्य है, जो मेरे देश से भी ऊपर है। अपने देश को ईश्वर की तरह पूजने का मतलब है, उसे अभिशाप देना।’

कहानी में आगे संदीप उन लोगों की तरफ नाराज़गी जताता है, जो आंदोलन में भाग नहीं ले रहे है और उनकी दुकानों पर हमला करने की योजना बनाता है। वहीं, निखिल अपनी जान पर खेलकर पीड़ितों को बचाता है और इस तरह बिमला को संदीप की राष्ट्रवादी भावनाओं और इन हिंसक गतिविधियों के बीच का संबंध समझ आ जाता है।

टैगोर के इस उपन्यास की निंदा हुई थी, लेकिन कुछ विचारकों ने इसे एक ‘चेतावनी’ बताया था जो पक्षपातपूर्ण रवैये से राष्ट्रवाद के भ्रष्ट होने की तरफ इशारा करता है।

मुझे आशा है आपको, सिनेमा में जन गण मन पर टैगोर जी का जवाब पता लग गया होगा।

 

पंकज पाराशर की फेसबुक वॉल से साभार।

पंकज पाराशर दैनिक हिन्दुस्तान समाचार पत्र के मुख्य उप संपादक हैं। वह लेखन के अलावा डॉक्यूमेंटरी फिल्म मेकिंग के क्षेत्र में काम करते हैं। हिन्दू-मुस्लिम एकता पर केंद्रित की उनकी डॉक्यूमेंटरी फिल्म ‘द ब्रदरहुड’ जल्दी प्रदर्शित होने वाली हैं।

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