ट्रांसजेंडर अमृता सोनी के जीवन संघर्ष की अनोखी दास्ताँ

ROHIT SHARMA

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नई दिल्ली :– देश में ऐसे बहुत कम लोग होते है, जिन्होंने बहुत सी चुनौतियों का सामना किया। जो प्रेरक व्यक्तित्व बन जाते है, जिनसे बहुत कुछ सीखने को मिलता है। वही आज फिर टेन न्यूज़ नेटवर्क आपके सामने एक प्रेरक व्यक्तित्व को लेकर आ रहे है, जिनसे बहुत ज्यादा सीखने को मिलेगा। कोरोना महामारी के दौरान टेन न्यूज़ नेटवर्क बहुत से अनोखे कार्यक्रम कर चुका है, जिसको लेकर लोगों में उत्साह रहता है।

 

वही इस कड़ी में आज टेन न्यूज़ नेटवर्क ने “एक खास मुलाकात , प्रेरक व्यक्तित्व के साथ”कार्यक्रम आयोजन किया, इस कार्यक्रम में भारत की पहली ट्रांसजेंडर अधिकारी, हेल्थ डायरेक्टर ट्राई, गवर्नमेंट अधिकारी अमृता सोनी शामिल हुई। ये कार्यक्रम टेन न्यूज़ नेटवर्क के यूट्यूब और फेसबुक चैनल पर लाइव किया गया है।

इस कार्यक्रम का संचालन मशहूर लेखिका, कवयित्री, राजभाषा अधिकारी, काव्य सृजन महिला मंच की राष्ट्रीय अध्यक्षा, समाजसेविका डॉ. संगीता शर्मा ने किया। डॉ संगीता शर्मा ने अमृता सोनी से महत्वपूर्ण प्रश्न किए , जिसका जवाब अमृता सोनी के द्वारा दिए गए।

 

आपको बता दे की ट्रांसजेंडर वो होते हैं जिसका मजाक उड़ा लोग हँसते हैं और जिसे समाज की मुख्यधारा में शामिल नहीं किया जाता। उपहास और तिरस्कार का घूँट पीकर भी ये लोगों के चेहरे पर मुस्कान लाने का काम सदियों से करते आ रहे हैं। ऐसी ही एक ट्रांसजेंडर अधिकारी की कहानी जिसके यौन-शोषण से समाज की मुख्यधारा के लोग नहीं चूके।

 

प्रतिकूल परिस्थितियों को झेलते हुए भी उसने अपनी पढ़ाई पूरी की और आज भारत की पहली ट्रांसजेंडर अधिकारी बन एड़्स पीड़ितों की सेवा में लगी हुई है। छत्तीसगढ़ राज्य सरकार ने एड्स पीड़ितों की सेवा के लिए ट्रांसजेंडर अमृता सोनी को नोडल अधिकारी बनाया है। यह नियुक्ति इसलिए भी खास है कि क्योंकि वो स्वयं एचआईवी संक्रमित हैं।

कोल्हापुर में जन्मे अमृता का बचपन आम बच्चों की तरह नहीं बीता। पिता ने कभी प्यार नहीं किया और कुदरत की गलती का एहसास अमृता को कराते रहे. माँ के अलावे कोई ऐसा नहीं था जिसने उसे समझने की कोशिश की हो। दसवीं की पढ़ाई के बाद चाचा उसे अपने साथ इलाज के बहाने दिल्ली ले गए. वहाँ चाचा ही उसका यौन-शोषण करने लगे।

किसी तरह अमृता ने बारहवीं तक की पढ़ाई की। घर लौट कर जब सबके सामने चाचा की करतूतों के बारे में बताया तो पिता ने साफ कह दिया कि तुम हमारे लिए मर चुकी हो। माँ की अपनी मज़बूरियाँ थी। उसके बाद अमृता ने घर छोड़ दिया और पुणे पहुँच गई. लेकिन पुणे जैसे शहर में छत और रोटी की तलाश करना एक चुनौतीपूर्ण काम था।

सुनिए अमृता की आपबीती उनकी ही ज़ुबानी :– भारत के इतिहास में पहली बार किसी थर्ड जेंडर को नोडल अधिकारी बनाया गया है और आज मुझे अपने किन्नर होने पर गर्व है। मैं आज जो कुछ भी हूं, अपनी माँ और अपनी दोस्तों की वजह से हूं। मैंने मॉडलिंग की, किन्नरों की तरह परंपरागत रूप से नाच-गाकर भीख माँगी, सेक्स वर्कर के तौर पर काम किया, लेकिन आख़िर में उस दलदल से निकल कर यहां पहुंची।

कोल्हापुर में बचपन के दिन मुझे याद हैं। लेकिन मेरा बचपन, बचपन की तरह नहीं था। माता-पिता बच्चों की पसंद का ध्यान रखते हैं, उसके लालन-पालन में कोई कसर न रह जाए, इसकी कोशिश करते हैं. लेकिन मेरे साथ ऐसा नहीं था। मेरी माँ बहुत प्यार करती थी, लेकिन पिता एक किन्नर के तौर पर मुझे पसंद नहीं करते थे। माँ के सिवा कोई भी यह समझने की कोशिश नहीं करता था कि इसमें मेरी कोई ग़लती नहीं है। माँ सारे ताने सहती, “तूने गुड़ पैदा किया है, तूने मामू पैदा किया है।

10वीं की पढ़ाई के बाद चाचा ने मुझे अपने साथ दिल्ली ले जाने की पेशकश की। तर्क ये दिया गया कि वहाँ जाकर कुछ सुधार जाएगा और कुछ इलाज भी करवाने की कोशिश की जाएगी, लेकिन चाचा ने मेरा यौन शोषण करना शुरू कर दिया। किसी तरह 12वीं की पढ़ाई पूरी हुई। घर लौटी तो घर वालों को चाचा की करतूत बताई, लेकिन घर में कोई भी यह मानने के लिए तैयार नहीं था। दूसरे चाचाओं और पापा ने साफ़ कह दिया कि तुम हमारे लिए मर चुके हो। माँ के हिस्से भी अपनी मजबूरियां थीं। मेरी माँ ने मुझे घर से निकाल दिया , उन्होंने मुझे 100 रूपये दिए | उस 100 रूपये को लेकर में पुणे पहुँची , वो 100 रूपये पुणे तक आने में खत्म हो गए | वही मुझे बहुत तेज भूख लग रही थी , लेकिन मेरे पास पैसे नहीं थे | मेने देखा की एक वड़ा-पाव जमीन पर गिरा पड़ा हुआ है , मेने उसे उठाकर खाया , जिससे मेरी भूख थोड़ी देर के लिए शांत हुई | उन्होंने कहा की मुंझे एहसास हुआ की अन्न के लिए मेरे माँ बाप कितनी मेहनत करते है |

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मेरी आंखों के सामने वो पूरा दृश्य है, जब मैं सोलापुर से पुणे रेलवे स्टेशन में अपना बैग लेकर उतरी। मेरे सामने सबसे बड़ा सवाल था कि मैं कहां जाऊं, क्या करूं। पीछे सब कुछ छोड़ आई थी और आगे सब कुछ अंधेरी कोठरी जैसा था। रुआंसी होकर मैंने किन्नरों को तलाशना शुरू किया। लगा कि वही मुझे अपना लें तो कम से कम ज़िंदा रहने की कोई वजह तो रहेगी।

मैंने माँ को समझाया कि अब मैं ऐसे ही रहूंगी। माँ ने कहा कि तेरी बहनों की शादी होनी है, तू इस तरह रहेगा तो यह सब मुश्किल हो जाएगा। तूझे जैसे रहना है रह, हमेशा ख़ुश रहना। कोशिश करना कि पढ़ाई पूरी हो जाए। माँ से विदा लेकर मैं पुणे लौटी और सेक्स वर्कर के तौर पर काम करने लगी। ज़िंदगी ऐसी ही चल रही थी, लेकिन माँ की सीख याद थी। एक दिन अपनी किन्नर गुरु को कहा कि मैं पढ़ना चाहती हूं तो वो हंसने लगी और बोली, “कोई हिजड़ा पढ़ कर करेगा क्या? क्या पढ़ने से यह समाज हमें स्वीकार कर लेगा?”

मैंने उनकी नहीं सुनी और ग्रेजुएशन के लिए एडमिशन टेस्ट दिया। चयन हुआ जामिया मिलिया इस्लामिया में। पहले दिन मैं साड़ी पहन कर कॉलेज गई तो अजीब लगा। अगले दिन से मैंने लड़कों वाले ड्रेस पहन कर जाना शुरू किया। पढ़ाई के लिये पैसे की ज़रूरत थी और उस समय कॉल सेंटर का क्रेज़ था। मैं थी तो बारहवीं पास, लेकिन कान्वेंट की पढ़ाई के कारण अंग्रेज़ी अच्छी थी। तुग़लक़ाबाद रोड में पीसीएल नामक एक कॉल सेंटर में किसी तरह काम मिला। मैंने अमरीकन अंदाज़ में अंग्रेज़ी बोलना सीखा।

ग्रेजुएशन की पढ़ाई चलती रही और कॉल सेंटर का काम. दिन में कॉलेज जाती और रात को कॉल सेंटर। ट्रेनी एक्ज़क्यूटीव की नौकरी पाई थी और जब पढ़ाई ख़त्म करके महाराष्ट्र लौट रही थी, तो एक्सेंट ट्रेनर सर्टिफ़ाई हो चुकी थी। लौट कर मुंबई में एक कॉल सेंटर में काम मिला, लेकिन यौन शोषण के कारण काम छोड़ना पड़ा। फिर मैंने कई जगह काम तलाशने की कोशिश की, लेकिन हर जगह मुझे यही कहा गया, “यहां हिजड़ों के लिए कोई काम नहीं है।

पुरानी दलदल की यादें मेरे सामने आ गईं। मैंने ट्रेनों में भीख माँगना शुरू कर दिया, लेकिन यह काम भी नहीं चल पाया और एक दिन पुलिस ने पकड़ कर मरते दम तक पीटा, मैं सोचती रही कि ये मैं क्या कर रही हूँ। माँ को फ़ोन लगाया , माँ ने फिर नसीहत दी कि आगे पढ़ो, सब अच्छा होगा।

इस बीच अल्पेश नामक एक युवक से शादी हुई, लेकिन शादी चली नहीं और उसने मुझे छोड़ दिया। मैंने फिर से कमर कसी, मॉडलिंग शुरू की, दूसरे काम भी देखे। इस बीच परीक्षा दी और पुणे के सिंबॉयसिस में एडमिशन मिल गया, लेकिन साल के चार लाख रुपये की फ़ीस सुन के सन्न रह गई. लगा कि यह नहीं हो सकेगा। एक ट्रांसजेंडर ने ही सुझाया, “तू डांस बार में काम करना शुरू कर दे।

ज़िंदगी के लिए इस वसीले से एक इम्तहान और सही बार गर्ल के तौर पर काम करना शुरू किया और सेक्स वर्कर के तौर पर भी पैसे मिलते रहे, पढ़ाई चलती रही। एक दिन विपणन और मानव संसाधन में मेरी एमबीए की पढ़ाई भी पूरी हो गई | नौकरी का सवाल फिर सामने था, लेकिन इस बीच एक दिन जब बीमार पड़ी और चेकअप करवाया तो पता चला कि मैं एचआईवी से संक्रमित हो चुकी हूं. मेरी दुनिया बदल गई थी।

हताश और निराश हो कर मैं अपने किन्नर गुरु के पास गई. एक और ट्रांसजेंडर दोस्त महेश कुंदनकर से मिली. 2009 में मैत्री फ़ाउंडेशन की मीरा शान से मिली और अंततः मैंने फ़ाउंडेशन में ट्रांसजेंडर लोगों के लिए काम करना शुरू कर दिया. फिर मैं अभिनव अय्यर के संपर्क में आई | फिर एक दूसरी संस्था में स्टेट कम्युनिटी एडवाइज़र के तौर पर मैंने ट्रांसजेंडर मैपिंग का काम शुरू किया. महिला सेक्स वर्कर, एचआईवी से पीड़ित बच्चे और ट्रांसजेंडर लोगों के बीच काम का सिलसिला जारी रहा |

 

अमृता कहती हैं, “हमारी दुनिया बदल रही है, इस दुनिया को भी हमारे लिए बदलने की ज़रूरत है | इस दौरान मेरी अपनी एक नई दुनिया बनी. कई लोग जीवन में मिले, जो रिश्तेदारों से कहीं बढ़ कर थे | एक दूसरी संस्था ने छत्तीसगढ़ में बतौर स्टेट एडवोकेसी अफ़सर बनाकर मुझे भेजा, जहां मुझे छत्तीसगढ़ सरकार और हिंदूस्तान फैमली प्लानिंग प्रमोशन ट्रस्ट के साथ मिल कर पूरे राज्य में काम करने का अवसर मिला और अब मुझे यह नई ज़िम्मेदारी मिली है, जहां मैं समाज के सभी लोगों के स्वास्थ्य के अधिकार के लिए काम कर रही हूं |

 

उन्होंने कहा की मेरी दूसरी शादी हुई , में माँ नहीं बन सकती थी , इसलिए मेरा पति मुझे छोड़कर बिहार चला गया | आज भी में उसे ढूंढ रही हूँ , मेने इस मामले में पुलिस से शिकायत भी की है |

 

छत्तीसगढ़ में अधिकांश जगहों पर सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के बाद थर्ड जेंडर के लोग ही हैं, जो एचआईवी संक्रमित लोगों के लिए सीधे तौर पर काम कर रहे हैं | हमें थर्ड जेंडर का दर्जा ज़रुर मिला है और समाज में हमारे प्रति बदलाव भी आया है, लेकिन यह बदलाव उतना नहीं है. आज भी अगर ऑटो, बस या ट्रेन में कहीं बैठ जाऊं तो पास में कोई नहीं बैठता |

 

अमृता मानती हैं कि चूंकि वह खुद एचआईवी ग्रस्त थीं इसलिए लोगों से अलग तरह का संबंध जुड़ा और लोग आसानी से उनके करीब आ कर अपनी परेशानी बताने लगे। उन्हें एआरटी केंद्रों तक पहुंचने के लिए मुफ्त बस पास बनवाने के लिए उन्होंने छत्तीसगढ़ सरकार से मदद मांगी। जिन केंद्रों तक जाने के लिए सिर्फ निजी बस ऑपरेटर थे उनसे मुफ्त पास के लिए उन्होंने लंबी लड़ाई लड़ी। वह सचिव स्तर तक गईं ताकि एआरटी केंद्र तक जाने के लिए मरीजों को कोई परेशानी न आए।

 

अमृता कहती हैं, ‘मैं चाहती हूं हमें अलग मत समझिए। हम आप लोगों जैसे ही हैं। कई लोग खुद में घुट रहे हैं क्योंकि दो वक्त का खाना, दो जोड़ी कपड़े और छत के अभाव में ऐसे लोग कहां जाएं जो पुरुष नहीं महिला हो कर जीना चाहते हैं। हमें समाज से बस प्यार चाहिए और कुछ नहीं।

 

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