कोरोनांजलि – विश्व के हिंदी साहित्यिक रचनाकारों ने कोरोना को दी श्रद्धांजलि – टेन न्यूज़ लाइव पर अनोखी प्रस्तुति

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टेन न्यूज़ पर कोरोनांजलि कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य साहित्यिक रचनाकारों द्वारा कोविड प्रभावित जन-मानस को शाब्दिक, साहित्यिक सांत्वना देने और उनके उत्साहवर्धन हेतु प्रयास करना था।

 

इस कार्यक्रम की प्रस्तुति कवियत्री एवं मंच संचालक अनुपम रमेश किंगर, बहरीन द्वारा किया गया। इस कार्यक्रम तीन चरणों में टेन न्यूज़ लाइव शो फेसबुक, यूट्यूब प्लेटफॉर्म पर प्रसारित किया गया। इस कार्यक्रम के पहले चरण में कवियत्री डॉ शकुंतला सरूपरिया, उदयपुर, राजस्थान;
श्री हेमन्त ‘स्नेही, नोएडा, श्री कृष्ण कुमार क्रांति, सहरसा, बिहार, श्री आशीष प्रकाश, ग़ाज़ियाबाद, डॉक्टर राजीव कुमार दास, हज़ारीबाग़, झारखंड, श्रीमती रेखा नायर,अहमदाबाद, गुजरात,*

कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए कवियित्री अनुपम रमेश किंगर ने कहा कि आज का हमारा ये कार्यक्रम कोरोना को श्रद्धांजलि , कोरोना पीड़ितों क़ों आदरांजली और एक काव्यांजलि के रूप में है। हम सब आज एक बहुत ही कठिन समय से गुजर रहे हैं। शाख से पत्तों की तरह रिश्ते टूटते बिखरते चले जा रहे हैं, कल कोई अपना आज नहीं रहा, आज मैं आपके घर आती हूं श्रद्धांजलि सुमनअर्पित करने, कल आप मेरे घर आ गए होते हैं, इस तरह के माहौल में, इस तरह के डर में, इस तरह की परेशानी में, एक कवि क्या करे ? एक साहित्यिक क्या करें ?

 

अनुपम रमेश किंगर ने एक कहानी सुनाते हुए कार्यक्रम की शुरुआत की और कहा की जिस समय पृथ्वीराज चौहान लड़ रहे थे और लड़ते लड़ते हार गए थे उनके हर उस एक 18 युद्ध में उनका साथ देने वाला उनका परम मित्र उनका कवि मित्र मुझे पता भी नहीं लालचंद परसई था। अंतिम युद्ध भी उन्होंने उनके साथ लड़ा उन्हें यह बता कर कि उनका शत्रु कितनी दूरी पर है आज हम देश और विदेश के विभिन्न प्रांतों में बैठे हुए कवि यह तो नही जानते की यह कोरोना रूपी शत्रु कहा कहा और किस किस रूप में बैठा हुआ है।

 

हेमन्त ‘स्नेही, नोएडा ने इस कार्यक्रम में अपनी बात रखते हुए कहा कि जैसा कि हम सभी जानते है हम भारतीय हर संकट पर विजय प्राप्त कर ही लेते है बड़े से बड़े संकट पर विजय प्राप्त करना हमारी प्रकृति और हमारा स्वभाव है। उन्होंने कहा मानते हैं रात काली है, पर शपथ हमने उठा ली है। दीप खुशियों के जलाएंगे, हम नया सूरज उग आएंगे। भूल गया है विश फिजाओं में, सास भी दूभर हवाओं में, बांटता पर विश्व को भारत, जिंदगी भर कर दवाओं में, मिल सके अमृत मानव को, बूटियां ऐसी उगाएंगे, हम नया सूरज उगाएंगे।

 

रेखा नायर ने भी इस कार्यक्रम में शिरकत की उन्होंने कहा कि जिंदगी ने इस महामारी के समय बहुत रंग दिखाए है तो जिंदगी के इस रवैय्ये के प्रति रेखा नायर ने अपने दृष्टिकोण को कविता में पिरोहते हुए कहा जिंदगी अब और ना सिखा कह दे अब जी कर दिखा। पाठ तूने बहुत पढ़ाया है, जिंदगी के नाम पर क्या क्या दिखाया। त्रासदी के तूने तांडव दर्शाए, शुर विषैले राय बिछाए। धुंध कोहरा की काली रात, निष्ठुर निर्मम बन दिए आधात। पर सुन जिंदगी अब है मेरी बारी, व्यतीत है मन, काया जरा थकी हारी, पर नहीं टूटा है हौसला, नहीं टूटी है आस, जाना है हमें प्रकृति में निहिक, पतझड़ और मधुमास, तपते ग्रीष्म और शुष्पशीत का होता है एक दिन अंत।

 

कवियत्री डॉ शकुंतला सरूपरिया ने कार्यक्रम में अपनी प्रस्तुति पेश करते हुए कहा की हमारी हथेलियों में प्रार्थना की भाषा है और आपका पूरी हो यही अभिलाषा है। इस वक्त किस सदी की सबसे बड़ी त्रासदी है कोरोना, आंगन आंगन दुख का अंधेरा, कब आएगा सुखद सवेरा, लाशों की बस्ती उग आई, शहर शहर कोरोना ने घेरा, नैनों में बस ख्वाब उदासी, बोझिल जिंदगी, बुझा हर चेहरा, हक्की बक्की रह गई दुनिया, इस खतरे का ना था बेरा दोष दे किसको इस बर्बादी का, है कसूर यह तेरा मेरा।

 

डॉक्टर राजीव कुमार दास ने कार्यक्रम के दौरान अपनी प्रस्तुति पेश करते हुए कहा वो इधर रो रहा, वो उधर रो रहा, वह इधर रो रही वह उधर रो रही, हर तरफ मौत की बारिश है हो रही, मौत किसको कहा कब मिले क्या पता, उम्र के पहले ही जिंदगी सो रही, जिस तरफ देखिए बस तबाही मची, धीरे-धीरे लगे दुनिया सो रही।

 

लेखक आशीष प्रकाश भी इस कार्यक्रम में शामिल हुए उन्होंने अपनी प्रस्तुति पेश करते हुए कहा की फेल कर जब दो भुजाएं, सूर्य को लेती जकड़, विश्व ग्रहण का जब लेता पूरी पृथ्वी को पकड़, फिर भी पल भर बाद बसन्त पार चढ़ जाना ही है, हो चाहे जितना घना अंधेरा, प्रकाश तो आना ही है।

 

उन्होंने आगे कहा कि रखो ख्याल अपना हिफाजत से दोस्तों, दिल आ गए हिदायत से जीने के दोस्तों, थोड़ी दुआएं गैर के हिस्से में भी करो, बनते हैं बिगड़े काम इबादत से दोस्तों। आशीष ने कहा इस कोरोना काल में हमने बहुत लोगों को खोया हमने अपने प्रिय मित्र रोहित सरदाना को खोया, हमने अपने गुरुदेव कुंवर बेचैन को खोया, हमने सुंदरलाल बहुगुणा जी को खोया तो उस समय अंदर से एक शोर सा निकला की मांगो दुआएं आज हिंदुस्तान के लिए, आदम ना जाए कोई भी शमशान के लिए।

 

कार्यक्रम के आखिर मे कवियित्री अनुपम रमेश किंगर ने एक कविता सुनाते हुए कहा ये कविता जो लिख रही है वो एक बेटी भी है और एक माँ भी है। इस संदर्भ में उन्होंने अपनी पंक्तियों में कहा – लुका छुपी खेल रहा है, यह कौन छुपकर बैठा है।हमारी आंख पर बंधी है पट्टी, लेकिन उसको सब कुछ दिखता है ॥यकायक अचानक कोई गया पकड़ा, मुझे ना मालूम अपना या पराया था, धरती हिली हम चीख उठे, डर तो था सहारा ना था।कहर से इसके कोई ना बचा, कोई नन्ही कोपल, कोई वृक्ष बड़ा, कोपल गई तो गिरे आंसू, और वृक्ष गिरा तो हिली धरा, जहां छांव में इन वृक्षों की बचपन निकला और जीवन बिता, अब नहीं रहे वों, है गिरे हुए, है सर पर काले बादल की छाया, है शब्द गूंजते उनके अब भी, है छंद उनके हवाओं में, रग रग में दौड़ते भाव उनके, है यादें हरशों फिजाओं में।

टेन न्यूज़ पर आयोजित कोरोनांजलि कार्यक्रम के दूसरे चरण में डॉ. सरोजिनी ‘तनहा’, मेरठ, पं.शिवप्रकाश जौनपुरी, मुंबई, डॉ. कृष्ण कुमार ‘बेदिल’, मेरठ, श्री सतीश दीक्षित, नोएडा, श्रीमती अंजु मल्होत्रा, नोएडा, श्रीमती पद्मावती कंवर, अबूधाबी शामिल हुए।

 

अनुपम रमेश किंगर ने इस कार्यक्रम की शुरुआत छोटी सी कहानी के साथ कि उन्होंने कहा कि लड़ाई थी सारागढ़ी की वर्ष था 1897 हमारे 21 भारतीय सैनिक 15000 अफगानिस्तानी सैनिकों से लड़ रहे थे। उनका मुकाबला जिन सेनिको से था उनका तो कोई नाप नही था लेकिन भारतीय सेना के मुख्य ईशर सिंह ने अपने सबसे कमजोर सैनिक नंद सिंह को कहा कि अगर तुम बन्दूक नही उठा सकते तो मत उठाओ लेकिन अपनी मसक उठाओ और घायल सैनिकों को पानी पिलाओ। अनुपम रमेश किंगर ने कहा मझे लगता है हम सब कवि मित्र यह पर वो नंद सिंह है जो अपने शब्दों की मसक उठाये आपके पास आ रहे है आपको हिम्मत का पानी पिला रहे है और आपको कह रहे है कि ‘देखिए हारियेगा नही, माना कि अंधेरा भर घना है, मगर एक दिप जलाना कब मना है, हम सब वही दिप जलाने का प्रयास कर रहे है, आप सभी को आशा और विश्वास दिलाने का काम कर रहे है, की यह अंधेरा भी छटेगा वो भोर भी आएगी, जब फिर गले मिल पाओगे, जब फिर मुस्कुराहट फेल जाएगी।’

 

अंजू मल्होत्रा ने इस कार्यक्रम में अपनी बात रखते हुए कहा कि हम एक शब्द को कितना अच्छा मानते थे और बच्चो को भी कहते थे कि पॉजिटिव रहिए लेकिन आज वही एक शब्द कितना नेगेटिव बन गया । बहुत दुख होता पिछले वर्ष समय में हमने कोरोना का वो भीषण रूप देखा की बहुत से अपनो को खोया है। तब मन में एक विचार आया कि है मानव अब तुम ध्यान धरो, उस शक्ति का कुछ अनुमान करो, सुविचारों का भी ध्यानधरो, स्थिरता का भी सम्मान करो, मतलब से मत जियो मरो, उठ ना पाओ इतना मत गिरा करो, क्रोध की पीड़ा में मत लिप्त रहो, असमय की इस खामोशी से कुछ तो डरो, खामोशी का भी गुणगान करो, विजय गिरना नही, गिर के उठना है, इस तथ्य का भी सम्मान करो, है मानव अब तुम ध्यान करो

 

डॉ. कृष्ण कुमार ‘बेदिल’ ने इस कार्यक्रम में अपने विचारों की प्रस्तुति करते हुए कहा की ऐसे विपत्ति के समय जब पूरा विश्व इस महामारी से जूझ रहा है कवि का यह दायित्व है कि वह अपने रचनाओं के माध्यम से ऐसा सन्देश दे जिससे सकारात्मक ऊर्जा सब जगह संचालित हो। तूफान में कश्ती हो तो पथवार कलम है, मैदान में दुश्मन हो तो तलवार कलम है, इतिहास है गवाह की थी जब जब जरूरत, बन जाये ए तब तब मेरी तलवार कलम है। उन्होंने आगे कहा क्योंकि इंसान जैसा सोचता है वैसा ही वह करता है। इसलिए हमें हमेशा सकारात्मक सोचना चाहिए तभी आप जीवन में सफल हो सकते है।

 

डॉ. सरोजिनी ‘तनहा’ ने भी इस कार्यक्रम में लोगो को कोरोना के इस दौर दौर में अपनी कविता से लोगो को हिम्मत दी और कहा की वर्तमान दौर काफी कठिन दौर है मैंने भी अपनों को इस दौर में खोया है। मेरी माता जी का भी इस दौर में निधन हुआ और अभी 1 महीना भी पूरा नही हुआ है फिर भी हम ये कहना चाहते है कि ये जो दौर है उस दौर में हमे हिम्मत और हौसला कभी नही छोड़ना है और कहा तक हो सके हमे दूसरों की मदद करने का ही भाव अपने मन में जगाना है।

 

श्रीमती पद्मावती कंवर ने अपनी बात रखते हुए कहा कि फर्क सिर्फ सोच का है किसी की सोच सकारात्मक है तो किसी की नकारात्मक है और नकारात्मक सोच का नतीजा तो हम लोग देख ही रहे है। इसलिए हमें सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ते हुए इस दौर को हराना है।

 

पं.शिवप्रकाश जौनपुरी ने भी इस कार्यक्रम में हिस्सा लिया और इस दौर से जूझ रहे लोगों के अंदर सकारात्मकता पैदा करते हुए उन्होंने कहा कि कोरोना पिछले साल आया तब हमे इसके बारे मे कोई जानकारी नही थी। सरकार से जो भी बना अपने लोगों को बचाने के लिए वह सरकार ने किया। जब वैक्सीन तैयार होने लगी हमारे देश में तो सरकार ने वही कहा दवाई और कड़ाई दोनों साथ होनी चाहिए और कड़ाई हम लोग छोड़ दिये जिसका परिणाम हम लोग भुगत रहे है। उन्होंने कहा पैदा हुआ तो गोदी में था, हाथ पाव कम चलता था। इसलिए नुकसान किया कम, कम ही को रगड़ता था। हष्ट पुष्ट हो गया है अब तो, उससे मस्ती करो ना। है सखी साजन, ना सखी कोरों ना।

 

इस कार्यक्रम के तीसरे चरण में कवियत्री एवं मंच संचालक अनुपम रमेश किंगर, बहरीन, कवियत्री श्रीमती विभा तिवारी, ओमान, डॉ सतीश वर्द्धन, पिलखुवा, उत्तर प्रदेश, आशीष शर्मा, इंडोनेशिया, ओम् रायजादा, ग्रेटर नोएडा, श्रीमती स्मृति त्रिवेदी, दोहा, कतर शामिल हुए।

 

ओम् रायजादा ने कार्यक्रम की शुरुआत अपनी एक कविता के साथ कि

 

विभा तिवारी ने कार्यक्रम में अपनी बात रखते हुए कहा कि यह सच है कि मैं मानती हूं कि भगवान अब धरती पर नही आएंगे। भगवान को जो भी बाते कहनी थी वो उन्होंने ग्रंथो में लिख दी है। उन्होंने हमें शिक्षा के माध्यम दे दिए हैं कि तुम खुद पढ़ो सीखो और उसके रास्ते पर चलो। भगवान हमारे अंदर ही ज्ञान और शिक्षा के रूप में विद्यमान हैं। उन्होंने कहा पिछले वर्ष मैंने एक कविता लिखी थी जब मेरे भैया इसको कोरोना काल में बीमार हो गए थे और उस कविता के बोल कुछ इस तरह है की सजन मिलती कभी फुर्सत तो संग संग चाय पी लेते, हमें फुर्सत नहीं मिलती सदा खुद पर शिकायत थी कभी हम चीखते चीढ़ते, कभी हम हार के रोते, तरक्की कर रहे थे तुम, तरक्की तुमको हासिल हो, सदा ख्वाइश रही अपनी ,मगर हम साथ हो, मंजिल हो हमारी एक अपनी।

डॉक्टर सतीश वर्धन ने कार्यक्रम में मां सरस्वती को प्रणाम करते हुए अपनी बात रखी और कहा की आज कोरोना वायरस हमारे जीवन में वह कालचक्र बन के आया है की जिसका ना उपाय दिखाई देता है ना ही इलाज दिखाई देता है। आज कब्रिस्तान और श्मशान घाट में लाशों के अंबार लगे हुए हैं। हर कोई हताश और निराश है किसी को उपाय दिखाई नहीं देता किसी को कोई सुझाव नजर नहीं आता।

 

उन्होंने कविता की पंक्तियों में अपनी बात कहते हुए कहा की आज हर इंसान का बुरा हो गया हाल, जीवन लाखों लील गया यह कोरोना का जाल, पुत्र पिता संग संग गए, यू आये यमराज, ऑक्सीजन बिना पिता , पुत्र बिना इलाज।

 

गजेंद्र कौशिक ने भी इस कार्यक्रम में अपनी प्रस्तुति पेश करते हुए कहा कि कहते हैं बिना मल्लाह के किसी का मोल नहीं और बिना सुगंध के फूल का मोल नहीं, मोल तो है एक सही सोच का सही दृष्टिकोण का। उन्होंने फूलों के ऊपर 4 पंक्तियों में कहा कि, कभी-कभी तो फूल भी मुरझा जाते हैं, चेहरे पर हो मुस्कान, तो दिल भी खिल जाते हैं, हमने जो तुमको फूल दिया है, अपने दिल का संदेश दिया है, अगर इस फूल को फूल समझो तो, अपने समझ क़ी भूल समझो, क्योंकि इस फूल में सारा प्यार भर दिया है।

 

स्मृति त्रिवेदी भूषण भी इस कार्यक्रम में शामिल हुई और उन्होंने ने कहा कि कहीं ना कहीं ईश्वर के प्रति जो भरोसा कम होता जा रहा है उस विचार को दर्शाने के लिए मैंने एक कविता लिखी है उस कविता की चार पंक्तियां सुनाते हुए उन्होंने कहा की हम सब परेशान हैं और हैरान भी, अकस्मात इस आपदा से अनजान भी, इंसानियत और हैवानियत से भरा है गुलिस्ता, सजा ए कालापानी या सजा ए मौत, क्या चुने खौफजदा है हर एक इंसान भी, सब परेशान भी है और हैरान भी, कुछ तो कर ए मेरे मौला, इससे बड़ी कोई सजा नहीं, जुल्म किसका कौन भुगत रहा, समझ से परे कुछ भी पता नहीं, कोई किस्त है जो अदा नहीं सांसे बाकी है पर हवा नहीं, सब गुनहगार हैं इस गुना में, लेकिन कौन गुनहगार है इसका पता नहीं।

 

दीपा स्वामीनाथन ने अपनी बात रखते हुए कहा की जिस तरह युद्ध सीमा में सिपाही देश की रक्षा के लिए युद्ध लड़ते हैं आज भी संकट का समय कुछ ऐसा ही है। हम घर में भी सुरक्षित नहीं है यदि हम कोरोना नियमो का पालन ना करें। जो लोग इस संकट से लड़ रहे हैं वह धीरे-धीरे अपनी आशा खोते जा रहे हैं। का कारण है कि हर कोई एक दूसरे पर लाकर लगा रहा है। तुझे नहीं हो रहा, वह नहीं हो रहा, नकारात्मकता फैलती जा रही है।

 

आगे उन्होंने चार पंक्तियों में आप अपनी बात रखी और कहां की भय के पदचाप सुनकर बंद होते घरों के पिंजरे, एक के बाद एक आती खबरों की उदासीनता, एक साथ दिमाग में घुसपैठ करते हैं आंकड़े, मन में नकारा कहलाती घर में बैठने की विवस्ता, कष्ट और करुणा से निढाल मन और मस्तिष्क के झगड़े, आकांक्षाओं पर चढ़ती धूल, संकट पर मंडराती इंच की किताब।

 

आशीष शर्मा भी इस खास कार्यक्रम में उपस्थित हुए और उन्होंने अपनी बात रखते हुए कहा कि आज के समय में समाज को पॉजिटिविटी देना कवि का कर्तव्य है। उन्होंने कहा आज की जो स्थिति है ऐसी है किसी के लिए अगर हम कुछ भी कर पाए तो वह कम है। लेकिन अपना अपना पार्ट सबको अदा करना चाहिए।

 

आगे उन्होंने अपनी पंक्तियों में बात रखते हुए कहा कि न वो मेरे, न मैं उनका, ना कोई राबता है, ना जाने कौन हैं, जो दिल पर दस्तक दे रहा है।

 

कोरोनांजलि – विश्व के हिंदी साहित्यिक रचनाकारों ने कोरोना को दी श्रद्धांजलि – टेन न्यूज़ लाइव पर अनोखी प्रस्तुति

 

टेन न्यूज़ पर कोरोनांजलि कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य साहित्यिक रचनाकारों द्वारा कोविड प्रभावित जन-मानस को शाब्दिक, साहित्यिक सांत्वना देने और उनके उत्साहवर्धन हेतु प्रयास करना था।

 

इस कार्यक्रम की प्रस्तुति कवियत्री एवं मंच संचालक अनुपम रमेश किंगर, बहरीन द्वारा किया गया। इस कार्यक्रम तीन चरणों में टेन न्यूज़ लाइव शो फेसबुक, यूट्यूब प्लेटफॉर्म पर प्रसारित किया गया। इस कार्यक्रम के पहले चरण में कवियत्री डॉ शकुंतला सरूपरिया, उदयपुर, राजस्थान;
श्री हेमन्त ‘स्नेही, नोएडा, श्री कृष्ण कुमार क्रांति, सहरसा, बिहार, श्री आशीष प्रकाश, ग़ाज़ियाबाद, डॉक्टर राजीव कुमार दास, हज़ारीबाग़, झारखंड, श्रीमती रेखा नायर,अहमदाबाद, गुजरात,

 

कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए कवियित्री अनुपम रमेश किंगर ने कहा कि आज का हमारा ये कार्यक्रम कोरोना को श्रद्धांजलि , कोरोना पीड़ितों क़ों आदरांजली और एक काव्यांजलि के रूप में है। हम सब आज एक बहुत ही कठिन समय से गुजर रहे हैं। शाख से पत्तों की तरह रिश्ते टूटते बिखरते चले जा रहे हैं, कल कोई अपना आज नहीं रहा, आज मैं आपके घर आती हूं श्रद्धांजलि सुमनअर्पित करने, कल आप मेरे घर आ गए होते हैं, इस तरह के माहौल में, इस तरह के डर में, इस तरह की परेशानी में, एक कवि क्या करे ? एक साहित्यिक क्या करें ?

 

अनुपम रमेश किंगर ने एक कहानी सुनाते हुए कार्यक्रम की शुरुआत की और कहा की जिस समय पृथ्वीराज चौहान लड़ रहे थे और लड़ते लड़ते हार गए थे उनके हर उस एक 18 युद्ध में उनका साथ देने वाला उनका परम मित्र उनका कवि मित्र मुझे पता भी नहीं लालचंद परसई था। अंतिम युद्ध भी उन्होंने उनके साथ लड़ा उन्हें यह बता कर कि उनका शत्रु कितनी दूरी पर है आज हम देश और विदेश के विभिन्न प्रांतों में बैठे हुए कवि यह तो नही जानते की यह कोरोना रूपी शत्रु कहा कहा और किस किस रूप में बैठा हुआ है।

हेमन्त ‘स्नेही, नोएडा ने इस कार्यक्रम में अपनी बात रखते हुए कहा कि जैसा कि हम सभी जानते है हम भारतीय हर संकट पर विजय प्राप्त कर ही लेते है बड़े से बड़े संकट पर विजय प्राप्त करना हमारी प्रकृति और हमारा स्वभाव है। उन्होंने कहा मानते हैं रात काली है, पर शपथ हमने उठा ली है। दीप खुशियों के जलाएंगे, हम नया सूरज उग आएंगे। भूल गया है विश फिजाओं में, सास भी दूभर हवाओं में, बांटता पर विश्व को भारत, जिंदगी भर कर दवाओं में, मिल सके अमृत मानव को, बूटियां ऐसी उगाएंगे, हम नया सूरज उगाएंगे।

 

रेखा नायर ने भी इस कार्यक्रम में शिरकत की उन्होंने कहा कि जिंदगी ने इस महामारी के समय बहुत रंग दिखाए है तो जिंदगी के इस रवैय्ये के प्रति रेखा नायर ने अपने दृष्टिकोण को कविता में पिरोहते हुए कहा जिंदगी अब और ना सिखा कह दे अब जी कर दिखा। पाठ तूने बहुत पढ़ाया है, जिंदगी के नाम पर क्या क्या दिखाया। त्रासदी के तूने तांडव दर्शाए, शुर विषैले राय बिछाए। धुंध कोहरा की काली रात, निष्ठुर निर्मम बन दिए आधात। पर सुन जिंदगी अब है मेरी बारी, व्यतीत है मन, काया जरा थकी हारी, पर नहीं टूटा है हौसला, नहीं टूटी है आस, जाना है हमें प्रकृति में निहिक, पतझड़ और मधुमास, तपते ग्रीष्म और शुष्पशीत का होता है एक दिन अंत।

 

कवियत्री डॉ शकुंतला सरूपरिया ने कार्यक्रम में अपनी प्रस्तुति पेश करते हुए कहा की हमारी हथेलियों में प्रार्थना की भाषा है और आपका पूरी हो यही अभिलाषा है। इस वक्त किस सदी की सबसे बड़ी त्रासदी है कोरोना, आंगन आंगन दुख का अंधेरा, कब आएगा सुखद सवेरा, लाशों की बस्ती उग आई, शहर शहर कोरोना ने घेरा, नैनों में बस ख्वाब उदासी, बोझिल जिंदगी, बुझा हर चेहरा, हक्की बक्की रह गई दुनिया, इस खतरे का ना था बेरा दोष दे किसको इस बर्बादी का, है कसूर यह तेरा मेरा।

 

डॉक्टर राजीव कुमार दास ने कार्यक्रम के दौरान अपनी प्रस्तुति पेश करते हुए कहा वो इधर रो रहा, वो उधर रो रहा, वह इधर रो रही वह उधर रो रही, हर तरफ मौत की बारिश है हो रही, मौत किसको कहा कब मिले क्या पता, उम्र के पहले ही जिंदगी सो रही, जिस तरफ देखिए बस तबाही मची, धीरे-धीरे लगे दुनिया सो रही।

 

लेखक आशीष प्रकाश भी इस कार्यक्रम में शामिल हुए उन्होंने अपनी प्रस्तुति पेश करते हुए कहा की फेल कर जब दो भुजाएं, सूर्य को लेती जकड़, विश्व ग्रहण का जब लेता पूरी पृथ्वी को पकड़, फिर भी पल भर बाद बसन्त पार चढ़ जाना ही है, हो चाहे जितना घना अंधेरा, प्रकाश तो आना ही है।

 

उन्होंने आगे कहा कि रखो ख्याल अपना हिफाजत से दोस्तों, दिल आ गए हिदायत से जीने के दोस्तों, थोड़ी दुआएं गैर के हिस्से में भी करो, बनते हैं बिगड़े काम इबादत से दोस्तों। आशीष ने कहा इस कोरोना काल में हमने बहुत लोगों को खोया हमने अपने प्रिय मित्र रोहित सरदाना को खोया, हमने अपने गुरुदेव कुंवर बेचैन को खोया, हमने सुंदरलाल बहुगुणा जी को खोया तो उस समय अंदर से एक शोर सा निकला की मांगो दुआएं आज हिंदुस्तान के लिए, आदम ना जाए कोई भी शमशान के लिए।

 

टेन न्यूज़ पर आयोजित कोरोनांजलि कार्यक्रम के दूसरे चरण में डॉ. सरोजिनी ‘तनहा’, मेरठ, पं.शिवप्रकाश जौनपुरी, मुंबई, डॉ. कृष्ण कुमार ‘बेदिल’, मेरठ, श्री सतीश दीक्षित, नोएडा, श्रीमती अंजु मल्होत्रा, नोएडा, श्रीमती पद्मावती कंवर, अबूधाबी शामिल हुए।

 

अनुपम रमेश किंगर ने इस कार्यक्रम की शुरुआत छोटी सी कहानी के साथ कि उन्होंने कहा कि लड़ाई थी सारागढ़ी की वर्ष था 1897 हमारे 21 भारतीय सैनिक 15000 अफगानिस्तानी सैनिकों से लड़ रहे थे। उनका मुकाबला जिन सेनिको से था उनका तो कोई नाप नही था लेकिन भारतीय सेना के मुख्य ईशर सिंह ने अपने सबसे कमजोर सैनिक नंद सिंह को कहा कि अगर तुम बन्दूक नही उठा सकते तो मत उठाओ लेकिन अपनी मसक उठाओ और घायल सैनिकों को पानी पिलाओ। अनुपम रमेश किंगर ने कहा मझे लगता है हम सब कवि मित्र यह पर वो नंद सिंह है जो अपने शब्दों की मसक उठाये आपके पास आ रहे है आपको हिम्मत का पानी पिला रहे है और आपको कह रहे है कि ‘देखिए हारियेगा नही, माना कि अंधेरा भर घना है, मगर एक दिप जलाना कब मना है, हम सब वही दिप जलाने का प्रयास कर रहे है, आप सभी को आशा और विश्वास दिलाने का काम कर रहे है, की यह अंधेरा भी छटेगा वो भोर भी आएगी, जब फिर गले मिल पाओगे, जब फिर मुस्कुराहट फेल जाएगी।’

अंजू मल्होत्रा ने इस कार्यक्रम में अपनी बात रखते हुए कहा कि हम एक शब्द को कितना अच्छा मानते थे और बच्चो को भी कहते थे कि पॉजिटिव रहिए लेकिन आज वही एक शब्द कितना नेगेटिव बन गया । बहुत दुख होता पिछले वर्ष समय में हमने कोरोना का वो भीषण रूप देखा की बहुत से अपनो को खोया है। तब मन में एक विचार आया कि है मानव अब तुम ध्यान धरो, उस शक्ति का कुछ अनुमान करो, सुविचारों का भी ध्यानधरो, स्थिरता का भी सम्मान करो, मतलब से मत जियो मरो, उठ ना पाओ इतना मत गिरा करो, क्रोध की पीड़ा में मत लिप्त रहो, असमय की इस खामोशी से कुछ तो डरो, खामोशी का भी गुणगान करो, विजय गिरना नही, गिर के उठना है, इस तथ्य का भी सम्मान करो, है मानव अब तुम ध्यान करो

 

डॉ. कृष्ण कुमार ‘बेदिल’ ने इस कार्यक्रम में अपने विचारों की प्रस्तुति करते हुए कहा की ऐसे विपत्ति के समय जब पूरा विश्व इस महामारी से जूझ रहा है कवि का यह दायित्व है कि वह अपने रचनाओं के माध्यम से ऐसा सन्देश दे जिससे सकारात्मक ऊर्जा सब जगह संचालित हो। तूफान में कश्ती हो तो पथवार कलम है, मैदान में दुश्मन हो तो तलवार कलम है, इतिहास है गवाह की थी जब जब जरूरत, बन जाये ए तब तब मेरी तलवार कलम है। उन्होंने आगे कहा क्योंकि इंसान जैसा सोचता है वैसा ही वह करता है। इसलिए हमें हमेशा सकारात्मक सोचना चाहिए तभी आप जीवन में सफल हो सकते है।

 

डॉ. सरोजिनी ‘तनहा’ ने भी इस कार्यक्रम में लोगो को कोरोना के इस दौर दौर में अपनी कविता से लोगो को हिम्मत दी और कहा की वर्तमान दौर काफी कठिन दौर है मैंने भी अपनों को इस दौर में खोया है। मेरी माता जी का भी इस दौर में निधन हुआ और अभी 1 महीना भी पूरा नही हुआ है फिर भी हम ये कहना चाहते है कि ये जो दौर है उस दौर में हमे हिम्मत और हौसला कभी नही छोड़ना है और कहा तक हो सके हमे दूसरों की मदद करने का ही भाव अपने मन में जगाना है।

 

श्रीमती पद्मावती कंवर ने अपनी बात रखते हुए कहा कि फर्क सिर्फ सोच का है किसी की सोच सकारात्मक है तो किसी की नकारात्मक है और नकारात्मक सोच का नतीजा तो हम लोग देख ही रहे है। इसलिए हमें सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ते हुए इस दौर को हराना है।

 

पं.शिवप्रकाश जौनपुरी ने भी इस कार्यक्रम में हिस्सा लिया और इस दौर से जूझ रहे लोगों के अंदर सकारात्मकता पैदा करते हुए उन्होंने कहा कि कोरोना पिछले साल आया तब हमे इसके बारे मे कोई जानकारी नही थी। सरकार से जो भी बना अपने लोगों को बचाने के लिए वह सरकार ने किया। जब वैक्सीन तैयार होने लगी हमारे देश में तो सरकार ने वही कहा दवाई और कड़ाई दोनों साथ होनी चाहिए और कड़ाई हम लोग छोड़ दिये जिसका परिणाम हम लोग भुगत रहे है। उन्होंने कहा पैदा हुआ तो गोदी में था, हाथ पाव कम चलता था। इसलिए नुकसान किया कम, कम ही को रगड़ता था। हष्ट पुष्ट हो गया है अब तो, उससे मस्ती करो ना। है सखी साजन, ना सखी कोरों ना।

 

इस कार्यक्रम के तीसरे चरण में कवियत्री एवं मंच संचालक अनुपम रमेश किंगर, बहरीन, कवियत्री श्रीमती विभा तिवारी, ओमान, डॉ सतीश वर्द्धन, पिलखुवा, उत्तर प्रदेश, आशीष शर्मा, इंडोनेशिया, ओम् रायजादा, ग्रेटर नोएडा, श्रीमती स्मृति त्रिवेदी, दोहा, कतर शामिल हुए।

 

कवि ओम रायजादा ने कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए कहा कि मेंने एक वर्ष पूर्व जब ये कोरोना शुरू हुआ था। तब मैंने एक कविता लिखी थी। वो कुछ इस तरह थी की ‘ कछु बात हम बतावें, धर कान सब सुनो ना, कितना भी हो भयंकर पकड़ेगा ना‌‌ कोरोना॥ कोशिश करो कि घर मा चुपचाप होकर बैठो, खाओ पियो मजे मा या कसरत करके बैठो, झाडो, बुहारो, लिपो, चमकाओ कोना कोना। कछु बात हम बतावें धरकान सब सुनो ना, कितना भी हो भयंकर पकड़ेगा ना कोरोना।

 

विभा तिवारी ने कार्यक्रम में अपनी बात रखते हुए कहा कि यह सच है कि मैं मानती हूं कि भगवान अब धरती पर नही आएंगे। भगवान को जो भी बाते कहनी थी वो उन्होंने ग्रंथो में लिख दी है। उन्होंने हमें शिक्षा के माध्यम दे दिए हैं कि तुम खुद पढ़ो सीखो और उसके रास्ते पर चलो। भगवान हमारे अंदर ही ज्ञान और शिक्षा के रूप में विद्यमान हैं। उन्होंने कहा पिछले वर्ष मैंने एक कविता लिखी थी जब मेरे भैया इसको कोरोना काल में बीमार हो गए थे और उस कविता के बोल कुछ इस तरह है की सजन मिलती कभी फुर्सत तो संग संग चाय पी लेते, हमें फुर्सत नहीं मिलती सदा खुद पर शिकायत थी कभी हम चीखते चीढ़ते, कभी हम हार के रोते, तरक्की कर रहे थे तुम, तरक्की तुमको हासिल हो, सदा ख्वाइश रही अपनी ,मगर हम साथ हो, मंजिल हो हमारी एक अपनी।

 

डॉक्टर सतीश वर्धन ने कार्यक्रम में मां सरस्वती को प्रणाम करते हुए अपनी बात रखी और कहा की आज कोरोना वायरस हमारे जीवन में वह कालचक्र बन के आया है की जिसका ना उपाय दिखाई देता है ना ही इलाज दिखाई देता है। आज कब्रिस्तान और श्मशान घाट में लाशों के अंबार लगे हुए हैं। हर कोई हताश और निराश है किसी को उपाय दिखाई नहीं देता किसी को कोई सुझाव नजर नहीं आता।

 

उन्होंने कविता की पंक्तियों में अपनी बात कहते हुए कहा की आज हर इंसान का बुरा हो गया हाल, जीवन लाखों लील गया यह कोरोना का जाल, पुत्र पिता संग संग गए, यू आये यमराज, ऑक्सीजन बिना पिता , पुत्र बिना इलाज।

गजेंद्र कौशिक ने भी इस कार्यक्रम में अपनी प्रस्तुति पेश करते हुए कहा कि कहते हैं बिना मल्लाह के किसी का मोल नहीं और बिना सुगंध के फूल का मोल नहीं, मोल तो है एक सही सोच का सही दृष्टिकोण का। उन्होंने फूलों के ऊपर 4 पंक्तियों में कहा कि, कभी-कभी तो फूल भी मुरझा जाते हैं, चेहरे पर हो मुस्कान, तो दिल भी खिल जाते हैं, हमने जो तुमको फूल दिया है, अपने दिल का संदेश दिया है, अगर इस फूल को फूल समझो तो, अपने समझ क़ी भूल समझो, क्योंकि इस फूल में सारा प्यार भर दिया है।

 

स्मृति त्रिवेदी भूषण भी इस कार्यक्रम में शामिल हुई और उन्होंने ने कहा कि कहीं ना कहीं ईश्वर के प्रति जो भरोसा कम होता जा रहा है उस विचार को दर्शाने के लिए मैंने एक कविता लिखी है उस कविता की चार पंक्तियां सुनाते हुए उन्होंने कहा की हम सब परेशान हैं और हैरान भी, अकस्मात इस आपदा से अनजान भी, इंसानियत और हैवानियत से भरा है गुलिस्ता, सजा ए कालापानी या सजा ए मौत, क्या चुने खौफजदा है हर एक इंसान भी, सब परेशान भी है और हैरान भी, कुछ तो कर ए मेरे मौला, इससे बड़ी कोई सजा नहीं, जुल्म किसका कौन भुगत रहा, समझ से परे कुछ भी पता नहीं, कोई किस्त है जो अदा नहीं सांसे बाकी है पर हवा नहीं, सब गुनहगार हैं इस गुना में, लेकिन कौन गुनहगार है इसका पता नहीं।

 

दीपा स्वामीनाथन ने अपनी बात रखते हुए कहा की जिस तरह युद्ध सीमा में सिपाही देश की रक्षा के लिए युद्ध लड़ते हैं आज भी संकट का समय कुछ ऐसा ही है। हम घर में भी सुरक्षित नहीं है यदि हम कोरोना नियमो का पालन ना करें। जो लोग इस संकट से लड़ रहे हैं वह धीरे-धीरे अपनी आशा खोते जा रहे हैं। का कारण है कि हर कोई एक दूसरे पर लाकर लगा रहा है। तुझे नहीं हो रहा, वह नहीं हो रहा, नकारात्मकता फैलती जा रही है।

 

आगे उन्होंने चार पंक्तियों में आप अपनी बात रखी और कहां की भय के पदचाप सुनकर बंद होते घरों के पिंजरे, एक के बाद एक आती खबरों की उदासीनता, एक साथ दिमाग में घुसपैठ करते हैं आंकड़े, मन में नकारा कहलाती घर में बैठने की विवस्ता, कष्ट और करुणा से निढाल मन और मस्तिष्क के झगड़े, आकांक्षाओं पर चढ़ती धूल, संकट पर मंडराती इंच की किताब।

 

आशीष शर्मा भी इस खास कार्यक्रम में उपस्थित हुए और उन्होंने अपनी बात रखते हुए कहा कि आज के समय में समाज को पॉजिटिविटी देना कवि का कर्तव्य है। उन्होंने कहा आज की जो स्थिति है ऐसी है किसी के लिए अगर हम कुछ भी कर पाए तो वह कम है। लेकिन अपना अपना पार्ट सबको अदा करना चाहिए।

 

आगे उन्होंने अपनी पंक्तियों में बात रखते हुए कहा कि न वो मेरे, न मैं उनका, ना कोई राबता है, ना जाने कौन हैं, जो दिल पर दस्तक दे रहा है।

 

कार्यक्रम के आखिर में कार्यक्रम का संचालन कर रही अनुपम रमेश किंगर ने बहुत ही खूबसूरत पंक्तियों में संदेश देते हुए कहा की – एक बहुत अनूठा अनुभव हुआ, एक मुद्दत के बाद में, खुद ही अपना खुद से मिला, पूछा मैंने खुद से फिर, तेरी बता इच्छा है क्या, मेरा खुद फिर खुद पर हंसा, बोला आज तुझको हुआ है क्या, इतना बरसो संग संग चला तब तो मुझसे नहीं पूछा, मां के कहने पर पढ़ लिख लिया, पापा ने कहा ब्याह कर लिया, इसके उसके कहे सुनता था, समाज के कहे औलाद पैदा किया, फिर औलाद के कहने पर तू चला, फिर तूने तौर-तरीके बदले, फिर तूने अपना घर बदला।

 

उन्होंने कुछ पंक्तियों में संदेश देते हुए कहा की ‘चलो साथ चलें, चलो साथ बने, ना तन्हा हो सफर, चलो साथ चुने, किसी के बहते हुए, चलो मोती चुनें, जहां रोशन करें, चलो ज्योति बनें, कहीं झुलसे है तन, कहीं घायल हैं मन, हर पल तपते जीवन, चलो छाओं बने, तूफानों से जूझे, नित ये कोमल बदन, नफरतों को झेलें, यह कैसा सितम, चलो हाथ बढ़ा, दे उम्मीदो को सदा, चलो खोजे मुस्कान, थे अंधेरों को हरा, चलो साथ चले, चलो साथ बने, तनहा ना हो सफर, चलो साथ चुने।

 

उन्होंने कहा चलो साथ चलें, सभी मिलकर इस सार्थक यज्ञ में अपनी अपनी कर्म आहुति दें। यह सिर्फ कोरोना वॉरियर यह फ्रंटलाइन वर्कर का काम नहीं है। यह केवल सरकार का काम नहीं है। यह हम सबका काम है। यह हम सब का कर्तव्य मात्र नहीं हम सबका अधिकार भी है मेरा अधिकार है कि मैं किसी के जाकर के आंसू पोंछु या किसी के साथ बैठकर उसके आंसू पोंछ आऊं।

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