आईएमए और एएचपीआई ने सरकार के सीजीएचएस पैनल हस्पतालों की अदायगी करने की अपील की
आईएमए और एएचपीआई ने सरकार के सीजीएचएस पैनल हस्पतालों की अदायगी करने की अपील की
नई दिल्ली, 5 अक्तूबर 2016: सीजीएचएच टेंडर के ज़रिए रेट तैय करता है और एल1 को मापदंड बना देता है जैसा कि दुनिया में कहीं भी नहीं हेाता। यह बात आईएमके प्रसेडेंट इलेक्ट डॉ के के अग्रवाल और हैल्थ केयर प्रोवाईडर एसोसिएशन आॅफ इंडिया के डायरेक्टर जनरल डॉ गिरधर ज्ञानी ने कही।
कान्फ्रेंस को संबोधित करते हुए डाक्टरों ने कहा कि कई रेट तर्कसंगत और उचित नहीं होते। मापदंडों के अनुसार चलनले वाले हस्पताल इन शर्तों पर पैनल में कभी शामिल ही नहीं होंगे।
दुखद है कि ज़्यादातर पीएसयू और यहां तक कि केंद्रीय योजनाओं में भी हस्पतालों को शामिल किया जाता है अगर वह सीजीएचएस के पैनल में हों। इस लिए इन योजनाओं से एनसीआर दिल्ली में दूर रहना हस्पतालों के लिए मुश्किल हो जाता है। इस तरह सीजीएचएस के ज़रिए अस्पतालों का शोषण होता है।
मरीज़ की सुरक्षा रेगुलेटर या पेयर से जुड़ी होती है। दुखद यह है कि स्वास्थय मंत्रालय की शाखा सीजीएचएस इसके बिल्कुल विपरीत काम करती है। इससे पता चलता है कि वह अपने मरीज़ों की सुरक्षा की कोई परवाह नहीं करती और उनके लिए स्वास्थय सेवाएं भी आलू—प्याज की तरह खरीददती है।
इससे मरीज़ की सुरक्षा में गड़बड़ हो सकती है। सरकार को जल्दी ही समझ लेना चाहिए कि सरकार की लोगों को सुरक्ष्रित और किफायती स्वास्थय सेवाएं प्रदान करने का पक्का प्रबंध करेगी।
सीजीएचएस मेडिकल आपूर्ति की दरें वैज्ञानिक तरीके से तैय करे। सरकार एनएबीएच मान्यता वाले अस्पतालों से रेट आमंत्रित करे। जोकि मरीज़ की बेहरतीनल सुरक्षा के लिए मान्यता प्राप्त हों और प्रणाली, प्रक्रियाओं, उपकरण और मानव संसाथानों के आधार पर सेवाओं की संभावनाओं की जांच की जाए। फिर सीजीएचएस औसत निकाल कर पूरे देश में लागू कर सकता है।
असमान दरों के बावजूद सीजीएचएच समय पर अदायगी तो करे। दुख की बात है कि सरकारी सरकारी ऐजंसी होने के बावजूद सीजीएचएस 5 दिनों में 70 प्रतिशत अदायगी का लिखित समझौता पूरा नहीं कर रही है।
आज तक एक भी बिल इस अवधि में अदा नहीं किया गया है। यहां तक कि हस्पतालों को महीनों से लेकर सालों तक अदायगी नहीं की जाती। भारी बकाया रकम की वजह से इन हस्पतालों की हालत खराब हो गई है। सिस्टम इतना खराब हैकि कभी कभी तो कुल बकाया राशि 200—300 करोड़ तक पहुंच जाती है। एक हस्पताल समूह के तीन महीने से एनसीआर में 75 करोड़ रूपए बकाया हैं। ऐसे ही एक हस्पातल के 25 करोड़ बकाया हैं, जिसमें इलाज करने वाले डॉक्टरों की फीस भी शामिल है।
अगर वक्त पर अदायगी नहीं होगी तो डॉक्टर व हस्पताल काम कैसे करेंगे। डॉक्टर बिना देसी के सेवाएं देते हैं, जिसके लिए उन्हें मामूली फीस दी जाती है।
स्टेप्टोप्लास्टी के लिए 6613, टॉन्सिलेक्टॉमी के लिए 5750, अपैंडेक्टॉी के लिए 9324, कोरोनरी केयर और कार्डियक मॉनिटरिंग के लिए 863 और वेंटीलेटर चार्जेज़ प्रतिदिन केवल 611 रूपए होते हैं। जो इतनी फीस नहीं दी जाती तो देरी से दी जानी वाली रकम और ब्याज़ कैसे दिया जाएगा।
कुछ हस्पताल बकाए के मामले में बंदी के कगार पर पहुंच गए हैं।तामिलनाडू, आंध्रा और गुरजात में चल रही ऐसी योजनाएं पूरी तरह से डिजीटाईज़्ड हैं और दो से चार सप्ताह में अदायती होती है। सीजीएचएस में एडिशनल सेक्रेटरी रेंक का अधिकारी चलाता है और हम अब तक इसे मकसदपूर्ण, पारदर्शी और डायनमिक नहीं बना पाए।
एमसीआई के नियमों के अनुसार डॉक्टर पेशे का सम्मान करें। उनका मकसद मानवता की सेवा हो और वितीय फायदा दूसरे नम्बर पर हो। वह मरीज़ को प्राथमिकता दें। उनके लाभ और मरीज़ के हित में टकराव ना हो। इलाज से पहले फीस बताई जाए ना कि बाद में। ईलाज नहीं पैसा नहीं का समझौता ना हो। वह बिना किसी लाभ की उम्मीद के सेवाएं दे।उनका फर्ज़ बीमारों के प्रति है ताकि मरीज़ की अनदेखी ना हो।
वह दुर्घटना में पीड़ितों से एडवांस नहीं मांग सकते एसिड पीड़ितों, रेप और यौन पीड़ित बच्चों का मुफ्त इलाज करना होगा।
उनकी फीस क्लिनिकल इस्टेब्लिशमेंट एक्ट के अुनसार होगी और प्रदेश सरकार इस पर नियंत्रित कर सकती है।
डॉक्टर इन सब बातों का पालन करते हैं लेकिन उन्हें अपनी जायज़ फीस मिलनी चाहिए। अगर वह समय पर सेवाएं देने के लिए बाध्य हैं तो अदायगी भी समय पर मिलनी चाहिए।
सीजीएचएस, ईएसआई, पीएसयू और बीमा कंपनियां समय पर अदायगी नहीं करेंगे तो गुज़ारा कैसे होगा।
अगर कोई शंका है तो एक हिस्सा रख कर बाकी अदायगी कर देनी चाहिए। बहुत से अस्पताल 5 प्रतिशत काट कर बाकी अदायगी कर देते हैं।
नियत तारीख के बाद अदायगी के साथ मार्केट के अनुसार ब्याज दिया जाना चाहिए। अपभोक्त अदालत द्वारा डॉक्टर के खिलाफ मुआवज़ा देने के आदेश ब्याज़ सहित अदायगी करने का होता है। अनुराघा साहा मामले में 12 करोड़ मुआवज़े का आधा हिस्सा ब्याज था।