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दैवीय शक्ति के सत्व का पर्व – प्रोफ़ेसर पी.के.आर्य

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नवरात्र हमें दैवीय शक्ति के सत्व को आत्मसात करने की प्रेरणा देने का पर्व है।हिन्दू धर्म की प्राचीन अवधारणाओं में इसी ईश्वरीय शक्ति के देवी स्वरुप का अनेक स्थानों पर वर्णन आता है।शक्ति के जितने भी स्रोत हैं, हमारी जीवन ऊर्जा उन्हीं के इर्द-गिर्द स्पंदित होती है।इस पर्व के माध्यम से हम एक ओर जहाँ शक्ति के प्रभुत्व को अंगीकार करते हैं, वहीँ दूसरी ओर उसके जीवन में प्रादुर्भाव की प्रार्थना भी करते हैं।सृष्टि के अभ्युदय से लेकर जगत के अस्तित्वमान होने तक ,शक्ति के ये रूप ‘प्रकृति’ और ‘प्रवृत्ति’ के परिचायक भी रहें हैं।ये रूप सदा-सर्वदा प्रत्येक प्राणी के साथ चलते हैं। यहाँ तक की सूक्ष्म और न दिखायी देने वाले जीव-जंतुओं तक के जीवन स्पंदन में इसी अदृश्य शक्ति का हाथ होता है।

नवरात्र के अवसर पर हम देवी के नौ स्वरूपों की आराधना करते हैं।जिसमे पहला स्वरुप देवी शैलपुत्री का है।शिव कल्याण के देव हैं और माँ शैलपुत्री कल्याणी !देवी का यह स्वरुप प्रकृति के वर्चस्व की स्वीकारोक्ति है।प्रकृति का संरक्षण करो,उसे माँ की तरह मान कर उसका ध्यान रखो, तभी शक्ति का संतुलन बना रहेगा। उसका तिरस्कार मत करो ,न ही उसका अधिक दोहन ही करो ! पर्वत शिव जी के कार्यस्थल रहे हैं ,जबकि शैलपुत्री का वहां के कण-कण में वास है। शैलपुत्री जल की भी प्रतीक हैं और जल ही जीवन शक्ति का मुख्य स्रोत !भारत के प्रायः समस्त धर्म ग्रंथों में प्रकृति के समन्वय और संतुलन की सुन्दर प्रेरणाएं देखने को मिलती हैं।आज सदियों बाद जब यही बात यू.एन.ओ. की मीटिंग में एक प्रस्ताव बनाकर पास की जाती है, तो सभी उसको महत्व देते हैं या फिर जब डब्ल्यू. एच.ओ. उसके महत्व को बताता है, तो नई-नई योजनाएँ शुरू होती हैं।
देवी का दूसरा स्वरुप माँ ब्रह्मचारिणी,तीसरा माँ चंद्रघंटा,चौथा कूष्मांडा,पाँचवा स्कंदमाता,छठा  कात्यायनी,सातवाँ कालरात्रि,आठवां महागौरी तथा नौवां स्वरुप माँ सिद्धिदात्री का है।इनमें देवी भगवती के पाँच स्वरुप शिवदूती के हैं।छठी देवी कात्यायनी का स्वरुप थोड़ा अलग है।आमतौर पर पिता का कुल पुत्र से चला करता है;पुत्री से नहीं !परन्तु ऋषि कात्यायन को दिए गए वरदान के कारण कात्यायनी देवी के रूप में स्त्री सत्ता के वर्चस्व को गति मिल रही है। सप्तम स्वरुप माँ कालरात्रि का है।काली काल हैं।काल को जीतने का काम भी काली माँ ही कर सकती हैं।महाकाल यानि शिव का काम भी यही देवी आसान करती हैं।मृत्यु तुल्य कष्ट से उबारने में ये देवी परम सहयोगी हैं।अतीत की ओर देखें ,तो विभिन्न अवसरों पर अनेक महान विभूतियों ने काली माता के शक्ति स्वरुप से प्रेरणा और सामर्थ्य अर्जित की है।ऐसा ही एक उदाहरण गुरु गोविन्द सिंह के जीवन में मिलता है,जब वो अपने संघर्ष काल में दैवीय शक्ति से अभिप्रेरणा को स्वीकारते हैं, उनकी आत्मकथा ‘विचित्र नाटक’ में वर्णित है –

हेमकुण्ड पर्वत है जहाँ,सप्त सिंह सोवत हैं तहाँ।

वहाँ हम अधिक तपस्या साधी ,महाकालकालका अराधी।

आठवीं देवी महागौरी हैं।यह नारी शक्ति का मुख्य भाव है,गृहलक्ष्मी का भाव ,जहाँ नारी अपने समस्त उत्तरदायित्वों का हँसते-मुस्कराते निर्वहन करती है।स्त्री को शक्ति स्वरूपा समझो !माँ,बहन,पत्नी,प्रेयसी,पुत्री,बुआ,मौसी और न जाने किन -किन रूपों में वह महागौरी ही है।नौंवीं देवी सिद्धिदात्री तमाम कार्यों के सिद्ध होने यानि,परिपूर्णता की द्योतक हैं।

यथा-

अहमेव वात इव प्रवाम्यारभमाणा भुवनानि विश्वा।

परो दिवा पर एना पृथिव्यैतावती महिना संबभूव।।

(श्रीदुर्गासप्तशती-वेदोक्तं देवीसूक्तम-मंत्र-8)

सिद्धिदात्री देवी कहती हैं -” हे जीव मेरे बिना तो पत्ता भी नहीं हिलता।मैं ही चारों ओर हूँ।मुझ से ही जगत है।इस ब्रह्मांड का अस्तित्व मुझ से है।मुझसे ही सृष्टि और समष्टि है।

आद्ध्य शक्ति से जग उपजाया दूसरा ना कोय !

वास्तविक अर्थों में यही नवरात्र की शक्ति है।अपने अन्दर की ऊर्जा को पहचानना।दूसरे की ऊर्जा का सम्मान करना।प्रातः और संध्या काल में ‘श्रीदुर्गासप्तसती’ का पाठ हमें जीवन के अनेक संकटों से उबारता है।इस ग्रंथ में हमें दैवीय शक्ति की सर्वोच्च प्रतिष्ठा के दर्शन होते हैं।नारी के विविध गरिमामयी स्वरूपों का प्रदर्शन !देवी दुर्गा सजग हैं,सक्षम हैं,सत्य की पक्षधर हैं,प्रगतिशील हैं,अभूतपूर्व,परम सात्विक और आनंदमयी हैं।ज़रूरत पड़े तो वे अत्यंत क्रूर और अतिशय दयालु भी हैं।देवी के समस्त रूप व्यक्तित्व के विरोधाभासों को संतुलन के साथ जीने की प्रेरणा देते हैं।दुर्गा में जितनी विशेषताएं हैं ;वें किसी भी स्त्री में हो सकती हैं,बशर्ते वो परम सात्विक हो।

यथा-

सर्वदेवशरीरेभ्यो  याविर्भूतामितप्रभा।

त्रिगुणा सा महालक्ष्मी: साक्षन्महिषमर्दिनी।।

 

शास्त्र पर गौर करें तो ,दुर्गा का प्रादुर्भाव अत्याचारियों से संघर्ष और उनके शमन के लिए हुआ था।दुर्गा ‘त्रि शक्ति’ का समन्वय थी,अर्थात उनकी उत्पत्ति ब्रह्मा,विष्णु और महेश की सम्मलित शक्तियों के परिणाम से हुई थी।

”मातृका रहस्य ” के अनुसार वह तीन गुणों से समन्वित तथा मूर्तिमान परम कुंडली है।यही नहीं उसी के संयोग से ब्रह्मा,विष्णु तथा रूद्र की सत्ता है। इसीलिए दुर्गा देवी अजेय रहीं,उनके सच्चे साधक को भी कभी पराजय का मुँह नहीं देखना पड़ता।उनके अवतरण के सन्दर्भ में  उक्त तथ्य की पुष्टि इस श्लोक से होती है-

 

हरिब्रह्मात्मकम वर्ण गुणत्रय समन्वितम।

इकारं परमेशानि स्वयं कुंडली मूर्तिमान।

ब्रह्मा विष्णु मयं वर्ण तथा रूद्रमयं सदा।।

(कामधेनु तंत्र )

शक्ति का संचय भर नहीं करना है उसके यथोचित अनुप्रयोग की भी दरकार अनिवार्य तत्त्व है।सकल विश्व के समग्र कल्याण हेतु निरपेक्ष रूप से शक्ति का संयुक्तीकरण भी आवश्यक है।

 

भगवान शिव का शिवत्व भी महाशक्ति की उल्लासरुपी सन्निधि से ही स्फुरित होता है।

देखें –

जगत्कारणमापन्न: शिवो यो मुनिसत्तमाः।

तस्यापि साभवच्छकित्सत्या हीनो निरर्थकः।।

(स्कन्दपुराण)

 

आदि शंकर द्वारा विश्व के सम्मुख प्रकट ”सौंदर्यलहरी ” में भी ऐसा ही माना गया है।यथा –

शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुम।

   चेदेवं देवो    खलु  कुशलं  स्पन्दितुमपि।।

 

शक्ति के अभाव में ‘शिव’ भी मात्र ‘शव’ ही रह जाते हैं।शिव में निहित जो ईकार की मात्रा है, वह शक्ति की द्योतक है। काली का एक स्वरूप जिसमें शिव उनके चरणों में लेटे हैं, इसी भाव का प्रतिनिधित्व करता है।

शक्ति विना महेशानी प्रेतत्वं तस्य निश्चितम।

शक्ति संयोग मात्रेण कर्मकर्ता सदाशिवः। 

इकारः सर्ववर्णानां  शक्तितत्वात्कारणं मतं।।

(नंदिकेश्वरकारिका)

 

शक्ति शब्द में ‘श’ अक्षर ऐश्वर्य का और ”क्ति ”शब्द पराक्रम का प्रतीक है अतः ऐश्वर्य और पराक्रम दोनों को ही प्रदान करने वाली महिमा को ‘शक्ति’ कहते हैं।यथा –

ऐश्वर्यवचनः शश्चक्तिः पराक्रम एव तत्स्वरूपा।

तयोर्दात्री सा शक्तिः परिकीर्तितः।।

( देवीभागवत )
यही वज़ह है की शक्ति की साधना साधक को एक ओर जहाँ वैभव के चरमोत्कर्ष की ओर ले जाती है, वहीँ उसके पराक्रम और व्यक्तित्व में भी क्रांतिकारी सुखद बदलाव परिलक्षित होते हैं।
समग्र अर्थों में देखें तो कोई भी साधना वस्तुतः शक्ति साधना ही है।इस प्रसंग में तंत्र भी इसका अपवाद नहीं है।सिर्फ साधना ही क्यों ,उपासना की प्रायः प्रत्येक विधि (चाहे वह किसी नित्य ,नैमित्तिक या काम्य देवता की ही हो ,अथवा शंकरोक्त पंच देवोपासना -संप्रदाय के अंतर्गत गाणपात्य,सौर ,शाक्त ,वैष्णव या फिर शैव मतों में से किसी का भी अनुगमन करते हुए )स्वयं में श्क्त्याराधन का ही साधन है।परमसत्ता विशुद्ध रूपेण अद्वैत और निर्गुण ,निर्विकार ही है।उसका व्यक्तिकरण उसके अपने आप से नहीं अपितु नाना रूपों में व्यक्त देवी -देवताओं के माध्यम से ही होता है;जो उसके अंगोपांग सदृश्य हैं और उसकी शक्ति से संयुक्त भी ! अंगी यदि निर्गुण और अगम्य हो तो उपासना उसके अंगों की ही की जा सकती है,जो मूलतः अंग विशेष में निहित या उससे प्रकट शक्ति की अराधना का ही साधन है।साधना का सूक्ष्म अभिप्रायः श्क्त्याराधन ही तो है;अतः एव वह वस्तुतः शक्ति के ही निमित्त है।प्रत्येक साधना चूँकि ऐश्वर्य और पराक्रम का परिणाम उत्पन्न करते हुए शक्ति सम्पन्नता लाती है अतः विधि भले ही कोई भी क्यों न हो, वह अंततः उस शक्ति को ही साधती है जिससे संयुक्त होकर व्यष्टि -चेतना निस्सीम शिवत्व की राह पर अग्रगामी हो स्वछंद बहती है और अन्ततोगत्वा समिष्ट चेतना में एकात्म हो जाती है।

 

देवी साधना की आड़ में कुछ मूर्ख,पाखंडी और अवसरवादियों ने बलिप्रथा को प्रोत्साहित किया।ऐसे लोग प्रायः स्वयं मांस भक्षण को लालायित रहते हैं अतः देवी प्रसन्नता का ढोंग रच कर वे निहित स्वार्थो को ही पूरा कर रहे होते हैं।शास्त्र की दृष्टि में महाशक्ति यानि देवी भगवती जगन्माता हैं।वे मनुष्यों की ही नहीं अपितु सबकी माँ  हैं और समस्त प्राणिमात्र उनकी संतानें ! फिर कोई भी माँ अपनी संतानों के वध से भला क्यों प्रसन्न होने लगी ? देखिये –

देवी होकाग्र आसीत्।सैव जगदंडमसृजत ….सर्वमजिजनत।।

(बृहवृचोपनिषद)
असल में सभी शास्त्रों में बलि से तात्पर्य साधक द्वारा काम ,क्रोध आदि अपने स्वयं के विकारों के बलिदान से है।

यथा –काम क्रोधो दौ पशु इमामेव मनसा बलिमर्पयेत।।(महानिर्वाण तंत्र )

 

अपने समस्त कर्मों को जब साधक निष्कल परब्रह्म को समर्पित कर देता है ,तो वह कर्म -समर्पण ही शास्त्र की दृष्टि में मांस है।

यथा –मां सनोति हि यतकर्म तन्मानसं परिकीर्तितम।

  कामप्रतीकं तु योगिभिमाँससमुच्येत।।

(श्रीदुर्गं संहिता )

 

इतने सारे साम्य बताने के पीछे मेरा उद्देश्य एक मात्र यही है कि देवी दुर्गा की स्तुति और पूजन सिर्फ उपवास तक ही सीमित नहीं समझना चाहिए अपितु उनके सच्चे भक्त होने का तात्पर्य है, स्वयं में दैवीय गुणों का अधिष्ठान करना।उनके गुणों का मानव मन में बीजारोपण और उससे भी बढ़कर अपनी क्षमताओं का संतुलित और समुचित प्रयोग करने का सम्यक बोध ही सच्ची नवरात्र साधना है ,देवी आराधना है।

नवरात्र एक ऐसा सुअवसर है जब हम इन गुणों को स्वयं में जगा सकते हैं।
नवरात्र में जितने भी साधक साधना करते हैं उसके पीछे उनका एक मात्र  उद्देश्य निहित होता है -‘शक्ति का संयोजन” शक्ति का स्फुरण परम शक्ति सम्पदा के सानिध्य में ही संभव है।यह सानिध्य है सात्विकता और समग्रता का अभ्यास।यह परमात्मा की शक्तियों के निकट रहकर अधिक सुलभ होता है।यही ‘उपवास’ और ‘उपनिषद’ का शाब्दिक अभिप्रायः भी है अर्थात -‘प्रभु के समीप वास !’

 

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