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एक ओंकार सतनाम -प्रोफ़ेसर पी.के.आर्य

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संत शिरोमणि गुरु नानक देव जैसा कोई और नहीं ! साधुत्त्व और संतत्त्व ने इस नाम के साथ जुड़कर जितनी गरिमा और विशिष्टता अर्जित की उतनी किसी और के साथ जुड़कर नहीं। नानक जी चलते फिरते मंदिर थे। जहाँ बैठे, वहीँ वेद की गंगा बही; जहाँ बोले वहीँ दर्शन का सागर हिलोरे लेने लगा। जिसे उन्होंने देख भर लिया, वो तर गया और जिसने उन्हें देखा उसे फिर कुछ और देखना शेष न रहा। भारत को गर्व है कि नानक देव इस धरती पर विचरे। उनकी देशनायें कालजयी हैं। उनकी वाणी अमर है; सदा सर्वदा के लिए। गुरु नानक अकेले ऐसी विभूति हैं जिनमें ज्ञान और चेतना की विभिन्न धाराएं एक विशिष्ट सामंजस्य के साथ आकर गिरती हैं। पैगम्बर,दार्शनिक,राजयोगी,गृहस्थ,त्यागी,धर्म-सुधारक, कवि,संगीतज्ञ, विश्वभक्त,देशप्रेमी और सभी के मित्र आदि गुणतत्त्व उनके व्यक्तित्त्व की छाया हैं।

गुरु नानक देव ने सभी को धर्मों के आधार पर एक ही परमात्मा के प्रति समर्पित होने का सन्देश दिया। गुरु नानक देव ने ‘आशा दी वार’ में स्पष्ट किया है कि जन्म-मरण, लेना-देना , पुण्य -पाप , नरक स्वर्ग , हँसना-रोना ,पवित्रता -अपवित्रता ,जात-पात , ज्ञान -अज्ञान , बंधन-मोक्ष आदि सब कुछ ‘हउमै’ के द्वारा होते हैं। उन्होंने हउमै के सात भेद बताते हुए सात प्रकार के अहंकारों को त्यागने का परामर्श दिया है। उन्होंने कहा कि परमात्मा एक ओंकार है उसी की प्रार्थना करनी योग्य है-यथा –

‘इक ओंकार सतनाम करता,पुरख निरभउ।

निरवैर, अकाल मूरत,अजूनी सैभंग गुरु प्रसादी। ‘

 

प्रेम,बंधुत्व और समानता के सन्देशवाहक गुरु नानक देव मानव धर्म के वास्तविक प्रणेता थे। उनके अनुयायियों में हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही थे; तभी तो उनके बारे में एक लोकोक्ति अत्यंत लोकप्रिय रही

-‘गुरु नानक एक शाह फ़क़ीर,

हिन्दू का गुरु मुस्लिम का पीर। ‘

 

रावी नदी के समीप (तिलौंडा) तलवंडी ग्राम में श्री कल्याण चंद मेहता (कालू मेहता) एवं श्रीमती तृप्ता देवी के घर संवत 1527 की कार्तिक पूर्णिमा (अंग्रेजी कलेंडर – 15 अप्रैल सन 1469) को एक दीपक प्रदीप्त हुआ। मेहता दंपत्ति की पहली संतान पुत्री नानकी थी अतः दूसरे बच्चे का नाम रखा गया- ‘नानक’। वर्तमान में यह स्थान पाकिस्तान में है। अब इस स्थान का नाम ‘ननकाना साहिब’ है। यह लाहौर से दक्षिण पश्चिम में 65 कि.मी. दूर है।कालू मेहता  पेशे से पटवारी थे। नानक को सूफियाना संगत बहुत भाती। बालक नानक घण्टों-घण्टों सूफ़ी फ़क़ीरों से नये-नये सवाल पूछते और परमात्मा की चर्चाओं में लगे रहते। दो-चार दर्ज़े पढ़ने के बाद नानक घर पर रहने लगे। उनके प्रश्नों के उत्तर उनके अध्यापकों के पास भी नहीं थे। अध्यापकों ने पिता कालू मेहता को समझाया कि आपका बच्चा स्वतः ही गुणी है अब उसे हम वो सब कहाँ से बताएं जो हमें भी नहीं पता ?

यज्ञोपवीत संस्कार कराने आये पंडितों से उन्होंने पूछा -‘ दया की कपास हो, संतोष का सूत हो,संयम की गाँठ हो, सत्य उस जनेऊ की पूरन हो -जीवन के लिए यही सच्चा जनेऊ है। आचार्य जी यदि इस प्रकार का कोई जनेऊ आपके पास हो तो उसे मुझे अवश्य धारण कराइये। यह जनेऊ न ही टूटता है ,न इसमें मैल लगता है ;न ही यह जलता है और इसे कभी खोया भी नहीं जा सकता।’

 

पिता नानक को एक व्यापारी बनाना चाहते थे। उन्होंने अपने पुत्र को समझाया कि व्यापार में बड़ा लाभ है। बाहर से सामान लाकर बेचने में बड़ा मुनाफ़ा है। उन्होंने नानक देव को बीस रूपये दिए और कहा -‘पास की मंडी चूहड़काणे चले जाओ और वहां से कुछ ऐसा सामान ले आओ जिसे बेचकर अधिक लाभ अर्जित किया जा सके। साथ ही हिदायत भी दी कि बड़े लाभ का सच्चा सौदा करके आना। उनके साथ देखरेख के लिए गाँव के एक अन्य बालक बाला को भी रवाना किया। यह नानक देव का पहला व्यापारिक कदम था जो उनके समूचे भविष्य का निर्धारण करने वाला था। बीच मार्ग में नानक को सूफ़ी-फ़क़ीरों का एक ऐसा झुण्ड मिला जिसने कईं दिनों से कुछ भी नहीं खाया-पिया था। उन्हें भूख -प्यास से बेहाल देखकर नानक का बाल हृदय द्रवित हो उठा। अपने साथी बाला के बार-बार मना करने के बावज़ूद नानक पिता के दिए हुए पैसों से उन फ़क़ीरों के लिए खाने-पीने की चीज़े ख़रीद लीं और फ़क़ीरों को सौंप दीं। नानक के मन में एक ही बात थी भला भूखों को खाना खिलाने से अधिक लाभप्रद और सच्चा सौदा क्या हो सकता है ?

घर लौटने पर पिता ने काफी भला बुरा कहा और बालक नानक की पिटाई भी कर दी। माँ ने पिता को समझाया -‘घर-बार की ज़िम्मेदारी में डालों, तब इसका मन काम धंधे में लगेगा।’ 16 वर्ष की उम्र में गुरदासपुर जनपद के लाखौकी ग्राम के निवासी मूला की सुपुत्री सुलखनि देवी से नानक देव का परिणय संस्कार करा दिया गया। विवाह के सोलह वर्ष उपरान्त जब नानक 32 वर्ष के थे उनके पहले पुत्र श्री चंद का जन्म हुआ। उसके चार वर्ष बाद दूसरे पुत्र लखमीदास का जन्म हुआ।वे अपनी पत्नी से बार-बार देश भ्रमण की बात करते। वे कहते -‘अपने लिए तो सभी जी रहे हैं मैं सभी के काम आना चाहता हूँ।’ स्वाभाविक रूप से सुलखनि घबराती और उन्हें घर गृहस्थी में रमने की हिदायत देती रहती। उधर नानक देव के एक मुस्लिम साथी मरदाना के संगीत और नानक देव के गीतों पर लोग भाव-विभोर होकर झूमते रहते।वे कहते सत करतार का स्मरण ही सच्ची प्रार्थना है। नानक देव कहते प्रकृति का ऋण आप उसकी सेवा करके ही उतार सकते हो। सभी प्राणियों के प्रति सद्भाव और प्रेम उनके संदेशों का सार था। उनका एक प्रसिद्द गीत है  –

‘राम जी की चिड़िया,राम जी का खेत।

खावों री चिड़ियों ; भर-भर पेट। ‘

गुरु नानक की ‘जन्मसाखी’ में उनके जीवन से जुडी एक गहन जलसमाधि का वर्णन मिलता है।एक बार नानक देव नदी में स्नान करने गए तो वापस नहीं लौटे। लोगों ने सोचा कि वे नदी की तेज धार में या तो बह गए या फिर डूब गए। पूरे गाँव ने मिलकर उन्हें खोजा लेकिन वे नहीं मिले। घर वाले भी उन्हें मरा मान दुःख संताप में डूबे थे कि चौथे दिन नानक देव जलधार से प्रकट हो गए। बाहर आते ही उन्होंने जो पहला प्रवचन दिया उसे ‘जपुजी साहिब’ के नाम से जाना जाता है। जपुजी का सिखों के लिए वही महत्त्व है,जो हिन्दू धर्मावलम्बियों के लिए ‘गीता’ का ।

38 वर्ष की उम्र में एक दिन नानक देव ने अपनी पत्नी और बच्चों का भरण-पोषण अपने श्वसुर को सौंप ,घर त्यागकर अपने साथियों मरदाना ,बाला,लहना और रामदास के साथ नानक देव देश-भ्रमण के लिए निकल पड़े। उन्होंने सब ओर घूम-घूम कर अपना वतन देखा। जब अपना वतन देखा तो हर तरफ घोर पतन देखा।पूरा भारत भेद-भाव, पाखण्ड और जात-पात के दुष्चक्र में फंसा हुआ था। विदेशी हमलावरों से देश जूझ रहा था। गरीब और निर्धन समुदाय पूंजीपतियों की दासता झेल रहे थे। सामाजिक ढकोसलों में जनता बुरी तरह त्रस्त थी। धर्म के नाम पर पाखंड का कारोबार था। अंधविश्वास की चक्की में भोली-भाली पीढ़ियां पिस रही थी। नानक देव ने अपनी यात्राओं और प्रवचनों के माध्यम से समाज को एक नयी दिशा देनी शुरू की।नानक देव को कोई भी व्यक्ति ऐसा न मिला जिसे वे अपना गुरु बनाते। उन्होंने धर्म में व्याप्त बुराईयों पर प्रहार करने शुरू किये। उनके अनेक अनुयायी बने तो अनेक शत्रु भी। बिना किसी की परवाह किये नानक देव अपने मंतव्य की ओर चलते रहे। उन्होंने लगभग 14 वर्षों तक लगातार यात्राएँ कीं।उन्होंने कैलाश मानसरोवर की यात्रा की और वहां प्रवास किया ।

सन 1522  तक उन्होंने अपनी यात्राओं के चार चक्र पूरे किये। उन्होंने भारत,अफगानिस्तान,अरब. और फारस देशों के अनेक स्थानों की सक्रिय यात्राएँ कीं। इन यात्राओं को पंजाबी में ‘उदासियाँ’ कहा जाता है। आज़ाद पंछी की तरह ,जिधर उनका मन चाहता, वे उधर ही चल निकलते। समूचा संसार ही उन्हें अपना घर लगता। वे हर किसी को अपना मित्र मानते। उनका कहना था -‘ना मैं हिन्दू हूँ और नही मुसलमान। ‘ वे हिन्दू साधुओं और मुस्लिम फ़क़ीरों की मिली जुली वेशभूषा पहनते थे।

वे मक्का-मदीना की यात्रा करने वाले पहले और अंतिम गैर इस्लामिक व्यक्ति थे। उनके बारे में एक घटना अत्यंत प्रचलित है। एक दिन काबा प्रवास में जब नानक देव पैर पसारे सो रहे थे तो वहां के एक मौलवी ने उन्हें आकर जगाया। उसने इस बात पर एतराज़ किया की नानक देव काबा की और पैर करके क्यों सो रहे हैं ? इस पर नानक देव ने हंसकर उत्तर दिया -‘मुझे तो हर ओर काबा ही काबा नज़र आता है।जिधर तुम्हें काबा ना दीखता हो मेरे पैर उस तरफ कर दो।’ शोर शराबा सुनकर वहां भीड़ इकठ्ठा हो गईं। दो मुस्लिमों ने आगे बढ़कर उनके पैर उठाये और विपरीत दिशा में घुमाने लगे ,तभी एक चमत्कार हुआ जिस तरफ गुरु नानक देव के पैर घुमाये जाते काबा भी उधर ही घूम जाता। भीड़ विस्मय मुग्ध हो कर उनका जय-जयकार करने लगी।गुरु नानक मुस्कराकर कर बोले -‘ ख़ुदा तो इस दुनिया के ज़र्रे-ज़र्रे में है। वो हर तरफ मौज़ूद है। वह जड़ में भी है और चेतन में भी !’

गुरु नानक की शिक्षाओं का हज़ यात्रियों पर बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ा। उनका अनेक मुस्लिम विद्वानों से तर्क -वितर्क हुआ अंततः उन्होंने सिद्ध कर दिया कि -‘ना तो कोई मुसलमान है और ना ही कोई हिन्दू। सभी ईश्वर निर्मित मानव हैं और हम सबका वास्तविक धर्म है मानवीयता ,सच्चाई और ईमानदारी !’

गुरु नानक देव तत्कालीन समाज में नारियों की स्थिति को देखकर अत्यंत विचलित हुए उन्होंने स्त्रियों को समाज में निंदा की नज़र से देखने का घोर विरोध किया। ‘गुरुबाणी’ में स्पष्ट लिखा है – ‘स्त्री की रक्षा और सम्मान करने से समाज की रक्षा और सम्मान हो सकता है।’ संत साहित्य में नानक ऐसे अकेले विचारक हैं जिन्होंने नारी को बड़प्पन दिया है। नानक सर्वेश्वरवादी थे उन्होंने मूर्तिपूजा का निषेध किया। उनके विचारों मुस्लिम समाज अत्यंत प्रभावित था;  यह देख तब के सम्राट इब्राहिम लोदी ने उन्हें कैद में डाल दिया। बहुत समय के बाद जब पानीपत के युद्ध में बाबर ने इब्राहीम लोदी को हराया तब उन्हें मुक्त किया जा सका।

गुरु नानक देव की भाषा बहती नीर थी जिसमें फ़ारसी,मुल्तानी,पंजाबी,सिंधी,खड़ी बोली ,अरबी,संस्कृत और बृज भाषा के शब्द समाये हुए प्रतीत होते हैं। जीवन के अंतिम समय में उनकी ख्याति बहुत बढ़ गयी थी। वे विरक्त जीवन जीने लगे और भंडारा और लंगर करने लगे। उनकी मान्यता थी की अकेला खाने वाला प्रभु का प्यारा नहीं हो सकता। उन्होंने एक नए नगर का निर्माण किया जिसका नाम रखा करतारपुर यानि भगवान का शहर। यह अब पाकिस्तान में है। यहीं लगभग 70 वर्ष की आयु में 22 सितम्बर 1539 को गुरु गद्दी का भार गुरु अंगददेव(बाबा लहना) को सौंप कर गुरु नानक देव परम ज्योति में लीन हो गए ।

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