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मकर संक्रांति विशेष: भीष्म पितामह की मृत्यु का रहस्य

गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी, संस्थापक एवं संचालक, दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान

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हमारी भारतीय संस्कृति आनंद मूलक, आनंद लक्षी और आनंद सृजक संस्कृति है। इसका प्रमुख कारण हैं- हमारे उल्लास पूर्ण पर्व और उत्सव। परन्तु इन पर्वों का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक अभिप्राय न समझने के कारण हम इनकी वास्तविक गरिमा से जुड़ नहीं पाते हैं। इनके लाभों से भी सर्वथा वंचित रह जाते हैं। पर्वों की परम्पराएँ हमारे लिए कर्मकांडों का व्यापार बनकर रह जाती हैं। इसलिए आज जनवरी माह के एक सांस्कृतिक पर्व में निहित परम कल्याणकारी आध्यात्मिक अर्थ को समझने का प्रयास करते हैं। यह पर्व है- मकर संक्रांति। इसे उत्तरायण की आरंभिक बेला भी कहते हैं। आइए, इस पर्व के गूढ़ार्थ में उतरें। यह घटना महाभारत कालीन है। भीष्म पितामह शर शैय्या पर लेटे हुए थे। उन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था। इसलिए वे अपने प्राण त्यागने के लिए एक महत्त्वपूर्ण घड़ी की प्रतीक्षा कर रहे थे। वे ऐसा क्यों कर रहे थे? शरों की शैय्या पर, रक्तरंजित स्थिति में कष्ट क्यों उठा रहे थे? इसका उत्तर हमें पौराणिक ग्रंथ देते हैं। ऐसा वर्णित है कि भीष्म पितामह सूर्य के उत्तरायण में जाने की प्रतीक्षा कर रहे थे। सांस्कृतिक भारतवर्ष में ऐसी मान्यता रही है कि उत्तरायण में प्राण त्यागने वाले सद्गति को प्राप्त होते हैं। इसके विपरीत दक्षिणायन में प्राण त्यागने वाले दुर्गति को प्राप्त होते हैं।

आइए, सबसे पहले इस मान्यता को खगोलीय दृष्टिकोण से समझते हैं। अगर हम पृथ्वी के मानचित्र को देखें, तो उसमें तीन प्रमुख रेखाएँ पृथ्वी से होकर गुज़रती दिखती हैं। इसमें पहली है, कर्क रेखा। दूसरी है, विषुवत रेखा या भूमध्य रेखा और तीसरी है, मकर रेखा। विषुवत रेखा पृथ्वी के मध्य से गुज़रती है। विषुवत रेखा के उत्तर के भाग को उत्तरी गोलार्ध तथा दक्षिणी भाग को दक्षिणी गोलार्ध कहा जाता है। अंतरिक्ष में पृथ्वी के घूमने के कारण वर्ष भर में सूर्य आधा समय उत्तर पूर्व की और आधा समय दक्षिण पूर्व की तरफ जाता आता दिखाई देता है। इसी प्रक्रिया में सूर्य ‘मकर रेखा’ तक जाता है। मकर रेखा पर पहुँचने की स्थिति को ‘मकर संक्रांति’ कहा जाता है। मकर संक्रांति के पश्चात्‌ सूर्य ऊपर या उत्तर दिशा को ओर बढ़ता है। सूर्य की इस उत्तर गति को ‘उत्तरायण’ की संज्ञा दी गई है। उत्तर में ‘आयन’ अर्थात्‌ गतिशीलता। इससे उत्तरी गोलार्ध में दिन का समय बढ़ने और रात्रि का समय घटने लगता है। सूर्य सिद्धांत के अनुसार ‘मकर संक्रांति’ (14 जनवरी) से ‘कर्क संक्रांति’ (16 जुलाई) के बीच का समय (6 माह) ‘उत्तरायण’ काल कहलाता है। इसमें सूर्य की गति मकर रेखा से कर्क रेखा की ओर होती है। इसी का पूरक है, ‘दक्षिणायन’, जो अगले 6 माह अर्थात्‌ ‘कर्क संक्रांति’ से ‘मकर संक्रांति’ तक का काल होता है। इसमें सूर्य की गति कर्क रेखा से मकर रेखा की ओर होती है। अब यहाँ एक बात विचारणीय है। जो खगोलीय तथ्य ऊपर लिखे गए, अगर उन्हें ज्यों का त्यों माना जाए, तो बड़ा विचित्र आशय सामने उभर कर आता है। यह कि साल के आधे महीनों में (मकर संक्रांति से कर्क संक्रांति तक) मृत होने वाले लोग अपने आप सद्गति को प्राप्त होते हैं। वहीं साल के अगले 6 महीनों (कर्क संक्रांति से मकर संक्रांति तक) में मरने वाले अधोगति को प्राप्त होते हैं। परन्तु क्या ‘मृत्यु’ और ‘गति’ के बीच में इतना स्थूल सम्बन्ध हो सकता है? हमारी भारतीय संस्कृति में तो बिल्कुल भी नहीं! इसलिए हमें इस पूरे प्रकरण को शास्त्रीय दृष्टि से भी समझना होगा।

प्रश्नोपनिषद्‌ (1/9) में ऋषि कहते हैं- संवत्सरो वै प्रजापतिस्तस्यायने दक्षिणं चोत्तरं च। तद्ये ह वै तदिष्टापूर्ते कृतमित्युपासते ते चान्द्रमसमेव लोकमभिजयन्ते। त एव पुनरावर्तन्ते तस्मादेत ऋषय: प्रजाकामा दक्षिणं प्रतिपद्यन्ते। एष ह वै रयिर्यः पितृयाणः॥ अर्थात् संवत्सर (वर्ष) के दो भाग हैं। छह मास तक सूर्य दक्षिण दिशा की तरफ जाता है। इस काल को ‘दक्षिणायन’ कहते हैं। छह मास तक वह उत्तर दिशा की ओर जाता है। इस समय को ‘उत्तरायण’ कहते हैं। जो सकाम भाव से कर्म करते हैं, फल-लाभ की इच्छा रखते हैं, सांसारिक भोगों को चित्त में स्थान देते हैं- ऐसे लोग जन्म-मरण के चक्र में फँसे रहते हैं। इनका मार्ग ‘दक्षिणायन’ है। इसे ‘रयि मार्ग’ भी कहते हैं, जिसमें भोग-वृत्तियाँ अत्यंत प्रबल होती हैं। पुत्र-पौत्रों की कामना और मोह ज़ोर मारता रहता है। इसलिए यह मार्ग ‘पितृयाण’ अर्थात्‌ पिता-पितामह बनने का मार्ग भी कहलाता है। इसके विपरीत जब सूर्य उत्तर की ओर प्रस्थान करता है, तब मनुष्य में त्याग व निवृत्ति भाव उमड़ने लगता है। यह दिव्य भाव उत्पन्न कर देव स्वरूप होने का मार्ग है। इसे ‘उत्तरायण’ या ‘देवयान’ मार्ग भी कहते हैं। गीता के आठवें अध्याय में श्लोक (23-26) में भगवान श्री कृष्ण भी अर्जुन से यही गूढ़ तथ्य कहते हैं- यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः। प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ॥ अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्‌। तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जना:॥ धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम्। तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते॥ शुकलकृष्णे गती ह्येते जगत: शाश्वते मते। एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः॥ अर्थात्‌ हे भरतकुलश्रेष्ठ अर्जुन! जिन कालों अथवा मार्गों में प्राण त्यागकर गए आस्तिकजन अनावृत्ति (अपुनर्जन्म) और आवृत्ति (पुनर्जन्म) को प्राप्त होते हैं, उन कालों या मार्गों को मैं तुमसे कहूँगा। अग्नि, ज्योति, दिन, शुक्लपक्ष तथा 6 मास वाला उत्तरायण- इनसे युक्त मार्ग पर मृत्यु के उपरान्त जब योगीजन बढ़ते हैं, तो वे ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। धूम, रात्रि, कृष्णपक्ष तथा 6 माह वाला दक्षिणायन- इनसे युक्त मार्ग पर जब मृत्योपरांत मनुष्य जन बढ़ते हैं, तो वे चन्द्रमा की ज्योति पाकर अर्थात्‌ स्वर्ग सुख भोगकर वापिस पृथ्वी पर लौट आते हैं। ये दो प्रकार के ‘शुक्लपक्ष’ (देवयान) और ‘कृष्णपक्ष’ (पितृयाण) मार्ग सनातन माने गए हैं। एक से मनुष्य अनावृत्ति अर्थात्‌ अपुनर्जन्म को, दूसरे से आवृत्ति अर्थात्‌ पुनर्जन्म का प्राप्त होता है। इन शास्त्रीय विवेचनाओं से यह स्पष्ट सिद्ध होता है कि बात सिर्फ उत्तरायण और दक्षिणायन ‘काल’ की  ही नहीं, ‘मार्ग’ की भी है। मनुष्य की ‘मनोवृत्ति’ और ‘साधना-प्रकार’ की भी है। महापुरुषों ने ‘कर्मकाण्ड मार्ग’ की तुलना में ‘ज्ञान मार्ग’ को श्रेष्ठ बताया है। बाह्य नहीं, अंतर्जगत की साधना को उत्तम घोषित किया है। इसलिए इस प्रकरण को हमें आंतरिक परिप्रेक्ष्य में ज़रूर समझना चाहिए। वास्तव में, इस सृष्टि का एक अद्भुत रहस्य है- ‘जो ब्रह्मण्डे सोई पिण्डे’ अर्थात्‌ जो खगोलीय क्रम बाहरी ब्रह्माण्ड में है, वही हमारे शरीर के भीतर अंतर्जगत में भी है। हृदय से हमारे सिर की ओर का भाग ‘उत्तर’ और पाँव की ओर का भाग ‘दक्षिण’ को सम्बोधित करता है। योगिक भाषा में कहें, तो ‘अनाहत चक्र’ से ऊपर ‘सहस्रार चक्र’ तक का भाग ‘उत्तरायण पथ’ कहलाता है। इसके विपरीत ‘अनाहत चक्र’ से नीचे ‘मूलाधार चक्र’ तक का भाग ‘दक्षिणायन पथ’ कहलाता है। उपनिषदों में ब्रह्मरंध्र (सहस्रार चक्र) को ‘ब्रह्मलोक’ कहा गया है। जैसे छान्‍दोग्योपनिषद्‌ (8/1/1) ब्रह्मरंध्र  को हृदयाकाश से इंगित करता है और उसमें ब्रह्म का वास बताता है- यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाश- स्तस्मिन्यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद्वाव विजिज्ञासितव्यमिति॥ अर्थात्‌ यह शरीर ब्रह्म की नगरी है- ब्रह्मपुर है। इसमें शीर्ष पर एक ‘दहर’ माने छोटा सा कमल है, जो हृदय रूपी मंदिर कहलाता है। इस हृदय मंदिर में सूक्ष्म हृदयाकाश है। इस हृदयाकाश के भीतर जो ब्रह्म छिपा है, उसे खोजना चाहिए, उसे जानना चाहिए। अतः इस हिसाब से शीर्षोन्मुख होकर ब्रह्मरंध्र की ओर बढ़ना ‘उत्तरायण’ पथ की ओर अग्रसर होना हुआ। यह ब्रह्मप्राप्ति के लिए ‘देवयान पथ’ का अनुसरण करना भी हुआ। हमारे अंतर्जगत में कौन सा तत्त्व सूर्य का प्रतीक है? प्रश्नोपनिषद (3/8) में ऋषि कहते हैं- ‘आदित्यो ह वै बाह्यः प्राण उदयत्येष…’। इसका तात्पर्य यही है कि जो बाह्य जगत में सूर्य है, वह अंतर्जगत में ‘प्राण’ है। प्राण ही आदित्य रूप होकर उदय होता है। अतः जैसे बाह्य सृष्टि में सूर्य उत्तरायण व दक्षिणायन पथ पर आता-जाता दिखाई देता है, उसी प्रकार हमारे भीतर सूक्ष्म जगत में प्राण भी गति करता है। जिसका प्राण नीचे (मूलाधार चक्र) की ओर अधोगामी है, वह मनुष्य ‘दक्षिणायन’ या ‘पितृयाण’ पथ पर चल रहा है। जिसका प्राण ऊपर (सहस्रार चक्र) की ओर ऊर्ध्वगामी है, वह योगी ‘उत्तरायण’ या ‘देवयान’ पथ का अनुगामी है। भीष्म पितामह ने शर-शैय्या पर लेटे हुए केवल वर्ष के उत्तरायण काल का ही इंतज़ार नहीं किया होगा। निःसन्देह, प्राणों के उत्तरोत्तर विकास का अभ्यास भी किया होगा। सहस्रदल कमल में स्थित ब्रह्म में प्राणों को लीन किया होगा। इसी आंतरिक व सूक्ष्म उत्तरायण स्थिति में मृत होने के कारण भीष्म पितामह परम गति को प्राप्त हुए होंगे। यही सार्थक तात्पर्य है। यहाँ हमें यह भी जानना चाहिए कि यह ‘निम्न’ से ‘उच्च’ स्तर पर कैसे जाया जाता है? ‘दक्षिणायन’ से ‘उत्तरायण’ पथ पर प्राणों को कैसे आरोहित करते हैं? इस संदर्भ में, एक घटना का वर्णन मिलता है। कहते हैं, वर्ष का दक्षिणायन काल चल रहा था। ऐसे में आदियोगी शिव दक्षिण दिशा की ओर उन्मुख हो गए और वे दक्षिणमूर्ति कहलाए। इस दक्षिणायन के अज्ञानता व अंधकारमय काल में आदिगुरु दक्षिणमूर्ति ने अपने शिष्यों को ब्रह्मज्ञान का उपदेश दिया। उन्हें अंतर्जगत में उतर कर ध्यान-साधना करने के लिए प्रेरित किया। तब शिष्य अपने आदिगुरु दक्षिणमूर्ति से प्रेरित होकर साधना में लीन हो गए। फिर ऐसा काल या अवस्था आई, जब निरन्तर ध्यान-साधना के प्रभाव से, उन साधकों के प्राण उत्तरोत्तर विकास कर उच्चतम लोक (सहस्रार चक्र) में समाधिस्थ हो गए। अतः स्पष्ट है, केवल एक पूर्ण गुरु और उनके द्वारा प्रदत्त पूर्ण ब्रह्मज्ञान ही हमें दक्षिणायन से उत्तरायण पथ का गामी बनाता है। हमें पितृयाण मार्ग के मोह आदि विकारों से निकाल कर दिव्य ‘देवयान’ मार्ग का राही बना देता है।

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