“कोरोना महामारी के बाद भी तकनीकी शिक्षा को बनाया जाएगा बेहतर” , टेन न्यूज़ के फेस टू फेस कार्यक्रम में बोले एकेटीयू के वीसी प्रो. विनय कुमार पाठक 

ROHIT SHARMA

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नई दिल्ली :— देश में कोरोना वायरस के मामले अब खतरनाक स्थिति में पहुंच चुके हैं. पिछले 24 घंटों में आए नए मामले सामने आने के बाद कोरोना संक्रमितों की संख्या 13 लाख के करीब पहुंच गई है। स्वास्थ्य मंंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले 24 घंटों में कोरोना के 49,310 नए मामले सामने आए हैं, जबकि 740 मरीजों को अपनी जान गंवानी पड़ी है।

इस लॉकडाउन में टेन न्यूज़ नेटवर्क वेबिनार के माध्यम से लोगों को जागरूक कर रहा है , साथ ही लोगों के मन में चल रहे सवालों के जवाब विशेषज्ञों द्वारा दिए जा रहे हैं। आपको बता दे कि टेन न्यूज़ नेटवर्क ने “फेस 2 फेस” कार्यक्रम शुरू किया है , जो टेन न्यूज़ नेटवर्क के यूट्यूब और फेसबुक पर लाइव किया जाता है।

वही “फेस 2 फेस” कार्यक्रम में लखनऊ स्थित मशहूर एकेटीयू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर विनय कुमार पाठक ने हिस्सा लिया। वही आज फेस 2 फेस कार्यक्रम का विषय “कोरोना के बाद तकनीकी शिक्षा” रहा। वही इस कार्यक्रम का संचालन जिम्स संस्थान के प्रोफेसर मयंक पांडेय ने किया। आपको बता दे की जिम्स संस्थान के प्रोफेसर मयंक पांडेय , शिक्षक के साथ साथ बहुत ही मशहूर लेखक और ऊर्जावान एंकर भी है | उन्होंने टेन न्यूज़ नेटवर्क के प्लेटफार्म पर बड़े विद्वानों व मशहूर लोगों से महत्वपूर्व विषयों पर चर्चा की , जिसको लोगों ने खूब सराहना की है। प्रोफेसर मयंक पांडेय ने मशहूर एकेटीयू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर विनय कुमार पाठकसे बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न किए।

लखनऊ स्थित एकेटीयू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर विनय कुमार पाठक ने विषय “कोरोना के बाद तकनीकी शिक्षा”  पर कहा कि कोरोना वैश्विक महामारी  के बाद तकनीकी शिक्षा के जैसे ही सभी शिक्षा में नॉर्मल आए हैं , वैसे ही तकनीकी शिक्षा एक परपक्ष बदला है , इस समय हमारे यहां पर सभी जो विद्यार्थी हैं , कोई भी कैंपस में नहीं है |

हम सब ऑफलाइन से ऑनलाइन लर्निंग की तरफ जा रहे हैं , लेकिन बहुत सारे प्रश्न और विषय हम लोगों के समक्ष है , सबसे पहला विषय तो यही है कि तकनीकी शिक्षा मैं प्रैक्टिकल लैब्स कैसे कि जाएंगी , हमने कुछ वर्चुअल लैब्स की शुरुआत की है | बहुत सारे स्टूडेंट्स के पास डेटा , मोबाइल और लैपटॉप नहीं है , इसके कारण बहुत सी परेशानी सामने खड़ी होती है ,  लेकिन यह सब परेशानियों को हमें दूर करना है |

साथ ही उन्होंने कहा कि इंस्टिट्यूट और विश्वविधालय में जब स्टूडेंट्स नहीं आएंगे , तो तकनीकी शिक्षा को बेहतर बनाने का एक ही विकल्प है , मुझे लगता है की आने वाला समय ऑनलाइन शिक्षा का है |

ऑनलाइन शिक्षा से लोगों को बहुत उम्मीदें हैं और ऑनलाइन शिक्षा की भी अपनी चुनौतियां हैं , मुझे लगता है की तकनीकी शिक्षा में यह सब चुनौतियां नॉर्मल एजुकेशन से ज्यादा है , क्योंकि हमारा 30 से 40% प्रैक्टिकल होता है , हमारे सामने यह सब चुनौतियां रहती हैं |

कुलपति प्रोफेसर विनय कुमार पाठक ने कहा कि विश्वविद्यालय ने टेक्निकल इनोवेशन का इस्तेमाल किया है , विश्वविद्यालय ने तकनीकी के द्वारा सभी विद्यार्थियों को शिक्षा दे रहा है , सभी लोगों को असाइनमेंट दिए जा रहे हैं , साथ ही महामारी के दौरान हमने मैन्युफैक्चरिंग का भी काम किया है |  हमने यह माना है की कोरोना महामारी के दौरान हम बदले हैं , टेक्निकल इनोवेशन पर काम किया है,  हाल में ही हमने एक रोबोट बनाया है |

विवि के कुलपति प्रो. पाठक ने बताया कि रोबोट पूरी तरह से ऑटोमेटेड लो कॉस्ट, मानव रहित और कोविड-19 स्कैनिंग प्रोसेसज करने में कारगर है। उन्होंने बताया कि रोबोट को किसी परिसर के द्वार पर स्थापित किया जा सकता है। परिसर में प्रवेश करने वाले लोगों को रोबोट के सामने जाना होगा। रोबोट उनसे कुछ व्यक्तिगत जानकारी लेगा। इसके बाद व्यक्ति की थर्मल स्कैनिंग करेगा। इसके बाद कोरोना के कुछ लक्षणों से जुड़े प्रश्न पूछेगा, जवाब में व्यक्ति की तबीयत सामान्य होने पर ही रोबोट एंट्री टोकन प्रदान करेगा।

डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम प्राविधिक विवि (एकेटीयू) के सेंटर फॉर एडवांस स्टडीज में विवि के कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक ने बताया की  रैपिड करेंसी सैनिजाइजर एवं डिसइंफेक्शन मशीन विकसित की गई। यह मशीन विवि के सहायक आचार्य डॉ. अनुज शर्मा एवं शोध छात्र महीप स‍िंह द्वारा विकसित की गई है। इस मशीन में नोट की काउंङ्क्षटग के साथ ही सैनिटाइजेशन किया जा सकता है।

प्रो. पाठक ने बताया कि यह मशीन दो सौ नोट प्रति मिनट काउंट कर सैनिटाइज करती है। इस मशीन में यूवी रेज और एयरोसोल की प्रक्रिया के माध्यम से नोट सैनिटाइज किए जाते हैं। उनका कहना है कि यह बात भी सामने आ रही है कि वायरस का संचरण नोट के माध्यम से सबसे ज्यादा होने की संभावना है। इसलिए यह मशीन तेजी से नोटों को सैनिटाइज करने में सक्षम है।

परिचर्चा: कोरोना के बाद तकनीकी शिक्षा

एमिनेंट पनेलिस्ट्स: प्रोफ डॉ विनय कुमार पाठक, कुलपति, AKTU, लखनऊ प्रस्तुत कर्ता: प्रोफ मयंक पांडेय, JIMS, ग्रेटर नॉएडा

Posted by tennews.in on Thursday, July 23, 2020

महत्वपूर्ण यह कि कोरोना महामारी और उसके कारण लागू लॉकडाऊन का दौर बीतने के बाद स्कूल और कालेजों को स्थायी तकनीकी अवसंरचना में निवेश करना होगा। इसमें अध्यापकों का प्रशिक्षण डिजीटल वातावरण में काम करने के कौशल पर केंद्रित होगा। उच्च शिक्षण संस्थानों में परीक्षा पारंपरिक तरीकों की बजाय ऑनलाइन माध्यम से कराई जाएगी।

कोविड-19 का दौर बीतने के बाद शिक्षा के क्षेत्र में उभरने वाले आयामों पर किए गए एक अध्ययन में कहा गया  है कि कोविड-19 महामारी के कारण डिजीटल माध्यम से अधिक मात्रा में लोग पढ़ाई कर रहे हैं और कम अवधि वाले पाठ्यक्रम भी लोकप्रिय हो रहे हैं। इन बदलावों से कठिनाई तो हो रही है लेकिन इनसे शिक्षा के क्षेत्र में नए विचारों के उदाहरण भी सामने आ रहे हैं। इससे यह साफ है कि शैक्षणिक जगत में डिजीटल माध्यम का प्रभाव लंबे समय तक रहने वाला है।

कोरोना के दबाव के कारण स्कूल और कालेजों में पढ़ाई करने के लिए डिजीटल माध्यम का प्रयोग और अधिक किया जाएगा। शैक्षणिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए व्हाट्सएप, जूम, टीम जैसे एप और ई-मेल का प्रयोग बढ़ेगा। अकादमिक संस्थान ऐसी संरचना का विकास करेंगे जिसमें अध्यापक और छात्र अकादमिक परिसर से बाहर रहते हुए भी पठन-पाठन कर सकेंगे। संस्थान ऐसे स्थायी तकनीकी अवसंरचना में निवेश करेंगे जिसके माध्यम से गुणवत्तापूर्ण ऑनलाइन शिक्षा दी जा सकेगी।  इसमें विदेशी निवेश भी आकर्षित होगा।

विभिन्न देशों में अपनाए जा रहे तरीकों के आधार पर उच्च शिक्षण संस्थान परीक्षा के पारंपरिक तरीकों की बजाय ऑनलाइन माध्यम से छात्रों का मूल्यांकन करेंगे।  देश में ऑनलाइन शिक्षा से जुड़ी दिक्कतों को दूर करना होगा। इंटरनैट व सूचना तकनीक की पहुंच बेहद संकुचित है। देश में सबके लिए अच्छी स्पीड वाली इंटरनैट उपलब्धता अभी मुश्किल है।

42 फीसदी शहरी और 15 प्रतिशत ग्रामीण घरों में इंटरनैट की सुविधा है। अगर एक महीने में एक बार इंटरनैट का इस्तेमाल करने वालों को इंटरनैट से जुड़ा हुआ माना जाए तो सिर्फ 34 प्रतिशत शहरी और 11 प्रतिशत ग्रामीण लोग ही इंटरनैट का इस्तेमाल करते हैं। स्मार्टफोन अभी तक हर छात्र के हाथ में नहीं पहुंचा है। कोविड-19 वैश्विक महामारी ने विदेशों में पढऩे की इच्छा रखने वाले 48 प्रतिशत से अधिक भारतीय छात्रों का निर्णय प्रभावित किया है।

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