अंतरिक्ष में उपयोग के लिए इन्फ्लेटेबल स्ट्रक्चर और मैटेरियल्स पर आईआईटी रुड़की का सेमिनार

ABHISHEK SHARMA

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Greater Noida : अंतरिक्ष विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी पर आधुनिक शोध के लिए इस साल आईआईटी रुड़की में इसरो आईआईटी स्पेस टेक्नोलॉजी सेल की स्थापना की गई। अंतरिक्ष में उपयोग के लिए इनफ्लैटेबल स्ट्रक्चर और मैटेरियल्स पर यह देश में दूसरा सेमिनार है। जिसका आयोजन आईआईटी रुड़की के ग्रेटर नोएडा कैंपस में किया गया।

संस्थान के मैकेनिकल एवं औद्योगिक इंजीनियरिंग विभाग और भारतीय अंतरिक्ष उद्योग  प्रदर्शनीकर्ता अहमदाबाद ने यह आयोजन किया। इस सीरीज का पहला सेमिनार 2016 में आईआईटी कानपुर में किया गया था। दुनिया के प्रमुख अंतरिक्ष अभिकरणों को अपने मित्रों के लिए बड़े आकार की संरचनाओं के साथ बहुत हल्के साधनों की खोज रही है। इनफ्लैटेबल स्ट्रक्चर इसका सबसे सही साधन है, कई रक्षा संगठन भी विभिन्न उपयोगों के लिए इनफ्लैटेबल स्ट्रक्चर चाहते हैं।

सेवानिवृत्त प्रोजेक्ट निदेशक, ए.सी माथुर ने कहा कि भारत में इनफ्लैटेबल स्ट्रक्चर टेक्नोलॉजी शुरुआती दौर में हैं। व्यवसायिक स्तर पर कुछ कंपनियां ही ऐसे प्रोडक्ट बनाती हैं। इसके लिए इंजीनियरिंग डिजाइन फेब्रिकेशन और वैज्ञानिक एवं  टेक्निकल स्ट्रक्चर बनाने की शुरुआत भी कुछ संगठनों ने ही की है। 2 दिन के सेमिनार में शिक्षा उद्योग जगत और शोध एवं विकास संगठनों के 71 प्रतिभागी रहे।

विभिन्न आईआईटी इसरो, डीआरडीओ और उद्योगों के विशेषज्ञों ने उनके अनुभव बताते हुए अपने विचार रखे और स्वदेशी मेटेरियल और इनफ्लैटेबल स्ट्रक्चर बनाने की चुनौतियों की भी जानकारी दी। कुछ उद्योगों ने खुद के विकसित किए प्रोडक्ट और मैटेरियल्स की प्रदर्शनी भी लगाई। इससे युवा प्रतिभागियों का ज्ञान वर्धन हुआ और देश में इस उद्योग के बढ़ने की संभावनाओं की जानकारी मिली।

वहीं इस दौरान मुख्य अतिथि निदेशक डीआरडीओ आगरा,  अरुण कुमार सक्सेना ने कहा कि हम कई वर्षों से इनफ्लैटेबल स्ट्रक्चर पर कार्यरत हैं और आईआईटी रुड़की जैसे संस्थान का सहयोग मिलना हमारे लिए सौभाग्य की बात है। एक आम इंसान के लिए भी आसपास की कई चीजों को जानना जरूरी है। जैसे कि पैराशूट, जो भारतीय सेना अलग-अलग हवाई जहाजों में इस्तेमाल करती है।

सेमिनार में कई इनफ्लैटेबल स्ट्रक्चर जो पूरी तरह भारत में बने हैं उन पर प्रतिभागियों ने विचार-विमर्श किए। उन्होंने कहा कि हम भविष्य में आईआईटी से करार करने और इस पहल को आगे ले जाने की आशा रखते हैं।

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