जेपी हॉस्पिटल में नाइजीरियन महिला की अति दुर्लभ सर्जरी से बचायी जान
GREATER NOIDA REPORTER LOKESH GOSWAMI
नोएडा सेक्टर 128 स्थित जेपी हॉस्पिटल के चिकित्सकों की टीम ने एक बार फिर अपनी विशेषज्ञता से चिकित्सा जगत में कामयाबी की एक नईमिसाल पेश की। दो विभागों के डॉक्टरों की टीमों ने नाइजीरिया से आई आयशत की दुर्लभ बीमारी का ईलाज कर उसका जीवन बचाया। इसऑपरेशन को सफल बनाने में जेपी हॉस्पिटल के प्रशासकीय विभाग ने भी मानवीयता की मिसाल कायम की। मरीज की आर्थिक स्थिति बीमारीका ईलाज कराने के लिए सक्षम नहीं थी लेकिन जेपी हॉस्पिटल प्रशासन ने मानव धर्म का परिचय देते हुए उसके ईलाज को सफल बनाया। मरीजको BILATERAL INTERNAL CAROTID ARTRY ANEURYSM (ICA ANEURYSM) बीमारी थी। जिसका इलाज रेडियोलॉजी एंड इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी विभाग के एसोसिएट डायरेक्टर डॉ. सी.पी.एस. चौहान, न्यूरो सर्जरी विभाग के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. दिनेश रत्तानीएवं वरिष्ठ डॉक्टर डॉ. रोहन सिंहा की टीम ने किया।डॉ. सी.पी.एस. चौहान ने बीमारी के बारे में विस्तार से बताया, “इस बीमारी में मरीज के मस्तिष्क के अंदर बैलून जैसे खून के गांठ बन जाते हैं। इसखून के गांठ के फट जाने की स्थिति में मरीज को ब्रेन हेमरेज हो जाता है जो जानलेवा सिद्ध हो सकता है। अधिकांश मामलों में गांठ फटने के बादही मरीज को हॉस्पिटल लाया जाता है और तब तक बहुत देर हो जाती है। आयशत भाग्यशाली थी कि इसे इस बीमारी के बारे में पहले ही पता चलगया। इसके सिर में दो बड़े-बड़े (20 एम.एम. आकार) बैलून जैसे खून के गांठ थे। इन गांठों के कारण दिमाग की नसों पर लगातार दबाव बढ़ता जारहा था जिससे हमेशा सिरदर्द की शिकायत रहती थी एवं आंखों की रोशनी कम होती जा रही थी। नाइजीरिया में जब मरीज ने अपनाएम.आर.आई. एवं सी.टी.स्कैन कराया तो मरीज को बीमारी के बारे में ज्ञात हुआ। वहां के डॉक्टर्स ने मरीज को जल्द से जल्द अपना ईलाज करानेकी सलाह दी।”जेपी हॉस्पिटल के न्यूरोसर्जरी विभाग के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. दिनेश रत्तानी ने बताया, “आयशत की बीमारी अति दुर्लभ थी। जिसका सफलइलाज करना बहुत ही मुश्किल कार्य था। ऐसी बीमारी का ईलाज करने में अनेक जोखिम की संभावना रहती है। इस बीमारी में भी कुछ ऐसा ही था।अगर बीमारी का सौ फीसदी सफल ईलाज नहीं होता तो इसके साइड इफेक्ट के रूप में मरीज के आंखों की रोशनी हमेशा के लिए जा सकती थी याउसके हाथ-पैर बिल्कुल ही नाकाम हो सकते थे। इसके साथ-साथ और भी कई खतरे थे।”जेपी हॉस्पिटल के न्यूरोसर्जरी विभाग के दूसरे वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. रोहन सिंहा ने आगे बताया, “मरीज के जेपी हॉस्पिटल में आने के बादडॉक्टरों की टीम ने बीमारी एवं ठीक करने के तरीकों पर कई बार विचार-विमर्श किया फिर सभी ने सर्वसम्मति से INTERVENTIONAL RADILOGY पद्धति द्वारा बीमारी का ईलाज करने का निर्णय लिया। पहले निर्णय लिया गया था कि दोनों बैलूनों का ईलाज एक-एक करके कियाजाएगा लेकिन तकनीकी कारणों की वजह से दोनों का ईलाज एक ही साथ कर दिया गया। जिसमें करीब चार घंटे का समय लगा।”रेडियोलॉजी एंड इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी विभाग के एसोसिएट डायरेक्टर डॉ. सी.पी.एस. चौहान ने ईलाज के बारे में बताया, “इंटरवेंशनलरेडियोलॉजी तकनीक के तहत डॉक्टर्स जांघों के रास्ते मस्तिष्क तक पहुंचे, फिर सर्जरी की गई। पहले मस्तिष्क के अंदर नली के जरिए गांठ केनिकलने वाले स्थान पर फ्लो डाइवर्टर (FLOW DIVERTER) लगाया गया ताकि खून का प्रवाह गांठ तक नहीं पहुंच पाए। ऐसा करने से गांठ परदबाव बन जाने और गांठ के फट जाने का खतरा हो जाता है इसलिए गांठ को आंशिक रूप से भर दिया गया ताकि उस पर दबाव भी नहीं बढ़े।”जेपी हॉस्पटिल के डॉ. सी.पी.एस. चौहान ने यह भी बताया, “वैसे मरीज जिनका रक्तचाप सामान्य रहता है उन मरीजों में ब्रेन हेमरेज होने के कईकारणों में से ये एक बड़ा कारण होता है। मरीज नाइजीरिया में एक स्कूल की शिक्षिका हैं। अपनी कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण वह इतना बड़ा ऑपरेशन कराने में सक्षम नहीं थी। अनेकों हॉस्पिटल द्वारा इंकार किए जाने के बाद जेपी हॉस्पिटल के चिकित्सकों ने बीमारी को चुनौती के रूप में लिया और हॉस्पिटल प्रशासन के सहयोग से ऑपरेशन को सफल कर दिखाया। दिल्ली-एन.सी.आर. ही नहीं बल्कि पूरे भारत में अपने तरह की यह बहुत ही कठिन सर्जरी है।”गौरतलब है कि जेपी हॉस्पिटल में नाइजीरिया, ईराक, पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफ्रीकी देशों से रोजाना कई मरीज अपनी बीमारियों का ईलाजकराने आते हैं। इस सर्जरी की सफलता ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि जेपी हॉस्पिटल ने उन मरीजों का भरोसा कायम रखने में एक