जानें 100 रुपये की कमाई से पद्मभूषण तक की जीवन यात्रा । विश्वविख्यात मूर्तिकार राम सुतार जी की

टेन न्यूज़ नेटवर्क

नई दिल्ली (20/02/2022): आज जानें माने मूर्तिकार पद्मभूषन राम सुतार जी का अवतरण दिवस है। आज वह 97 वर्ष के हो गए है। उन्होंने अपने जिंदगी में बहुत बड़े-बड़े मूर्तियां बनाई है और उन्होंने कला के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान कायम किया है। उन्हें पद्मभूषन पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। उन्हें बचपन से ही मूर्तिकार बनने का शौक था और उन्होंने पूरी लगन और मेहनत से एक बड़ा नाम हासिल किया है। चलिए जानतें हैं टेन न्यूज़ नेटवर्क के माध्यम से जानें माने मूर्तिकार पद्मभूषन राम सुतार जन्मदिन के अवसर पर उनके जीवन और सफलता से जुड़े कुछ खास बातें।

उनके पढ़ाई और करियर के बारे में

उन्होंने अपनी जिंदगी का सफर छोटे से गांव धुलिया से शुरू किया था जो महाराष्ट्र में स्थित है। उन्होंने अपनी पढ़ाई अलग-अलग गांव में जाकर किया जिसके बाद उन्होंने मुंबई में जाकर 4 से 5 सालों का कोर्स किया था। उनके करियर की शुरुआत मुंबई से हुई। उन्हें अपने करियर का पहला काम मुंबई में मिला जो की शिल्पकार का था वहां पर वहां पर करीब 4 साल रहे वहां पर काफी काम होने के बाद उन्हें दिल्ली आने का मौका मिला वहां पर सर्विस करते-करते उन्हें दिल्ली में काम मिला और फिर उन्हें वहां से सर्विस छोड़ना पड़ा। उसके बाद वह दिल्ली में रहना शुरू कर दिए। इस तरह उन्हें काम मिलता गया और उनके जिंदगी में कोई भी रुकावट नहीं मिला है। यदि आप लगन से काम करते हैं तो आपको खुद भी नहीं पता चलता हम कहां चलते जा रहे हैं और ऐसे ही जिंदगी में सफलताएं मिलती रहती हैं।

जानें कौन है उनके रोल मॉडल

उन्होंने कहा कि जब उन्होंने धुलिया में इंग्लिश स्कूल में शुरुआत किया था तो वहां पर श्री राम कृष्ण जोशी करके एक अध्यापक थे। उन्होंने कहा कि जब हमें पता चला कि वहां पर श्री राम कृष्ण जोशी नाम का एक बहुत अच्छे शिक्षक हैं तो मैं उनसे जाकर मिला और अपना काम बताया और वह यह जानकार बहुत खुश हुए और तब से उन्होंने मेरी मदद करनी शुरू की थी। उन्होंने मेरा काम देखा और 1948 में उन्होंने मुझे गांधी जी की मूर्ति बनाने के लिए कहा था। फिर मैंने मूर्ति बनाई और उसके लिए उन्होंने मुझे ₹100 दिया था और वह मूर्ति आज भी मेरे पास है। इस तरह जोशी ने मेरी मदद की और उन्होंने मुंबई में मेरे रहने का इंतजाम कर दिया था। धीरे-धीरे मुझे काम मिलता गया और पैसा आता गया और इस तरह मुझे बहुत बड़े-बड़े काम करने का मौका मिला।

बचपन से ही मूर्तिकार बनने का शौक

उन्होंने कहा, मैं बचपन से ही मूर्ति बनाने का काम करता था। जब मैं छोटा था तो मैं गोबर और मिट्टी से दीवारों पर मूर्ति बनाया करता था। मैं लोगों से कहना चाहता हूं कि जब हम कोई काम करते हैं तब हमें बहुत पीछे और आगे का नहीं सोचना चाहिए। क्योंकि पीछे सुख-दुख देखने का कोई फायदा नहीं होता और बहुत आगे भी नहीं सोचना चाहिए कि हम क्या करेंगे और क्या नहीं करेंगे बस हम जहां पर भी है और जो काम आप कर रहे हैं उसे बस आप पूरी लगन से करते रहिए। एक दिन ऐसा आएगा कि आपको खुद भी नहीं पता चलेगा कि आप कहां पहुंचे हैं। बस हमें चलते रहना चाहिए और मंजिल तय करेगी कि आप कहां पहुंचेंगे और मैं इस तरह चलता गया और आज मंजिल देखिए कहां पहुंचा दिया है।

जानिए उनके जन्मदिन के अवसर पर उनके पसंदीदा फिल्में और गाने

उन्हें फिल्में और संगीत ज्यादा पसंद नहीं है। उन्हें थोड़ा बहुत गाने का शौक है। उन्होंने बचपन में कुछ दिनों तक बांसुरी भी बजाया था लेकिन वह ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाया था।

स्कूल से मिला प्रोत्साहन

जब वह अपने गांव में थे तब वहां पर एक ब्राह्मण अध्यापक हुआ करते थे तो उन्होंने उसे गणेश जी की मूर्ति बनाने के लिए कहा था और उन्होंने एक बड़ा सा गणेश जी का मूर्ति बनाया था और वह उनकी पहली मूर्ति था और उन्होंने कहा कि उन्हें खुद भी नहीं पता कि उन्होंने यह मूर्ति कैसे बनाया था।

दूसरी मूर्तिकारों की तुलना में अलग है मूर्ति बनाने का अंदाज

मूर्ति को बनाने वक्त हम उनके बारे में सोचते हैं कि हम किसकी मूर्ति बना रहे हैं वह कौन है, उनका चेहरा कैसा है, और वह कैसे स्वभाव के है जैसे हर एक चेहरे पर मसल्स होते हैं। जैसे मसल्स अलग होते हैं काम करने के लिए वैसे ही स्वभाव बता देता है यदि कोई व्यक्ति गुस्से में है तो उसके चेहरे का मसल्स अलग होगा यदि व्यक्ति हंसता हुआ है तो उनके चेहरे पर मसल्स अलग होते हैं। जब हम स्टडी करके कुछ करते हैं तब हमें उसके व्यक्तित्व के बारे में पता चलता है।

उन्होंने आखिर में कहा, दूसरी मूर्तिकारों को मैं यही कहना चाहूंगा कि जो आप बनना चाहते हैं बस आप उसे पूरी लगन से कीजिए और उसे करते जाइए और आप मंजिलों की चिंता मत कीजिए आपकी लगन आपको मंजिले तक पहुंचा देगी।

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