निहितार्थों की बैशाखी पर टिकी ‘विपक्षी एकता’

अनिल निगम

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तीन राज्यों  में विधानसभा का चुनावी बिगुल इसी साल बजने वाला है। उसके बाद अप्रैल-मई 2019 में देश में लोकसभा चुनाव होने वाले हैं। कनार्टक विधानसभा के परिणाम के बाद से विपक्षी नेताओं ने भाजपा को आगामी लोकसभा से बाहर रखने के लिए विपक्षी गठजोड़ बनाने की कवायद छेड़ रखी है। नेशनल रजिस्ट र फॉर सिटीजन (एनआरसी) ड्रॉफ्ट रिपोर्ट के मामले में बंगाल की मुख्य मंत्री एवं त्रण मूल कांग्रेस (टीएमसी) की सुप्रीमो ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार और भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन्होंेने इसी बहाने विपक्षी दलों को एक जुट करने की मुहिम को धार दे दी है। हालांकि असम और उत्तहर पूर्व राज्यों  में बांग्ला देशियों की घुसपैठ से न केवल वहां के स्था नीय निवासी निजात पाना चाहते हैं बल्कि पूरा देश इसका स्थाकयी समाधान चाह रहा है।

कांग्रेस, त्रण मूल कांग्रेस (टीएमसी), समाजवादी पार्टी (सपा), बहुजन समाजवादी पार्टी (बसपा), नेशनलिस्टह कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) सहित सभी दलों का एकमात्र उद्देश्या भाजपा को सत्ताी में आने से रोकना प्रतीत होता है। जब कोई भी राजनैतिक दल अपने निहितार्थ या क्षणिक लाभ के लिए इस तरह के समझौते करता है तो इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि ऐसे समझौते या गठबंधन भी समय की कसौटी पर खरे नहीं उतर पाते और जिस तरह से उनका गठन होता है, उसी तरह से उनके पतन की कहानी भी बन जाती है। यक्ष प्रश्नल यह है कि जो भी दल मिलकर भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोलना चाहते हैं उनमें आचार-विचार और सिद्धांतों की समानता क्याज है? वे जनता को कैसे समझा पाएंगे कि वैचारिक तौर एक दूसरे के धुर विरोधी रहे सपा और बसपा में कोई अंतर नहीं है या कांग्रेस और एनसीपी में कोई मौलिक अंतर नहीं है? फिर जनता के पास इस बात की क्याझ गारंटी है कि चुनाव के पहले एक साथ चलने वाले दल चुनाव के बाद अपने निहितार्थों के लिए एक दूसरे पर कीचड़ नहीं उछालेंगे और वे जनता की अपेक्षाओं पर खरे उतरेंगे?

टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी, सपा अध्य्क्ष अखिलेश यादव और कांग्रेस अध्यछक्ष राहुल गांधी विपक्षी एकता के सबसे बड़े पक्षधर बनकर उभरे हैं। राहुल ने तो विपक्षी दलों का नेतृत्वष करने की अपनी दावेदारी को अप्रत्यरक्ष तौर पर कई बार जाहिर करने का प्रयास भी किया है। उनके द्वारा प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में अपनी मंशा की घोषणा करना और मोदी सरकार के खिलाफ लाए गए अविश्वापस प्रस्ता व पर चर्चा में मु‍खर वक्ताऔ के रूप में खुद को प्रस्तुकत करने को इसी रूप में देखा जा रहा है।

पिछले दिनों कर्नाटक विधानसभा में एचडी कुमार स्वाामी के हुए शपथ ग्रहण समारोह में मंच पर विपक्षी एकजुटता की एक झलक दिखाई पड़ी थी। मंच पर संप्रग प्रमुख सोनिया गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी,  टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी, पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा, सपा प्रमुख अखिलेश यादव, केरल के मुख्यमंत्री पिनारई विजयन, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू,  माकपा नेता सीताराम येचुरी, समाजवादी नेता शरद यादव और बसपा प्रमुख मायवती भी दिखीं। इनके अलावा लालू यादव के पुत्र तेजस्वी यादव, रालोद प्रमुख अजीत सिंह, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और भाकपा के डी. राजा और राकांपा प्रमुख शरद पवार भी इस मौके पर उपस्थित थे। विपक्षी दलों की इस एकजुटता ने यह संकेत दे दिया था कि वे भाजपा के खिलाफ एक मंच पर आने को तैयार हैं और कम से कम लोकसभा चुनाव के पहले वे एक संयुक्तफ मोर्चा बना सकते हैं।

हालांकि हमारे देश की संवैधानिक स्थिति ऐसी है कि यहां पर विभिन्नन राजनैतिक दल चुनावी समर में उतरते हैं, पर पिछले कुछ वर्षों से दोहरी पार्टी सिस्ट म जैसी परंपरा बन चुकी है। लेकिन यह भी देखा गया है कि जब देश में लोकसभा के आम चुनाव नजदीक आते दिखाई देते हैं, विभिन्न  राजनैतिक दल तीसरा मोर्चा बनाने की जद्दोजहद शुरू कर देते हैं। इस बार विपक्षियों को एक मंच पर लाने के लिए सबसे ज्याकदा गंभीर ममता बनर्जी के अलावा सपा अध्य्क्ष अखिलेश यादव दिखाई देते हैं। हालांकि इस मुहिम में राहुल गांधी, एनसीपी प्रमुख शरद पंवार, बसपा प्रमुख मायावती, तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव (केसीआर), राष्ट्री य जनता दल इत्याकदि की भी एकजुट होने की ललक बनी हुई है।

उन सभी के अंदर इस बात का भय बना हुआ है कि अगर वे लोकसभा चुनाव के दौरान एकजुट होकर चुनाव नहीं लड़े तो नरेंद्र मोदी और अमित शाह के विजयी रथ को रोक पाना संभव नहीं होगा। और उनके अगले पांच साल फिर गए पानी में। गौरतलब है कि हमारे देश में 1977 से 1999 के बीच विभिन्नफ दलों के गठबंधन की सरकारें रहीं। आपातकाल के बाद मोरारजी देसाई के नेतृत्वऔ में गठबंधन की पहली सरकार बनी थी, जो 857 दिनों तक चली थी। लोग उस समय आपातकाल से त्रस्त‍ थे, इसलिए गठबंधन पर अपना भरोसा जताया था। तत्पउश्चालत चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बने और जनवरी 1980 तक प्रधानमंत्री रहे। उसके बाद भी जितनी गठबंधन सरकारें बनीं, उनका कार्यकाल बहुत कम समय का रहा। वी पी सिंह 344 दिन, चंद्रशेखर 224 दिन, मई 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी पहली बार 13 दिन और दूसरी बार (1998) 13 महीने, देवेगौड़ा 325 दिन, और आई के गुजराल 333 दिन गठबंधन की सरकार में प्रधानमंत्री रहे। इस दौरान नेताओं ने सत्ताासीन होने के लिए जिस तरह की दूषित राजनीति का परिचय दिया, उससे देश की जनता की भावनाएं बुरी तरह से आहत हो गईं।

विपक्षी गठबंधन की आधारशिला रखने के पहले इसमें शामिल होने वाले दलों को यह सोचना पड़ेगा कि क्या  प्रधानमंत्री पद का कोई सर्वमान्यव नेता उनके बीच में है? क्या1 मायावती, शरद पंवार और ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री बनने के आकांक्षी राहुल गांधी के नाम पर अपनी सहमति जता दी है? जहां एक-एक सीट के बंटवारे के लिए सपा, बसपा और कांग्रेस के बीच तलवारें खिंच जाती हैं, वहां देश भर में चुनाव लड़ने के लिए राष्ट्री य और क्षेत्रीय दलों के बीच तालमेल का उनके पास क्या  फार्मूला है? भाजपा जहां लोकसभा चुनाव को मिशन 2019 के रूप में लेकर मैदान में ताल ठोंक रही है, वहीं विपक्षियों का अभी एकजुट होना और न्यूमनतम कॉमन एजेंडा तय करना बांकी है। ऐसे में मिशन व सिद्धांत की राजनीति करने की जगह महज विरोध की राजनीति करने वाले विपक्षी दलों के लिए लोकसभा चुनाव-2019 में भाजपा को पटकनी की मंशा मुंगेरीलाल के सपने से कम नहीं प्रतीत होता।

(लेखक वरिष्ठक पत्रकार है।)

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