दीपावली के बाद प्रदूषण – कुछ अनुत्तरित सवाल – श्रवण कुमार शर्मा

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कल दीपोत्सव सम्पन्न हो गया.आज गोवर्धन है.कल पूजन के समय तक मन उत्साह  और उल्लास  से  परिपूर्ण था. घर की  सफाई, लाइट लगवाना, फूलो की सजावट, नये कपडे खरीदना,मिठाई और गिफ्ट्स  और  सबसे  अधिक  लक्ष्मी -गणेश , मिटटी के दिए ,खील , बताशा और पूजा की सामग्री  लेना  और स्वयं पूजा करना  और हाँ  पंचामृत  बनाना  आदि आदि, कितना कुछ आनन्ददाई है इस त्यौहार में.पर, पूजा पूर्ण होने  से पहले ही हर वर्ष की तरह पटाखें फूटने शुरू हो गये. और, रात भर  पटाखें छूटते रहे. शाम से फिर अनवरत  पटाखों को  दौर जारी है, शाम को घूमने निकले तो  सब बदला बदला सा लगा, हवा मै जलने की सी आ रही है,आँखें जल रहीं हैं,सर में दर्द हो रहा है, छूटे पटाखें और डब्बों के ढेर चारों तरफ लगें  हैं, The air quality in Delhi severely deteriorated a day after Diwali with the city recording nine times higher pollution level than the normal.The Respirable Suspended Particulate Matter (RSPM), which directly affects breathing, was at 531 mg per cubic metre, more than five times higher than the normal level leaving many at risk of respiratory problems..
The study, which covered 1,600 cities, also said that India has 13 of the 20 cities with the worst air quality worldwide.

Pollution levels in Indian cities have often been compared to Chinese counterparts such as Beijing, notorious for the smog that prompted some Anglophone residents to dub it “Greyjing”.

Delhi has recorded the highest level of pollution post-Diwali this year followed by Kolkata where the SPM level was 417 mg per cubic metre, and Chennai at 320 mg per cubic metre.

उक्त से  हमें  अंदाज  लग सकता है  कि दीपावली के बाद हमारे  शहरों की स्थिति क्या बन गयी है.क्या हम एक जुम्मेदार  समाज और राष्ट्र के रूप में सोच सकते हैं ? क्या हमारे  पास कोई धर्म और संस्कृति  के स्तर पर कोई नेतृत्व  है ? दीपावली पूजन के बारे में अनेक कार्यक्रम  टीवी चैनलस  पर होते हैं , कोई भी पंडित  या  संत  लोगों को  यह क्यों नहीं बताता कि इतने पटाखें  चलाना धर्मविरुद्ध  है , इससे  प्रकृति  कुपित  होती  है और  लक्ष्मी  ऐसे दूषित वातावरण  से दूर चली जाती हैं.सफाई  अभियान  का क्या हुआ ? क्या हम  इसे भूल गये ?दीपावली पर दान के महत्त्व  की बात पंडित  और  संत क्यों नहीं करते . क्या दीपावली के धार्मिक स्वरुप पा बाजार  हावी हो गया है ?

 

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