राहुल का बोध

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By  प्रोफ़ेसर बलवंत सिंह राजपूत
वरिष्ठ शिक्षाविद;
पूर्व कुलपति गढ़वाल और कुमाऊँ विश्वविद्यालय

 

लगभग पचास साल के बच्चे राहुल को पैतालीस साल के बाद कल बोध हुआ है कि1975 में उस समय की प्रधान मंत्री उनकी दादी श्रीमती इंदिरा गांधी ने देश में आपात काल लगा कर गलती को थी। अगर वे इसी बोध को उजागर कर देते तो कोई आश्चर्य ना होता परंतु उन्होंने कलंकित आपात काल की तुलना भारत की वर्तमान लोकतांत्रिक सरकार की कार्य प्रणाली से करते हुवे उस आपातकालीन प्रणाली को ही श्रेष्ठतर बता कर हमेशा की तरह अपने अज्ञान का ही परिचय दिया। उस कलंकित आपात काल की त्रासदी को मैने भी भोगा था जब 17 जुलाई 1975 को प्रातः चार बजे कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के परिसर में मेरे आवास को हरियाणा पुलिस के अधिकारियों तथा जवानों ने चारो तरफ से ऐसे घेर लिया था जैसे किसी आतंकवादी का एनकाउंटर होने जा रहा हो। ठीक से कपड़े चेंज करने का भी समय न देकर पुलिस को जीप में मुझे बिठा कर उस जीप के आगे पीछे तीन और वाहनों से घेरकर पुलिस स्टेशन मुझे ले जाया गया तो मैंने देखा कि विश्वविधालय के सात अन्य प्राध्यापको को भी ऐसे ही उनके घरों से रात में लाया गया था।बिना कारण बताए ही दिन के दस बजे करनाल के जिला न्यायालय में प्रस्तुत करके जेल ले जाया गया तो पता चला की हमारे उपर इंदिरा सरकार का तख्ता पलटने का षडयंत्र करने का आरोप लगा कर डिफेंस ऑफ इंडिया रूल (D I R) की धारा 33लगाई गई थी और फिर 6 महीने तक नो वकील, नो अपील और नो दलील को अनुमति थी। उसी जेल में जिले के कई अन्य अध्यापकों तथा बुद्धिजीवियो को इसी प्रकार बंद कर दिया गया था एवम कुछ को अनेक प्रकार की शारीरिक यातनाएं भी दी गई थी। देश की अन्य जेलो में भी सभी विश्विद्यालयो के अनेक निरपराध प्राध्यापको को इसी प्रकार अनिश्चित काल कि लिए बंद कर दिया गया था। स्वतंत्रता से पूर्व विदेशी आक्रमणकारी सुल्तानो, मुगलों तथा अंग्रेजी शासन में भी देश के अध्यापकों तथा बुद्धिजीवियो के साथ ऐसी क्रूरता कभी नही हुई थी। उस समय कांग्रेस के शासन में सविधान तथा सभी संस्थागत ढांचो की पूर्णतः उपेक्षा की गई थी। आज की सरकार की लोकतांत्रिक प्रणाली के साथ उस कलंकित आपात काल की तुलना करने का प्रयास कोई मूर्ख ही कर सकता है जिसे लोकतांत्रिक प्रणाली का लेशमात्र भी ज्ञान न हो।आज की इसी लोकतांत्रिक प्रणाली में राहुल राष्ट्रहित को समर्पित वर्तमान प्रधानमंत्री जी का नाम ले ले कर प्रतिदिन अभद्र तथा अपमान जनक टिपण्णी करके भी अभी तक जेल से बाहर है जब कि आपात काल में क्या हो सकता था इसकी वह कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।

जहा तक संस्थाओं पर कब्जा करने की बात है वो तो आजादी के बाद से ही तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू ने ही सभी राष्ट्रीय स्तर के बौद्धिक संस्थानों पर वामपंथियों को सतारूढ़ कर दिया था ओर तभी से ये प्रक्रिया कांग्रेस शासन में अविरल रूप से चलती रही थी। इसी के चलते अनेक कुपात्रो को पद्म श्री तथा उस जैसे अनेक पुरस्कारों से लादा जाने लगा था जिस से खिन्न होकर अनेक राष्ट्र वादी श्रेष्ठ बुद्धि जीवियो ने इन पुरस्कारों को छद्म श्री घोषित किया था। आज जब सारी प्रक्रिया को स्वच्छ तथा पारदर्शी बना बना दिया गया है तो राहुल को सब जगह आरएसएस की घुसपेंठ लग रही है।

‌जहा तक राहुल की कांग्रेस के आंतरिक लोकतंत्र का प्रश्न है वो सब जानते है कि इस पार्टी पर केवल ऐक ही परिवार का कब्जा सदा रहा है जो किसी भी लोकतांत्रिक प्रणाली में संभव नही है। इसी प्रकार देश के अनेक विश्व विद्यालयो तथा शैक्षणिक संस्थाओं के नाम इसी परिवार के अनेक सदस्यों के नामों पर है। क्या ये ही कांग्रेस की लोकतांत्रिक प्रणाली है।

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