देश की शिक्षा व्यवस्था में सुधार से बदल जाएंगे सारे परिणाम, डॉ कुलदीप मालिक ने टेन न्यूज़ के ऑनलाइन कार्यक्रम में दिए सुझाव

Lokesh Goswami Tennews

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आज टेन न्यूज़ पर लाइव डिबेट आयोजित की गई, जिसका मुख्य मुद्दा ‘लाॅकडाउन का शिक्षा पर असर’ रहा। इस कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में आईटीएस कॉलेज के प्रोफेसर डॉ कुलदीप मलिक रहे। उन्होंने कहा कि लॉकडाउन के दौरान उच्च शिक्षा पर काफी प्रभाव पड़ा है, साथ ही उन्होंने कहा कि उच्च शिक्षा क्षेत्र में बहुत खामियां नज़र आती है, जो सभी को दिखता है , लेकिन इस मुद्दे पर कोई भी काम नही करता है।

उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यवस्था में खामियां होने के चलते गरीब के बच्चे सिर्फ सरकारी स्कूल में पढ़ पाते है। उनका एडमिशन प्राइवेट स्कूलों में नही हो पाता है। अगर हमारी सरकार शिक्षा व्यवस्था की खामियों को दूर कर दे तो सभी को एक सामान पढ़ाई मिल सकेगी।

Alok Singh, Social Activist in conversation with Dr (Prof) Kuldeep Malik on current higher education scenario and issues

Alok Singh, Social Activist in conversation with Dr (Prof) Kuldeep Malik on current higher education scenario and issues

Posted by tennews.in on Tuesday, May 19, 2020

प्रोफेसर कुलदीप मलिक ने आगे कहा कि जब मैं नई क्लास में पढ़ाने जाता हूँ तो सबसे पहले बच्चों को एक सबक सिखाता हुँ की शिक्षा ग्रहण करने से पहले अपने अंदर मानवता पैदा करो।

उन्होंने कहा कि आप अच्छी शिक्षा से डॉक्टर, इंजीनियर बन सकते है, लेकिन अपने अंदर मानवता नही होगी तो इतने बड़े मुकाम हासिल करने का कोई फायदा नही है। इस लॉकडाउन में जिस तरह मजदूरों पर अत्याचार हो रहा है , जिससे साफ दिखता है कि शिक्षा व्यवस्था में कितना सुधार हुआ है। शिक्षा व्यवस्था में एक नीति बननी चाहिए , जिसमे अच्छे डॉक्टर , इंजीनियर के साथ-साथ एक अच्छा इंसान बनने की शिक्षा दी जा सके।

कुलदीप मलिक ने कहा कि इस लॉकडाउन में मजदूर जैसी हालत अब अध्यापकों की हो रही है , अभी तक उनकी तनख्वाह तक नही मिली है, जिसके कारण उनकी हालात बदतर हो रही है। उन्होंने बताया कि स्कूल और कॉलेज प्रबंधन कहते है कि बच्चों की फीस नही आई है, जिसकी वजह से तनख्वाह नही दे पाएंगे। कुछ ऐसे स्कूल है, जिनके पास जुलाई और अगस्त तक फीस आ चुकी है, फिर भी टीचरों की तनख्वाह नही दे रहे है। इस मामले में सरकार और जिला प्रशासन का ध्यान नही जा रहा है, क्या इस देश मे टीचरों का कोई स्थान नही है? उनसे कौन-सी बड़ी भूल हो गयी है, जिसका नुकसान उन्हें झेलना पड़ रहा है।

उनका कहना है कि शिक्षा व्यवस्था के बारे में हमें सोचना पड़ेगा, यह शिक्षा व्यवस्था एक व्यवसाय बन कर रह गयी है। हम पुराने समय की बात करें तो सभी बच्चे सरकारी स्कूलों में ही पढ़ते थे।

जब से शिक्षा का व्यवसायीकरण किया गया है, तभी से इसके दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं। सरकार कम से कम 3 चीजे अपने हाथ में रखे एक तो शिक्षा, दूसरी सुरक्षा और तीसरी चिकित्सा। मगर सरकार ने अपने हाथ से शिक्षा को निकाल दिया, फिर सरकार का रोल ही क्या है। हमें कहीं ना कहीं सारी बातें सोचनी चाहिए। साथ ही उन्होंने कहा, हमें देशवासियों को आत्मनिर्भर बनाना है तो उसके लिए सबसे पहला कदम शिक्षा व्यवस्था में सुधार करने के लिए उठाना पड़ेगा।

सम शिक्षा व्यवस्था देश में करनी पड़ेगी , सबके बच्चे एक ही विद्यालय में पढें, सभी को समान शिक्षा मिले, ऐसी व्यवस्था हमें करने की आवश्यकता है। शिक्षकों की दुर्दशा हमें सुधानी पड़ेगी। शिक्षकों का तो आज मजदूरों से भी बुरा हाल हो गया है।

उन्होंने कहा कि शिक्षको से आज के समय में मजदूर अच्छे हैं, हम जैसे बुद्धिजीवियों को और नेताओं को समझना चाहिए कि यह नेता, अभिनेता, डॉक्टर किसकी देन है, सब शिक्षकों की देन है। आपको क्या लगता है इस शिक्षा व्यवस्था, शिक्षक वर्ग में उनकी कितनी जिम्मेदारी है, अपने कर्तव्य का निर्वहन ठीक प्रकार से कर रहे हैं या करना चाहते हैं या कर ही नहीं पा रहे।

शिक्षक शिक्षा व्यवस्था में कैसे बदलाव ला सकते हैं?

उन्होंने कहा कि आज का जो शिक्षक है, इस शिक्षा व्यवस्था में क्लास रूम के अंदर तक सिमट कर रह गया है। शिक्षक का काम क्लास रूम के अंदर ही नहीं बल्कि बच्चों का एवं एक बेहतर समाज का निर्माण करना है। लेकिन जो व्यवस्था यहां पर थोप दी गई है, आज का शिक्षक अपने मन की बात अपने लाला के सामने अच्छे से सर उठा कर नहीं बोल सकता

आज का शिक्षक अंदर का शिक्षक इस व्यवस्था में मार दिया गया है जब शिक्षक के अंदर का ही शिक्षक मार दिया गया तो अब क्या राष्ट्र  निर्माण कराएंगे कैसे वह बच्चों का निर्माण करेगे  हमें कहीं ना कहीं इस बात को सोचना पड़ेगा जब एक शिक्षिका आर्थिक रूप से उद्योग धंधों की बात करो तब तक शिक्षा को सर्वोपरि नहीं करोगे तब तक कुछ नहीं हो सकता।

देश के सभी लोगों को शिक्षा के गलियारों से गुजरना होगा, विदेशो की जो शिक्षा व्यवस्था है जैसे- अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन की बात करूं तो वहा पर बच्चे अपना बचपना जी रहे हैं। हिंदुस्तान के बच्चों का बचपना बहुत जल्दी छीन लिया जाता है। मेरा मानना है कि बच्चों का बचपन उन्हें जीने दिया जाना चाहिए।

डॉ कुलदीप मलिक ने कहा कि पिछले 18 वर्षों से हमारी  पूरी फैमिली शिक्षा व्यवस्था में काम कर रही है। हमारे पास बहुत सारी लंबी ऐसी लिस्ट है जो शिक्षकों के लिए हमने किया है। तभी शिक्षक अपने हक़ के लिए बोल पाते है। नोएडा-ग्रेटर नोएडा के अंदर या पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अंदर या वित्तविहीन शिक्षक आज रात दिन संघर्ष कर रहे हैं। यह तो सब सरकारों का काम है, मैं तो सिर्फ सुझाव ही बता सकता हूं।

उन्होंने कहा कि जो लोग सरकार में शिक्षा नीति बनाते हैं, वे ऐसी शिक्षा व्यवस्था दें, जिसमें कि हर कोई बच्चा अच्छा डॉक्टर, इंजीनियर बनने के साथ-साथ अच्छा इंसान जरूर बने। आप कितने ही बडे डॉक्टर, इंजीनियर बन जाएं अगर आप एक अच्छे इंसान नही हैं तो इसका कोई फायदा नहीं।

आज के समय में बच्चों को बहुत सारी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। हमें बच्चों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए अपनी शिक्षा व्यवस्था के अंदर कुछ ना कुछ ऐसा करना चाहिए , जिससे हमारे बच्चे स्वस्थ रहें। मोदी सरकार ने पिछले 5 साल बिता दिए। योगा को भी कंपलसरी करने वाले थे , लेकिन इनकी वह योजना भी ठंडे बस्ते में चली गयी।
मोदी सरकार को शिक्षा व्यवस्था पर काम करना चाहिए, जिससे कि एक नई दिशा में देश को ले जाया जा सके और शिक्षकों का भला हो सके।

साथ ही मलिक ने कहा कि जनसंख्या नियंत्रण कानून की बात करें तो पिछले काफी समय से हम इस देश के अंदर बढ़ती हुई जनसंख्या को कंट्रोल करने के लिए जनसंख्या नियंत्रण कानून की मांग कर रहे है। केवल और केवल जनसंख्या नियंत्रण कानून जनसंख्या हर एक समस्या का समाधान है। जब तक देश में जनसंख्या कंट्रोल नहीं होगी, देश में जनसंख्या नियंत्रण कानून नहीं बनेगा, तब तक उसका प्रभाव हमें शिक्षा व्यवस्था के अंदर देखने को नही मिलेगा। संसाधन हमारे पास धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं, जनसंख्या बढ़ती जा रही है। जनसंख्या को नियंत्रण कर लो, इस देश की शिक्षा व्यवस्था को सुधार लो, शिक्षकों को आर्थिक रूप से सशक्त बना दो , शिक्षक ही है जो इस समाज का भला कर सकता है।

कुलदीप मलिक ने कहा कि छात्रों के लिए यही मेरा संदेश है। इस लाॅकडाउन में शिक्षक का अभिभावक रोल अदा करें और बच्चों के साथ शिक्षक और अभिभावक, दोनों का रोल अदा करेंगे तो बच्चे खुद ही खुद सशक्त बनते चले जाएंगे।

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