निराशा से डरने की नहीं लड़ने की ज़रूरत है: डॉ कुमार विश्वास

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ग्रेटर नोएडा स्थित गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय में नवागंतुक छात्रों के इंडक्शन पखवाड़ा प्रोग्राम 18 जून से शुरू हो चुका है, जिसमे शिक्षा के क्षेत्र के स्थापित विद्वान एक-दूसरे से प्रति-दिन मुखातिब होते हैं। यह एक बड़ा अवसर है जिसका फयदा है विश्वविद्यालय के पुराने और नए छात्रों के साथ साथ शिक्षकों एवं शिक्षनेटर कर्मचारियों को भी मिल रहा है। शिक्षकों के पास पर्याप्त समय है और ज्ञान एक प्रश्रवणशील सरिता की भांति है, जिसमें तिरोहित होकर लाभान्वित होने का अवसर गौतम बुध विश्वविद्यालय सभी को वर्चुअल तकनीक से सर्व सुलभ करा रहा है।

इस क्रम में आज देश के दैदीप्यमान कवि एवं स्थापित प्रेरक-व्यक्तित्व डॉ. कुमार विश्वास ने जानें उद्बोधित किया।

इस कार्यक्रम का सीधा प्रशासन गूगलमीट एवं युटयूब पर साझा किया गया ताकि ज़्यादा से ज़्यादा छात्र एवं छात्राएँ इस डॉ कुमार विश्वास की प्रेरक बातों को सुने और उससे प्रेरणा के कर जीवन की इस विषम परिस्थिति में सफलताओं की शिखर तक पहुँचे।

डॉ कुमार विश्वास ने अपने सम्बोधन में ऐसी कई बातों को कहा जो युवा शक्ति के लिए बहुत हद तक प्रेरणा दायक साबित होगा। उन्होंने ने एक महत्वपूर्ण बात कही कि आप अपने आप को धन्य समझिए की आप को एक बड़े विश्वविद्यालय के छात्र हैं। जहां के माननीय कुलपति प्रो भगवती प्रकाश शर्मा जैसे विद्वान हैं और जिनके दिशानिर्देश में पूरा शिक्षक वर्ग पूर्व के छात्रों एवं आने वाले नए छात्रों के हितों को ध्यान में रखकर ऐसे कार्यक्रम इस कोविड महामारी के समय भी कर रहे हैं। इसी क्रम मैं आगे उन्होंने छात्रों से अनुरोध किया और बतलाया की एजुकेटेड होना ओर लर्नेद होने में क्या अंतर है। उन्होंने ने कहा की ये अंतर आप को सिर्फ़ और सिर्फ़ भारत की शिक्षा पद्धति में ही मिल सकती है। विश्वविद्यालय आप को शिक्षित कर सकती है लेकिन जीवन जीने के लिए आप को लर्नेद यानी ज्ञानी होना होगा। अपनी इस बात को रखते हुए उन्होंने कई भारत इस प्राचीन मूल्यों का उदाहरण दिया जो की श्रोताओं की समझ में भी आया होगा।

अपनी बात तो बलपूर्वक रखते हुए उन्होंने अपने सम्बोधन में इतिहास के कई घटनाओं को उद्धृत किया और यह समझने का प्रयास किया की किस तरह प्राचीन काल से लेकर आज के समय तक लोगों ने हर विषम परिस्थिति का सामना की और उसपर जीत हासिल की। अतः विषम परिस्थिति हो और कोई उम्मीद की किरण ना दिखे तो अपने पिछले निंदाई में खनकें। अगर कोई ऐसा करेगा तो उसे अपनी ही पिछले ज़िंदगी से कुछ ऐसे तथ्य मिलेंगे जो उन्हें आज की विषम परिस्थिति से लड़ने और उबरने का रास्ता मिलेगा।

उन्होंने अपने उदबोधन में फ़िल्म कलाकार सुशांत सिंह राजपूत आत्महत्या करने के मुद्दे को भी साझा किया जिनके साथ चंदा मामा नामक फ़िल्म पे वो काम कर रहे थे। आत्महत्या को उन्होंने साफ़ शब्दों में नकारा ही नहीं बल्कि उन्होंने ने इस बात पर ज़ोर दिया की ऐसी कोई परिस्थिति को अपने आप पर हावी ही नहीं होने देना चाहिए की कोई व्यक्ति आत्महत्या जैसा कदम उठाने की सोंचे भी।

एक छात्र के प्रश्न जो की निराशा से सम्बंधित था उसके जवाब में उन्होंने ने इतिहास के कई उदाहरण दिए जिसमें महात्मा गांधी लेकर रोज़ेवेल्ट, विन्स्टॉन चर्चिल, मुस्सोलिनी, हिट्लर, आदि ज़िक्र और यह समझने कोशिश की कि निराशा से लड़ने की ज़रूरत है डरने की नहीं।

आज के कार्यक्रम में डॉ मनमोहन सिंह सिशोदिया ने डॉ कुमार विश्वास जी एक संक्षिप्त परंतु पूर्ण परिचय श्रोताओं समक्ष प्रस्तुत किया। डॉ विश्वास के उदबोधन के अंत में डॉ अरविन्द कुमार सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन किया और अंत में कुमार विश्वास की कुछ पंक्तियों को श्रोताओं के सामने रखा जैसे कोशिशें मुझको मिटाने की मुबारक हों मगर, मिटते-मिटते भी मैं मिटने का मज़ा ले जायूँगा|

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