कश्मीेर में पत्थरबाजी सेना के समक्ष बड़ी चुनौती !

Anil Nigam

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रमजान के महीने में जम्मू कश्मी्र में ऑपरेशन न करने के राजनैतिक फैसले ने सेना और सुरक्षा बलों के समक्ष बहुत बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। ये समस्या इसलिए जटिल होती जा रही है क्योंकि कश्मीर में पत्थरबाजी की घटनाएं रुकने का नाम नहीं ले रही हैं। आतंकवादियों के बहलाने-फुसलाने अथवा धमकाने के चलते वहां के युवा दिग्भ्रमित हो रहे हैं। उनको शायद इस बात का भान नहीं है कि पूरे देश के लिए त्याग बलिदान करने वाले सेना के जवानों अथवा अन्य सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंककर वे अपना और देश का कितना बड़ा अहित कर रहे हैं।

 

ध्यान देने की बात यह है कि पिछले कुछ समय में सुरक्षा बलों ने जम्मू-कश्मीर में कई बड़े आतंकियों को मार गिराया है। उन्होंने घाटी में आतंकी नेटवर्क को कमजोर किया है। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि सुरक्षा बलों को इस समय सबसे बड़ी चुनौती आतंकियों से नहीं बल्कि पत्थरबाजों से मिल रही है। पिछले कुछ महीनों में पत्थरबाजों ने पत्थर के साथ-साथ फायर करना, बम फेंकना और कभी-कभी तो जवानों पर एसिड फेंकना प्रारंभ कर दिया है। देश के न केवल प्रबु्द्ध नागरिकों को बल्कि आमजन को इस विषय पर मंथन ओर चिंतन करने की आवश्यकता है कि क्या प्रदेश सरकार के ढुलमुल रवैया के साथ कश्मी‍र में अमन चैन की वापसी हो सकती है?

 

सेना और सुरक्षा बलों के समक्ष सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि वे दुरुह क्षेत्रों में सर्च ऑपरेशन और आतंकी ठिकानों को नष्ट करने की कार्रवाई नहीं कर सकते। इसके अलावा अगर उनकी आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ होती है, तो उस मुठभेड़ स्थल तक पहुंचना भी उनके लिए जटिल हो गया है। रमजान के महीने के लिए बनाए नियम के अनुसार, सुरक्षा बलों की गश्त भी अपेक्षाकृत कम की जाएगी। निस्संदेह, रमजान के महीने में सेना और सुरक्षा बलों द्वारा पत्थजरबाजों के खिलाफ ऑपरेशन न करने का फैसला स्वा गत योग्या है, पर यहां गौर करने की बात यह है कि आतंवादियों को इस दौरान अपने ठौर-ठिकानों और नेटवर्क को और अधिक मजबूत करने का मौका अवश्य मिल जाएगा, जिसे बाद में सुरक्षा बलों को भेदने में और अधिक समस्या का सामना करना पड़ेगा।

 

मीडिया से प्राप्त खबरों के मुताबिक, हाल ही की एक घटना में स्‍थानीय लोगों के एक समूह ने क्विक रिएक्शन टीम के भारी हथियारों से भरे वाहन पर हमला कर दिया था। इससे पहले भी भीड़ ने कई बार सेना के काफिले पर हमला बोला है। सैनिकों की बेइज्जमती और अपमान करने के अनेक वीडियो और खबरें सोशल मीडिया में वायरल हो चुकी हैं। विभिन्न घटनाओं को देखकर ऐसा आभास होता है कि आतंकवादियों ने सैनिकों और सुरक्षा बलों के खिलाफ युवा पीढ़ी के लोगों के अंदर विष भर दिया है। पिछले कुछ महीनों में घटी वारदातों से यह महसूस होने लगा है कि जैसे ऑपरेशन को बाधित करने के लिए भीड़ पूरी तरह से तैयार हो गई है। वास्तविकता तो यह है कि ऐसे लोग ऑपरेशन रोकने में कई बार सक्षम भी हो जाते हैं। विगत दिनों दक्षिणी कश्मीर में आर्मी के एक वाहन पर पत्थरबाजों ने पेट्रोल बम फेंका था, यह इस तरह की बढ़ती घटनाओं का एक प्रमुख उदाहरण है। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2018 में जम्मू कश्मी र में लगभग 70 आतंकवादी मारे गए, जबकि सेना के 30 जवान शहीद हुए। 48 आतंकवादियों ने सीमापार से भारत में अवैध तरीके से घुसपैठ करने का प्रयास किया। पाकिस्तासनी सेना ने 863 बार सीमा पर सीजफायर का उल्लंपघन किया।

 

केंद्र में शासन करने वाले दल भाजपा ने खुद आधिकारिक बयान जारी कर कहा कि कश्मीर घाटी में पाकिस्तान और अलगाववादियों ने ‘कम लागत, अधिक प्रभाव’ वाली नई रणनीति के तहत नौजवानों को पैसे देकर सुरक्षा बलों पर पत्थरबाजी का पैंतरा अपनाया है। इस पर पिछले एक साल में 50 करोड़ रुपए से अधिक खर्च किए गए हैं।

 

भाजपा के प्रवक्ता प्रकाश जावडेकर ने दावा किया कि सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों ने बताया है कि कश्मीर में सुरक्षाबलों द्वारा आतंकवादियों की दूसरी पंक्ति का सफाया कर देने के बाद पाकिस्तान ने आम नागरिकों को पैसे देकर पत्थरबाजी की नई रणनीति अपनाई है। भाजपा नेता का दावा है कि आतंकवादियों को जिस इलाके में पत्थरबाजी करनी होती है, वहां पर ट्रकों के जरिए पहले से ही पत्थर पहुंचा दिए जाते हैं। इसके बाद उस इलाके के किशोरों को 500-500 सौ रुपए देकर सुरक्षाबलों पर हमला करने के लिए बहलाया-फुसलाया जाता है। उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार इसके खिलाफ असरदार रणनीति अपनाने की बजाय सुरक्षाबलों पर ही संयम बरतने का दबाव बना रही है। सुरक्षा बलों के खिलाफ हत्या और मानवाधिकार उल्लंघन के मामले भी बनाए जा रहे हैं।

 

पत्थरबाजों के खिलाफ कोई कार्रवाई न होने से सुरक्षा बलों और सैनिकों का मनोबल लगातार गिर रहा है। निस्संवदेह यह हमारे देश और समाज के लिए चिंताजनक बात है। मैं देश की सरकार और सभी बुद्धजीवियों का ध्यान 1980 और 90 के दशक में पंजाब में आतंकवाद की ओर ले जाना चाहता हूं। वहां भी पाकिस्ता9न की शह पर आतंकवादियों ने अलग राष्ट्र खालिस्तांन की मांग को लेकर जबर्दस्तह हिंसा की थी। समस्यान से निपटारे के लिए तत्कालीन केंद्र और राज्य सरकारों ने केपीएस गिल को प्रदेश में पुलिस महानिदेशक की कमान सौंपकर आतंकवादियों के खिलाफ अभियान छेड़ने की पूरी आजादी दी थी। केंद्र और राज्य सरकारों ने इस मुद्दे पर किसी भी तरह की गंदी राजनीति नहीं की, बल्कि वे सुरक्षा बलों के साथ डटकर खड़ी रहीं। यही कारण है कि वहां पर सुरक्षा बलों का मनोबल हमेशा ऊंचा रहा और इसी का नतीजा था कि पंजाब राज्य को आतंकवाद से मुक्त कराया जा सका। अगर हमारी सरकारें सचमुच गंभीरता के साथ जम्मूे-कश्मीर को आतंकवाद से मुक्तत कराना चाहती हैं तो मामूली संशोधनों के साथ उसी फार्मूला को लागू कर सफलता प्राप्त की जा सकती है।

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