आयुर्वेदिक चिकित्सक और सर्जरी विषय पर परिचर्चा का हुआ आयोजन, डॉक्टरों ने दी प्रतिक्रिया

Ten News Network

0 316

Greater Noida: टेन न्यूज़ द्वारा आयुर्वेदिक चिकित्सक और सर्जरी विषय पर परिचर्चा का आयोजन किया गया। जिसमे तीनों आयुर्वेदिक, होम्योपैथीक, एलोपैथीक चिकित्सकों ने विषय पर अपने अपने विचार साझा किए।  परिचर्चा का संचालन प्रोफेसर विवेक कुमार ने किया। आपको बता दे की प्रोफेसर विवेक कुमार एमिटी विश्वविधालय के उपनिदेशक है , साथ ही नोएडा के प्रमुख समाजसेवक भी है | परिचर्चा की शरुआत करते हुए उन्होंने सबसे पहले सभी वक्ताओं का परिचय दिया , साथ ही विषय के बारे में एक संक्षेप विवरण भी दिया।

उन्होंने कहा की आयुर्वेद के डॉक्टर पूर्व में भी सर्जरी करते रहे हैं , यह कोई नया प्रयास नहीं है, ना ही यह कोई प्रतिस्पर्धा खड़ा करने के लिए की गई है , इसका मकसद एलोपैथी की मदद करना है , ताकि यह दोनों विधाएं एक दूसरे के पूरक बन सके और इसी रूप में इसको लिया जाना चाहिए।

परिचर्चा में अपने विचार सबसे पहले रखते हुए इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के महासचिव डॉ जयेश एम लेले ने कहा की मिक्सोपैथी से तात्पर्य उस समय से है, जब कोई व्यक्ति जिसने किसी विशेष प्रकार की दवाई सीखी हो, जैसे कि आयुर्वेद, यूनानी या होम्योपैथी, उसके अलावा कुछ और अभ्यास करते हैं। मान लीजिए अगर व्यक्ति एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति का अभ्यास करता है, तो इसे मिक्सोपैथी कहा जाएगा। इस समय, ये तीन प्रकार के डॉक्टर भारत में प्रचलित हैं, लेकिन वे चिकित्सा की एलोपैथिक धारा का उपयोग करने के लिए उत्सुक हैं, इसीलिए वे धाराओं के मिश्रण का उपयोग कर रहे हैं। इसे मिक्सोपैथी या क्रॉसपैथी कहा जा रहा है।

 

इसके बाद अपने विचार रखते हुए ग्रेटर नोएडा स्थित ब्लिस आयुर्वेद हेल्थ विलेज के प्रबंध संचालक डॉ नितिन अग्रवाल ने कहा की मेरा ऐसा मानना है कि मॉडर्न मेडिसीन में कई नई चीजें आई है पर जिस तरह का सपोर्ट उनको मिलता है ना सिर्फ देश के स्तर पर बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी वह आयुर्वेद को नहीं मिल पाता है। आयुर्वेद का विरोध करने की बजाए  हमें इसके मूल में जाना होगा कि आखिर भारतीय सरकार ने ऐसा कदम क्यों लिया। यह तो सभी लोग मानते हैं की सर्जरी की शुरुआत सुश्रुत संहिता के अंदर  निर्मित है और सिर्फ भारत में ही नहीं जहां से हम मॉडर्न मेडिसीन की प्रेरणा लेते हैं अमेरिका और यूरोप वहां भी इसे माना जाता है। शुरुआत कोई एक विचार नहीं, बल्कि फादर ऑफ थॉट थे। उसके बाद एक काल खंड आया जिसमें मुगलों और अंग्रेजों ने हम पर राज किया और हमारी जो भी वैदिक विधाएं थी उनको ध्वस्त कर दिया और किसी को कुछ भी करने नहीं दिया। इतना ही नहीं आजाद भारत के अंदर भी सेकुलरिज्म के नाम पर हमने इस को पनपने नहीं दिया।

अगर हम एलोपैथिक डॉक्टरों की बात करें तो उनके द्वारा की गई सर्जरी में तमाम अलग-अलग लोगों की पूरी टीम लगती है | टेक्निशियंस , आईटी प्रोफेशनल , बायोकेमिस्ट्स इत्यादि होते है। अब सरकार की जो मंशा है भारत की जो मूल प्राचीन विधा है , उसका पुनर्जीवित किया जाए। अब कुछ लोगों की इच्छा है कि आयुर्वेद जो है, अपने परम वैभव पर जाए भारत आत्मनिर्भर बने इसमें एलोपैथिक डॉक्टरों को आगे आकर उसका सपोर्ट करना चाहिए।

विवेक कुमार ने परिचर्चा को आगे बढ़ते हुए पहले नितिन अग्रवाल की बातों पर अपनी मंशा जाहिर की और कहा “नितिन अग्रवाल द्वारा कुछ चिंताएं जाहिर की और एक आग्रह किया कि क्यों न दोनों चिकित्सा पद्यतियों को मिलाकर चलाया जाए”, साथ ही उन्होंने इस पर  डॉक्टर बी पी सिंह जी आपकी क्या राय जाननी चाहिए ।

 

नोएडा स्थित गुंजन पॉलीक्लीनिक्स के सीएमडी डॉ वी पी सिंह ने कहा की “हमें एक इंटीग्रेटेड सिस्टम की जरूरत है , जिसमें सभी डॉक्टर बैठकर एक साथ विचार-विमर्श कर सकें की कौनसी बीमारी के लिए किस-किस पैथी का इस्तेमाल करना है।  मैंने अपनी प्रैक्टिस हरिद्वार से शुरू की और मैं वहां के गुरुकुल और ऋषि कुल आयुर्वेदिक विद्यालय में लेक्चर देने जाया करता था जहां मैंने देखा कि वहां के विद्यार्थियों को 90 परसेंट विद्यार्थियों को आयुर्वेद का भी अच्छा ज्ञान नहीं है।  हम ओपन सर्जरी से इंडोस्कोपिक और अब रोबोटिक सर्जरी पर जा पहुंचे हैं जितने आयुर्वेदाचार्य थे आज भी वह अपने अपने पेपर को सीक्रेट रखते हैं।आप अपने ज्ञान को खुद ही प्रचारित प्रसारित नहीं कर पाए और इसके लिए मुगलों और अंग्रेजों को दोष देना मेरी समझ से गलत होगा।

डॉ सुरेंद्र चौधरी (अध्यक्ष, विश्व आयुर्वेद परिषद, उत्तर प्रदेश) ने अपने विचार रखते हुए कहा की  इंडियन मेडिकल एसोसिएशन एक बहुत बड़ी संस्था है और एक मात्र संस्था है जो एलोपैथिक डॉक्टरों को रिप्रेजेंट करती है , वही होम्योपैथिक आयुर्वेदिक में इस तरह की कोई बड़ी संस्था ना होकर अलग-अलग संस्थाएं हैं तो  जो कभी साथ होकर सरकार पर दबाव नहीं बनाती की कोई एक नियम बनाया जाए। अब आयुर्वेद में भी दवाई बनाने की पद्धति में बदलाव आया है और पूरे आधुनिक तरीके से दवाइयां बनाई जाती हैं सिर्फ एक आंख की दवाई बनाने के लिए पचास हज़ार का प्लांट लगाया गया है।

डॉ निर्मल गुप्ता, एमडी (बाल चिकित्सा , बड़ौत) ने कहा की “मेरा कहना यह है की मरीज किसी भी पैथी से ठीक होना चाहिए, लेकिन हर फील्ड के अपने-अपने दायरे होते हैं। अब हमारे यहां यह चर्चा उठी है कि आयुर्वेदिक डॉक्टरों को सर्जरी करनी चाहिए या नहीं, तो इस पर मेरा मानना यह है कि आयुर्वेद को अपने फील्ड में रहना चाहिए। उन्हें अपना रिसर्च करना चाहिए। जहां तक सर्जरी का सवाल है एक एमबीबीएस डॉक्टर 3 साल तक एक फील्ड में प्रैक्टिस करता है उसके बाद भी वो सर्जरी नहीं कर पाता है।  जब तक वह 3 साल सीनियर रेजीडेंसी ना कर ले या उसके बाद एमसीएच ना कर ले क्योंकि जनरल सर्जन ज्यादा सर्जरी नहीं कर सकता। इसी तरह से कोई आयुर्वेद डॉक्टर भी बिना पूरी डिग्री या प्रैक्टिस के सर्जरी नहीं कर सकता।

परिचर्चा के अंत में प्रोफेसर विवेक कुमार ने कमेंट सेक्शन में आई दर्शकों की प्रतिक्रिया भी वक्ताओं के साथ साझा की और सभी का परिचर्चा का हिस्सा बनने के लिए एक बार पुनः धन्यवाद दिया ।

https://www.facebook.com/499234480174431/posts/3903325149765330/

Leave A Reply

Your email address will not be published.