दिल्ली के चुनाव,राजनीति नये युग की ओर या पतन की नई सीमायें :श्रवण कुमार शर्मा

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दिल्ली  के चुनाव  अब अपने अंतिम चरण  में हैं .लोक सभा  चुनाव  के परिणामों पर स्पष्ट रूप से मोदी लहर का प्रभाव था  पर  विगत  ८ महीनों में  यद्यपि  मोदी सरकार राष्ट्रीय  स्तर पर काफी आगे बढती दिखाई  पड़ी है परन्तु  दिल्ली में मोदी सरकार मोटे तौर पर निष्क्रिय  सी रही है, जिसके कारण आज अरविन्द केजरीवाल और उनकी आप पार्टी  कड़ी चुनौती देती दिखाई पड़ रही है.यद्यपि भाजपा ने मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी के रूप मै किरण बेदी को पेश कर नेतृत्व के प्रशन का समाधान प्रस्तुत करने का प्रयास किया है, परन्तु कार्यकर्ताओं के स्तर पर अस्वीकार्यता और उनके अधिक बोलने के कारण एक भ्रमात्मक स्थिति पैदा हो गयी है, जिसका लाभ आप  उठाना चाह रही है. अरविन्द इस बात में कामयाब हो चुके हैं कि कमजोर वर्ग और अल्प्संख्यंक  उसके साथ हैं और कांग्रेस मुकाबले से बाहर हो चुकी है. प्राम्भ  में हम लोग इस बात से आशान्वित थे कि दिल्ली की राजनीति एक ऐसी दिशा की और बढ़ रही है जहाँ दोनों नेताओं में से किसी की भी सरकार बने , वै एक भ्रष्टाचार मुक्त  और सुशासन वाली सरकार चलायेंगें  और देश में एक नयी राजनीति की शरुआत होगी पर केजरीवाल ने जिस प्रकार  पानी  और बिजली  मुफ्त  देने की घोषणाएँ  की हैं  , उससे  लगता  है कि  उनकी  सरकार यदि  बनती है तो यह आर्थिक  कु प्रबंधन  की सरकार होगी , दिल्ली की  स्थिति  बिगडना  तय  है. टक्कर  बराबर की है , परिणाम  कुछ भी हो सकता है .भाजपा  दिल्ली मै एक सुव्यवस्थित  पार्टी नहीं है और उसके अनेक नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं . दिल्ली में वास्तविक रूप  से सुशासन की  आवश्यकता है, क्या  भाजपा  में वह क्षमता है?

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