महावीर को सिर्फ जानें या मानें ही नहीं, बल्कि जियें भी : डाॅ0 अलका अग्रवाल
महावीर को सिर्फ जानें या मानें ही नहीं, बल्कि जियें भी
जैन कोई जाति या सम्प्रदाय नहीं है यह एक ऐसा धर्म है जो जीवन को अच्छे तरीके से जीने की कला सिखाता है और दूसरे शब्दों में हम कहें तो यह एक बहुत ही वैज्ञानिक तरीका है जिसे अपनाकर व्यक्ति संयमित, स्वस्थ एवं खुशहाल जीवन जी सकता है। रूढि़वादिता से दूर, टोने-टोटके, ढकोसलों का जिसमें कोई स्थान नहीं और अपनी परम्पराओं को जीवित रखते हुए एक अनुशासित जीवन की ओर अग्रसर होने की शिक्षा जैन धर्म देता है। जैन धर्म की स्थापना स्वामी ऋषभदेव ने की। लेकिन इसका प्रचार प्रसार 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी के समय से हुआ। कुछ लोग महावीर स्वामी को ही जैन धर्म का प्रवर्तक मानते हैं। महावीर स्वामी के बताये हुये रास्ते पर चलकर हम सम्पूर्ण मानव जाति के प्रति अपने कर्तव्यों को भली-भांति पूरा कर सकते हैं। महावीर को मानना पर्याप्त नहीं है उनको जानना उससे आगे की बात है। जो लोग एक सीमित दायरे में बैठे हैं वे महावीर को नहीं समझ सकते। महावीर को जानना बड़ी बात है लेकिन यह भी अपने आपमें पूर्ण नहीं है, यहीं खत्म नहीं होता है। इसकी पूर्णता है महावीर को जीने में, महावीर ने स्वयं साधना का जीवन जिया। वे किसी दर्शन और मान्यता को लेकर नहीं चले। साधना, संयम और कठोर तपस्या का जीवन जीते हुए उसमें से जो तत्व निकला, वह महावीर का दर्शन बन गया। स्वतंत्रता एवं समता का महान आदर्श भगवान महावीर ने समाज एवं राष्ट्र के सामने प्रस्तुत किया, जो आज भी बहुत मूल्यवान है। परतंत्रता मनुष्य को असहाय बनाती है। वह चाहकर भी बहुत सारे निर्णय नहीं ले सकता। अपने विचारों की अभिव्यक्ति नहीं कर सकता। वह गुलाम बन जाता है और फिर उसे वही करना होता है जो करने के लिये उससे कहा जाता है। लेकिन भगवान महावीर का मानना था कि किसी को भी किसी पर हुकुमत करने का अधिकार नहीं है, प्रत्येक आत्मा स्वतन्त्र है। स्वतंत्र हो जाने पर हर व्यक्ति की अपनी सोच होगी। उसका अपना चिन्तन होगा और ऐसा होने पर भिन्नता होना स्वभाविक है और उसी भिन्नता की समस्या के समाधान के लिये भगवान महावीर ने समता का दर्शन दिया। हालांकि जब तक यह सृष्टि है, तब तक भिन्नता को कभी मिटाया नहीं जा सकता। हमारे सौंदर्य के लिये भिन्नता का होना बहुत आवश्यक है। भेद के आधार पर ही सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम् की कल्पना की जा सकती है। महावीर के अनुसार भेद बुरा नहीं है, वह बुरा तब बनता है जब हम निरपेक्ष बन जाते हैं। भगवान महावीर ने इस समस्या के समाधान के लिये सापेक्षता का दर्शन दिया। यह शाश्वत सत्य है कि इस पृथ्क्ी का हर एक मनुष्य एवं हर एक पदार्थ एक दूसरे से जुड़ा है। ऐसी कोई शक्ति नहीं कि वह आदमी को आदमी से और पदार्थ को पदार्थ से अलग कर सके। मनुष्य एक दूसरे पर आश्रित है और मनुष्य का विकास भी इसी के द्वारा सम्भव है, जब तक वे एक दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते, तब तक उनका और सम्पूर्ण पृथ्वी का विकास सम्भव नहीं है और यह सिद्धान्त महावीर के अहिंसा के संदेश पर ही आधारित है क्योंकि आदमी ने जो भी विकास किया है वह अहिंसा के आधार पर ही किया है। आज मानव की यह पद्धति बन गई है कि या मैं या तुम। ’हम’ की भावना जैसे समाप्त ही हो गई है। लेकिन महावीर के बताये सिद्धान्तों पर चलने से इस भावना को जीवित रखा जा सकता है। तेरे-मेरे के भेद को समाप्त किया जा सकता है। तभी हम सर्वांगीण विकास की बात कर सकते हैं। आज यह जो पूरा लोकतन्त्र जिया जा रहा है, भगवान महावीर के आधार पर ही जिया जा रहा है।
– डाॅ0 अलका अग्रवाल
निदेशिका,
मेवाड़ गु्रप आॅफ इन्स्टीट्यूशंस
वसुन्धरा, गाजियाबाद
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