दिल्ली सरकार की नाक के नीचे चल रहे ऑटो घोटा ले का पर्दाफ़ाश। स्वराज इंडिया ने मुख्यमंत्री से मांगी सफ़ाई।
स्वराज इंडिया
प्रेस विज्ञप्ति, 29 नवम्बर
*• दिल्ली सरकार की नाक के नीचे चल रहे ऑटो घोटाले का पर्दाफ़ाश। स्वराज इंडिया ने मुख्यमंत्री से मांगी सफ़ाई। की सीबीआई जाँच की माँग।*
*• फाइनैंस माफ़िया और सरकार की सांठगांठ से 1 लाख 85 हज़ार का ऑटो 4 लाख 50 हज़ार में ग़रीब ऑटो ड्राईवर को बेचा जा रहा है।*
*• ऑटो घोटाले के कारण ऑटो चालकों के रोज़ाना कमाई पर बड़ा असर। नया ऑटो खरीदने के बाद भी फाइनैंसर्स के आगे बंधुआ बनने को मजबूर।*
*• सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का खुलेआम उल्लंघन करते हुए ऑटो परमिट की ट्रेडिंग (ख़रीद फ़रोख़्त) धड़ल्ले से जारी।*
अपनी रोज़ी रोटी और ग़रीब परिवार का पेट पालने के लिए जब एक बेरोज़गार दिल्ली में ऑटो ख़रीदने जाता है, तो उसे 1,85,000 रूपये का नया ऑटो 4,50,000 से 4,70,000 तक में मिलता है। असल कीमत से दुगने से भी ज़्यादा पैसे में ऑटो मिलने का कारण है दिल्ली सरकार और फाइनेंस माफ़िया के बीच मोटी कमाई के लिए सांठगांठ।
दिल्ली सरकार की नाक के नीचे चल रहे इस बड़े घोटाले का पर्दाफ़ाश करते हुए स्वराज इंडिया ने घोटाले से सम्बंधित कागज़ात पेश किये।
एक प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता अनुपम ने ऑटो घोटाले को दिल्ली के उन हज़ारों गरीब ऑटो चालकों के साथ छलावा बताया जिनके समर्थन से आम आदमी पार्टी आज सत्ता में बैठी है।
अनुपम ने पत्रकारों को विस्तार से जानकारी देते हुए बताया, "फाइनेंस माफ़िया और दिल्ली सरकार के गठजोड़ से सबसे पहले किसी पुराने ऑटो को किसी और के लाइसेंस बैज के नाम किया जाता है। फिर उस पुराने ऑटो को स्क्रैप कराके स्क्रैपिंग सर्टिफिकेट ली जाती है। ट्रांसपोर्ट विभाग इसके बाद नो ड्यू सर्टिफिकेट देती है। इसके बदले नया ऑटो ख़रीदने के लिए दिल्ली सरकार के ट्रांसपोर्ट ऑथोरिटी की मिलीभगत से एलओआई (लेटर ऑफ इंटेंट) जारी करवा दिया जाता है, और कानून के आँखों में धूल झोंकते हुए, सभी नियमों और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को धता बताते हुए ग़रीब ऑटो चालक को नया ऑटो फाइनेंस करवा दिया जाता है। हर कदम पर दिल्ली सरकार के परिवहन विभाग के अधिकारियों की सांठगांठ होती है, या हस्ताक्षर होता है। दिल्ली में लगभग सभी ऑटो फाइनेंस पर ही बिकते हैं। इस पूरे गोरखधंधे में फाइनेंसर की मुख्य भूमिका होती है जो सरकारी अधिकारियों, नेता, मंत्री से सांठ गाँठ करके ऑटो ड्राईवर का शोषण करता है।
इतना ही नहीं, इस गोरखधंधे को अंजाम देने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक के आदेश का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 16.12.1997 को M.C.Mehta Vs Union of India & Others मामले में यह स्पष्ट रूप से हिदायत दी थी कि किसी भी रूप में परमिट की ख़रीद फ़रोख़्त पाये जाने पर परमिट रद्द कर दिया जाएगा और साथ ही ऐसा करने वाले पर कानूनी कार्यवाई की जायेगी। परंतु दिल्ली सरकार और फाइनेंस माफ़िया की मिली भगत से सरेआम परमिट की ट्रेडिंग हो रही है। ऑटो रिप्लेसमेंट स्कीम की आढ में हो रहे इस घोटाले के कारण 1,85,000 रूपये के नए ऑटो की दिल्ली में कीमत 4,50,000 से 4,70,000 रूपये बना दी गयी है। ग़रीब और बेरोज़गार ऑटो चालक के पास आज कालाबाज़ारियों के चंगुल में फंसने के अलावा कोई रास्ता नहीं है।"
अनुपम ने दिल्ली सरकार के ऑटो घोटाले पर मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को घेरते हुए कहा, "आम आदमी पार्टी ने सत्ता का सफ़र ऑटो चालकों के कंधे पर बैठकर पूरा किया। पार्टी को 67 सीटें दिलाने में इन मेहनतकश और जुनूनी ऑटो चालकों का सबसे बड़ा योगदान था। आज ऑटो घोटाले के उजागर होने के बाद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के पास कोई नैतिक अधिकार नहीं बचता कि वो उस कुर्सी पर बैठे रहें जो ऑटो वालों की मेहनत और दुवाओं से मिली है।"
स्वराज इंडिया अध्यक्षमंडल के सदस्य पुरुषोत्तम ने प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए कहा, "दिल्ली में हर एक ऑटो की ख़रीद में 2,65,000 से 2,85,000 रूपये के कालेधन का लेनदेन हो रहा है। आज जब देशभर में पार्टियाँ काले धन पर बड़े बड़े दावे और बहस कर रही हैं तो दिल्ली सरकार में बैठे लोग ग़रीबों के पसीने की कमाई मार के काला धन बनाने में व्यस्त हैं।"
मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सत्ता में आने से पहले ऑटो ड्राईवरों को बड़े बड़े लुभावने वादे किए थे। ये अत्यंत ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि उन वादों को पूरा करना तो दूर, ऑटो चालकों के साथ आज ऐसा घोर अन्याय हो रहा है।
• सरकार के फ्रेश ऑटो स्कीम में भी अनियमितता और घपला। दिल्ली हाई कोर्ट में मामले की अगली सुनवाई 7 दिसंबर को।
• 8258 ऑटो चालकों को सफ़ल घोषित करने के बाद दिल्ली सरकार ने नहीं दिया ऑटो। 324 चालकों के तो ऑटो डिलीवरी होने के बाद रजिस्ट्रेशन नहीं किया गया।
• नया ऑटो साल भर से खड़ा खड़ा सड़ रहा लेकिन ग़रीब ड्राईवर बिना रजिस्ट्रेशन के इन गाड़ियों की किश्त भरने को मजबूर। साथ ही पेट पालने के लिए किसी और का ऑटो किराए पर चलाने को विवश।
• 5 दिसंबर को दिल्ली के ऑटो चालकों का हल्ला बोल।
ज्ञात हो की माननीय सर्वोच्च न्यायालय के 11.11.11 के आदेशानुसार दिल्ली में 45,000 नए ऑटो देने की बात कही गयी थी। इनमें से 35,000 ऑटो शीला दीक्षित सरकार द्वारा सड़कों पर आ गए। बाकि के 10,000 ऑटो देने का काम अरविन्द केजरीवाल सरकार के जिम्मे आया। सरकार के मंगाए गए आवेदनों में 8258 आवेदक सफ़ल पाये गए। इनके नाम सरकार ने अपने वेबसाईट पर सार्वजनिक भी किया। अदालत के आदेशानुसार ऑटो उसीको मिल सकता था जिसके पास दिल्ली का लाइसेंस बैज हो और कोई ऑटो ना हो। 21, 22 और 23 दिसंबर को सरकार ने 932 सफ़ल ऑटो चालकों के नाम एलओआई (लेटर ऑफ इंटेंट) जारी कर दिया। इन तीन दिनों में 324 ड्राइवरों ने एलओआई दिखाकर डीलरशिप से ऑटो की डिलीवरी भी ले ली। लेकिन 24 और 25 दिसंबर की छुट्टियों के अगले ही दिन, यानी 26 दिसंबर की सुबह मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इस स्कीम को ही रद्द कर दिया। ये बताया गया कि इसमें भ्रष्टाचार हुआ है, जिसका आज तक सरकार कोई सबूत नहीं दे पायी है।
स्वराज इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष योगेंद्र यादव ने दिनांक 17 नवम्बर को इस मसले पर दिल्ली के मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर ऑटोवालों के साथ इंसाफ़ करने की मांग की। मुख्यमंत्री की तरफ़ से पत्र का अब तक कोई जवाब नहीं आया है। अगर आगे भी दिल्ली सरकार हमारी मांगो पर कार्यवाई नहीं करती तो ऑटो चालक मजबूरन 5 दिसंबर को विरोध प्रदर्शन करेंगे।
इस नाइंसाफ़ी के शिकार ऑटो ड्राइवर्स की लड़ाई लड़ रहे सीमा नागपाल ने प्रेस वार्ता के दौरान बताया, "इन 8258 सफ़ल आवेदकों को 1,85,000 रूपये में ऑटो मिलने वाले थे। दिल्ली की फाइनेंस माफ़िया बिलकुल भी नहीं चाहती थी कि इतने सारे ड्राइवर्स को इस रेट पर ऑटो मिल जाए। सर्वोच्च न्यायालय के 2011 में आये आदेश के पांच वर्ष बाद भी यह ऑटो रोड पर नहीं आने दिए गए। इसके पीछे सिर्फ और सिर्फ फाइनेंस माफिया का हाथ है जो ट्रासंपोर्ट विभाग की मिली भगत से ऑटो सेक्टर को अपनी जागीर समझती है। इस कालाबाज़ारी के साथ काले धन का रोटेशन भी एक कारण है जिसके परिरामस्वरूप फ्रेश ऑटो को रोककर रिप्लेसमेन्ट स्कीम के तहत ऑटो परमिट की ट्रेडिंग एवम कालाबाज़ारी हो रही है।"
अधिवक्ता सुशील कुमार ने बताया कि ऑटो चालकों का यह मामला दिल्ली हाई कोर्ट में विचाराधीन है जिसकी अगली सुनवाई 7 दिसंबर को होनी है। उनका कहना था कि दिल्ली सरकार इन ग़रीब ऑटो चालकों के साथ इंसाफ़ करने की बजाय मामले में सीबीआई और केंद्र सरकार को घसीटकर ओछी राजनीति करना चाहती है।
अनुपम ने सरकार के संरक्षण में हो रहे इस घपले पर चिंता जताते हुए कहा, "1,85,000 रूपये का नया ऑटो 4,50,000 में मिलना आज इतनी आम बात हो चुकी है कि किसी ऑटो चालक को आश्चर्य नहीं होता। सरकार को भी कोई दिक्कत नहीं होती। सब कुछ नॉर्मल लगता है। यह घोटाला सिस्टम में इस कदर रच बस गया है कि ऑटो की असल कीमत ही 4,50,000 मान ली गयी है।
लेकिन जैसे ही सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर ऑटो देने की बात आती है, जैसे ही 1,85,000 का ऑटो 1,85,000 में मिलने वाला होता है, खुद सरकार ही कह देती है कि भ्रष्टाचार हो गया, वो भी बिना किसी सबूत या आधार के! और ग़रीब ड्राइवरों को सही कीमत पर उनका ऑटो नहीं मिल पाता। इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है कि जब तक ऑटो ख़रीद में भ्रष्टाचार होता है तब तक तो सब कुछ नॉर्मल, लेकिन जैसे ही सही कीमत पर ऑटो मिलने वाला होता है तो सरकार ही कह देती है कि भ्रष्टाचार हो गया! जब फाइनेंस माफ़िया के इशारे और मिली भगत से स्कीम रोकना था तो दिल्ली सरकार सीबीआई का नाम लेती है, क्या सरकार ऑटो घोटाले पर भी सीबीआई जाँच करवाएगी?
इस तरह के कुकर्मों के पीछे सरकार से मिलीभगत करने वाले ऑटो फाइनैंसर्स का सबसे बड़ा उद्देश्य होता है कि ग़रीब ऑटो ड्राईवर या तो किराए पर ही गाड़ी चलाता रहे, या फिर कमा कमा के हर महीने उन्हें पैसे देता रहे। फाइनेंसर का बंधुआ बना रहे, कभी सही मायने में ऑटो मालिक ना बन पाए।
मेहनतकश ऑटो ड्राईवर दिन भर पसीना बहाता है ताकि अपने परिवार का पेट पाल सके, दिल्ली जैसे शहर में रोज़ी रोटी कमा सके। सवारियों को लाते ले जाते वक़्त जिस मीटर के आधार पर वो चलता है उसकी सेटिंग ऑटो के सही दाम यानी 1.85 लाख के अनुसार की जाती है, ना कि कालाबाज़ारी वाली कीमत 4.50 से 4.70 लाख़ पर। हर महीने की उसकी मोटी किश्त कितनी कम होती अगर दिल्ली सरकार के नाकों तले यह घोटाला नहीं होता। अगर लाइसेंस बैज वाले सभी ऑटोचालकों को सही कीमत पर यानि 1 लाख 85 हज़ार में ऑटो मिल जाए तो मीटर रेट कम हो सकता है और ऑटो चालक का मुनाफ़ा भी बढ़ जाएगा। मतलब कि ऑटो घोटाले की रोकथाम से दिल्ली के आम लोग और ऑटो ड्राइवर्स दोनों का सीधा भला होगा। दिल्ली में कभी किसी सवारी से किराए को लेकर कोई बहस या झड़प नहीं होती। कितना खुशहाल होता दिल्ली का ऑटो चालक?"
*स्वराज इंडिया की मांग:*
*• दिल्ली सरकार के ऑटो घोटाले की सीबीआई जाँच हो और दोषियों पर कड़ी से कड़ी कार्यवाई की जाए।*
*• 324 ऑटो चालकों की गाड़ियों का तुरंत रजिस्ट्रेशन किया जाए। लाइसेंस बैज वाले सफ़ल ड्राइवरों को ऑटो दिया जाए।*
*• इस घोटाले पर तुरंत रोक लगे ताकि ऑटो भाड़ा मीटर रेट कम हो और ऑटो चालक का मुनाफ़ा भी बढे।*
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