विश्व योग दिवस पर शिक्षा से जुड़ना चाहिए योग और अध्यात्म : डॉ कुलदीप मलिक

Abhishek Sharma

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Greater Noida (17/06/2020) : इस साल छठा अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया जा रहा है. हालांकि, कोरोनावायरस महामारी के चलते इस साल योग दिवस का फोकस घर पर रहकर परिवार के साथ योग करने पर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने योग दिवस को लेकर एक ईवेंट लॉन्च किया है। इसका नाम ”माई लाइफ माई योगा” है। दरअसल, प्रधानमंत्री द्वारा पिछले महीने आयोजित हुए मन की बात कार्यक्रम में इसके बारे में बताया गया था।

 

टेन न्यूज ने अंतरराष्ट्रीय योग दिवस को लेकर आई टी एस इंजीनियरिंग कॉलेज के प्रोफेसर एवं मेरठ सहारनपुर मंडल से एमएलसी (शिक्षक वर्ग) प्रत्याशी डॉ. कुलदीप मलिक से खास बातचीत की। कार्यक्रम का संचालन राघव मल्होत्रा द्वारा बेहद बखूबी किया गया।

 

इस दौरान आई टी एस इंजीनियरिंग कॉलेज के प्रोफेसर एवं मेरठ सहारनपुर मंडल से एमएलसी (शिक्षक वर्ग) प्रत्याशी डॉ. कुलदीप मलिक ने आगामी 21 जून को विश्व योग दिवस के उपलक्ष पर सरकार से योग एवं अध्यात्म को शिक्षा से जोड़ने की अपील की है।

डॉ. मलिक के अनुसार इसमें कोई संदेह नहीं कि किसी भी राष्ट्र के निर्माण का रास्ता केवल और केवल शिक्षा के गलियारे से होकर गुजरता है। जिस देश की शिक्षा व्यवस्था जितनी सक्षम होगी वह राष्ट्र उतना ही मजबूती से आगे बढेगा।

 

अगर हम अपने देश की शिक्षा व्यवस्था की बात करें तो आज कल देश के अंदर यह बात आम होने लगी है कि हमारी शिक्षा अपने परिवेश – संस्कृति से दूर होती जा रही है। आज जो पढ़ लिख जाते है, वह मानो एक बड़ी यांत्रिक व्यवस्था के उपकरण के रूप में ढल जाते है। प्रतिस्पर्धा की दुनिया में उसका उद्देश्य सफलता, उपलब्धि और भौतिक प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ने तक ही सीमित रह जाता है।

 

उन्होंने कहा कि आज प्रचलित शिक्षा मनुष्य को स्वचालित रोबोट बनाने पर जोर देती है। इस शिक्षा से निकलने वाले होनहार युवाओं की स्थिति विचित्र होती जा रही है। जिस सीढ़ी के सहारे चढ़कर वे ऊपर पहुंचते है उसी सीढ़ी से ही आगे जाकर वे बेझिझक अलग हो जाते हैं।

 

आज शिक्षा एक खास तरह का व्यापार बनती जा रही है। आज विद्यालयों के साथ समाज का रिश्ता नहीं बन रहा है और उनकी जनभागीदारी बहुत सीमित हो गई है। आज की शिक्षा व्यवस्था आधुनिकता और हमारी प्राचीन ज्ञान परंपरा के बीच आज तक सामंजस्य नहीं बना पा रही है। इसमें कोई संदेह नहीं कि सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हमनें प्रगति तो बहुत की है, परंतु इन सबके बीच इंसान खो सा गया है। आज बुद्ध, महावीर, ईसा, स्वामी विवेकानंद सहित हमारे पूर्वजों के विचार कहां हैं? हम किधर जा रहे हैं? आज यह एक बेहद विचारणीय सवाल है।

 

आज देशी विदेशी अनुसंधान से जो आंकड़े सामने आ रहे हैं उनसे साफ है कि वैश्विक दौर की भागती दौड़ती जिंदगी ने बच्चों की आंखों से नींद छीन ली है। बच्चे अब पहले की तुलना में ज्यादा निर्मम, आक्रमक और एकल होते जा रहे हैं। एक रिपोर्ट यह भी बता रही है कि देश के 42 फ़ीसदी बच्चे अनिद्रा के शिकार है। इसका दुष्परिणाम यह है कि नींद में डर जाना, चलना, सोते-सोते बातें करना, रोना और डरावने सपने देखने जैसी समस्याएं इन्हें परेशान कर रही है है।

 

उन्होंने कहा कि एक अध्ययन से यह भी पता चला है कि भारतीय बच्चे यूरोपीय बच्चों की तुलना में कम नींद ले पा रहे हैं जिसका परिणाम है कि उनका स्वाभाविक विकास बाधित हो रहा है और खेलने खाने की उम्र में ही उनका बचपन विसंगतियों से भर रहा है।

YOGA , SPIRITUALITY AND EDUCATION – INTERVIEW OF DR PROF KULDEEP MALIK

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Posted by tennews.in on Tuesday, June 16, 2020

इन सभी समस्याओं का कारण कहीं ना कहीं हमारी शिक्षा व्यवस्था ही है। अगर हम प्राचीन काल की शिक्षा व्यवस्था की बात करें तो हमारे यहां गुरुकुल एवं पाठशाला मौजूद थे। जहां योग एवं अध्यात्म का शिक्षा व्यवस्था के अंदर समावेश था। इसमें कोई शक नहीं कि प्राचीन काल में योग एवं अध्यात्म के बल पर जो शिक्षा हम अपने छात्रों को देते थे उसी के चलते हम कभी विश्व गुरु हुआ करते थे।

 

यहां ध्यान देने वाली बात यह भी है कि गुलामी के दौर में अगर सबसे ज्यादा किसी क्षेत्र पर प्रहार हुआ तो वह हमारा शिक्षा का क्षेत्र है। यहां आने के बाद अंग्रेज अधिकारियों ने प्रारंभिक शिक्षा के संबंध में जो रिपोर्ट पर लिखी थी वह आश्चर्यजनक रूप से इस स्थिति प्रदर्शित करती है  कि उनकी नजरों में हमारी शिक्षा संस्कृति से जुड़ी थी। धीरे धीरे अंग्रेजी शासकों ने हमारी शिक्षा व्यवस्था को ध्वस्त किया और हमारी संस्कृति को शिक्षा व्यवस्था से अलग करने का काम किया।

 

आजादी के 70 साल से ज्यादा का समय बीत जाने के बाद जहां देश में कई राजनीतिक दलों की सरकारें आई और गई, परंतु अभी तक हम अपनी शिक्षा व्यवस्था में उस तरह से बदलाव नहीं कर पाए जिससे कि हम अपनी पुरानी शिक्षा व्यवस्था की ओर रुक कर सके। इस सबका ही परिणाम है कि आज हम भले ही अपने आप को आजाद महसूस करते हो, लेकिन फिर भी कहीं ना कहीं मानसिक रूप से अभी भी गुलाम है।

 

लेकिन शायद अब समय आ चुका है हम अपनी शिक्षा व्यवस्था पर एक बार पुनः गंभीरता के साथ विचार करें और इसके अंदर योग अध्यात्म को सम्मिलित करें। आज देश के युवाओं को शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक रूप से बलशाली बनने की आवश्यकता है और इसका केवल और केवल एक ही तरीका है कि हम योग एवं अध्यात्म को शिक्षा व्यवस्था का अभिन्न अंग बनाएं, ताकि हम सभी मिलकर देश को पुनः विश्वरूप के रूप में स्थापित कर सकें।

 

यहां ध्यान देने वाली बात यह भी है कि पिछले 6 सालों में देश में आदरणीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है जिसने देश में ही नहीं अपितु विदेशों में भी योग को पुनः स्थापित करने में एक बड़ी भूमिका अदा की है। पूरे विश्व में 21 जून को विश्व योग दिवस के रूप में मनाया जाना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

 

डॉक्टर मलिक के अनुसार अगर हम सभी इस देश को पुनः विश्व गुरु बनाना चाहते हैं तो कहीं ना कहीं किसी न किसी रूप में हमें योग एवं अध्यात्म को शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा बनाना पड़ेगा। तभी हम सभी के विश्व गुरु बनने का सपना साकार हो पाएगा।

 

डॉ मलिक के अनुसार इस निर्णय को लेने का सबसे अच्छा दिन विश्व योग दिवस यानी 21 जून ही होना चाहिए और उन्हें पूरा विश्वास है कि इस निर्णय का हिंदुस्तान की 137 करोड़ जनता पूरी गंभीरता के साथ स्वागत करेगी।

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