काव्य परम्परा की बहती अविरल धारा ने अपने 46 वें माह में प्रवेष किया।

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Kavya Goshthi.

काव्य परम्परा की बहती अविरल धारा ने अपने 46 वें माह में प्रवेष किया। यह काव्य गोश्ठी जन-जन षायर साहिर लुधियानवी को समर्पित की गई। देष के लब्ध प्रतिश्ठित कवि डा. प्रवीण षुक्ल जी ने साहिर लुधियानवी के जीवन पर प्रकाष डाला तथा उनकी कुछ श्रेश्ठ रचनाओं की बानगी पेष की।
बृजभूमि से पधारे छुटट्न खान साहिल ने अपने कविता पाठ से उपस्थित रसिकों का मन मोह लिया, गीत, सवैये, रूबाई व षेरों के माध्यम से उन्होने लोक धुनों पर लोक गीतों की अनुठी छटा बिखेरी जो कुछ इस प्रकार है।
राजनिति व्यंग:-
वो गलतियों पे अपना झुका कर के सर गई
बुढ़ी जो सिहासत थी वो कुएं में उतर गई
एक और हादसा हुआ दिल्ली के बिच में
गिर कर के झाडू वक्त से पहले बिखर गई
परिवारिक रिष्ते:-
रोटी, मकान, जिनको तन का पेरहन दिया
ता उम्र जो कमाया था वो सारा धन दिया
उस वक्त मेरे दिल के टुकड़े-टुकड़े हो गये
अपनों ने जब अहसान जता कर कफन दिया
हास्य रंग:-
वहा रे बांके बिहारी, लीला तिहारी न्यारी
सुशमा स्वराज का मुकदर जगा गये
उमा भारती तो आपकी हमेषा दास
प्रेम ठुकरा के बाबु जोगन बना गये
ललिता अम्मा का दिल कर दिया चूर-चूर
मायावती के हाथों मे झुनझुना थमा गये
आपका जवाब नहीं ऐसा किया है कमाल
इस बार सोनिया जी के चुना लगा गये।
अपनी गजलों के लिए विख्यात दीक्षित दनकौरी जी ने अपनी बुलन्द आवाज व तरन्नुम में जब गजलों के तार छेड़े तो उपस्थित श्रोता मंत्रमुग्ध हो गए तथा पुरा हाल तालियों की गूंज से गुजांयमान हो गया श्री दीक्षित जी गजलों का कुछ नजारा इस तरह है।
लाजि़म नहीं कि हर कोई हो कामयाब ही
जीना भी यीख लिजिए नाकामियों के साथ

चाँद तारे न ये रंगो-बू चाहिए
कुछ खिलौने नहीं, मुझको तू चाहिए

जान सांसत में डाल ली हमने
दुष्मनी खुद से पाल ली हमने
उनकी हसरत का अहतराम किया
खुद ही पगड़ी उछाल जी हमने।
काव्य परम्परा के चेयरमैन श्री प्रमोद अग्रवाल, श्री सुषील गोयल, श्री रतनचन्द जैन, श्री बलदेव गुप्ता आदि भी उपस्थित थे। वेलफेयर सोसायटी के प्रधान श्री सुरेष बिन्दल जी द्वारा सभी का पधारने पर धन्यवाद के साथ सभा का समापन हुआ।

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