यूनाइटेड अगेंस्ट हेट ने असम में मानवाधिकार उल्लंघन को लेकर किए चौंकाने वाले खुलासे

ROHIT SHARMA

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नई दिल्ली :– राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) के काम की गंभीरता पर सवालिया निशान लगाते हुए आज दिल्ली में यूनाइटेड अगेंस्ट हेट संस्था ने फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट जारी की | साथ ही प्रेस वार्ता करते हुए रिपोर्ट में कई ऐसे मामले उठाए गए, जिसमे एनआरसी के नाम पर निर्दोष लोगों को निशाना बना कर उन्हें परेशान किया जा रहा है. रिपोर्ट में एनआरसी की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल उठाये गए और इसे ठीक रूप में लागू करने की मांग की गई |

आपको बता दे की की हाल ही में यूनाइटेड अगेंस्ट हेट संस्था की टीम कई वरिष्ठ पत्रकारों के साथ एनआरसी मुद्दे पर जमीनी हक़ीक़त जानने के लिए असम गया था | टीम की अध्यक्षता एस आर दारापुरी (पूर्व आईजी, यूपी पुलिस) ने की थी। वरिष्ठ पत्रकार अमित सेनगुप्ता, तारिक अनवर,मनीषा भल्ला,अविनाश कुमार और हसनुल बन्ना भी टीम का हिस्सा थे | वही उनका कहना है की फैक्ट फाइंडिंग टीम के सामने एनआरसी मुद्दे पर भेदभाव, मानवाधिकारों के उल्लंघन, न्यायिक उत्तरदायित्व की कमी के कई मामलों सामने आए हैं | राज्य में अवैध तरीके से रहने वाले लोगों की पहचान कर उनको वापस भेजने के मकसद से सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर एनआरसी- 1951 को अपडेट करने का काम चल रहा है, इसके तहत 24 मार्च,1971 से पहले बांग्लादेश से यहां आए लोगों को स्थानीय नागरिक माना जाएगा | बांग्लाभाषी मुसलमानों और हिंदुओं के लिए खासतौर पर भारतीय नागरिकता साबित करनी ज़रूरी है , लेकिन अल्पसंख्यक समुदाय का आरोप है कि मुसलमानों के साथ और बंगाली भाषी हिंदुओं के साथ जानबूझकर भेदभाव के चलते उन्हें बांग्लादेशी करार दिया जा रहा है | इसके तहत 30 लाख लोगों पर नागरिकता की तलवार लटक रही है.|

उन्होंने बताया की आंकड़ों के अनुसार असम में 67 फीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे रह रहे हैं। जनता को एनआरसी के नोटिस नहीं मिले या वक़्त पर नहीं मिले. इस वजह से वह अपने दस्तावेज जुटाकर फॉरनर्स ट्रिब्यूनल में पेश नहीं हो सके| इसका नतीजा यह रहा कि इन लोगों को विदेशी करार कर दिया गया | लाखों की तादाद में डी वोटर हुए लोग अपने दस्तावेज लिए घूम रहे हैं , जब वह वोट डालने गए या गिरफ्तार हुए तब उन्हें पता लगा कि उन्हें ‘डी वोटर’ कर दिया गया है | कई मामलों में एनआरसी का तर्क है कि उसने इंटरनेट के ज़रिये जनता को वक़्त पर नोटिस भेजे हैं लेकिन जहां इंटरनेट की पहुंच और लिटरेसी बेहद सीमित है , उस असम में डिजिटल माध्यम से एनआरसी द्वारा नोटिस भेजना कितना जायज़ है कहा नहीं जा सकता। कई लोगों को नोटिस तक नहीं मिल पाया और आज वो जेल में हैं।

उनका आरोप है की हज़ारों की संख्या में लोग अब भी खौफ के साए में जी रहे हैं। राजनीतिक पार्टियों खासकर भाजपा-आरएसएस के दबाव के चलते एनआरसी के ज़मीनी काम में न केवल धांधलियां हो रही हैं बल्कि जनता को प्रताड़ित भी किया जा रहा है। एनआरसी के विचार का असम के अमूमन हर नागरिक ने स्वागत किया. चाहे वो बांग्लाभाषी रहा हो या असमिया. लोगों का मत था कि एक बार यह संपन्न हो जाएगा तो राज्य में भाषा के आधार पर 50 साल से जारी विवाद थम जाएगा। लेकिन ज़मीनी सच्चाई कुछ और कहानी बयान करती है. असम में यह आखिरी पायदान पर खड़े हर उस नागरिक के लिए मौत का सामान साबित हो रहा है, जिसे भारत की नागरिकता साबित करनी है. इस प्रताड़ना की वजह से दो आत्महत्याएं हो भी चुकी हैं. भारतीय नागरिक साबित करने के इस दबाव और तनाव ने कई जानें ले ली हैं।

साथ ही उनका कहना है की असम के उदलगुड़ी ज़िले के निसलामाड़ी गांव के 65 वर्षीय गोपाल दास ने आत्महत्या कर ली। गोपाल दास मज़दूरी किया करते थे और भारतीय नागरिकता साबित करने को लेकर उन्हें बहुत प्रताड़ित किया जा रहा था। कछार ज़िले के 40 वर्षीय हनीफ खान को जब पता लगा कि एनआरसी के पहले ड्राफ्ट में उनका नाम नहीं आया है, वह बांग्लादेशी हैं तो उन्होंने काशीपुर में अपने घर के पास एक पेड़ से लटककर आत्महत्या कर ली। बोंगई गांव ज़िले के अबहर अली को विदेशी बताकर डिटेंशन कैंप में डाल दिया गया। पीछे से मानसिक तनाव के चलते उनकी पत्नी ने आत्महत्या कर ली।

दो जून की रोटी में मसरूफ गरीब, किसान, मज़दूर दस्तावेजों की गहन जानकारी नहीं रखता है | भाजपा और आरएसएस चाहते हैं कि किसी भी तरह एनआरसी विवाद में आ जाए और इसकी निष्पक्ष कारगुज़ारी पर सवालिया निशान लग जाए | अगर असम में एनआरसी के आंकड़े ईमानदारी से आते तो सब दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता , ऐसी स्थिति में भाजपा-आरएसएस असम में जो हिंदुत्व का कार्ड खेलना चाहती हैं, वो नहीं कर पाएंगी. दूसरी तरफ एआईडीयूएफ भी अपना मुस्लिम कार्ड नहीं खेल पाएगा |

वही दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट के वकील फूजैल अयूबी का कहना है की असम समेत पूरे भारत में फॉरनर्स एक्ट-1946 लागू है लेकिन सिटिज़नशिप संशोधित एक्ट-1955 का सेक्शन 6-ए, सिर्फ असम के लिए है | इसके तहत पूर्वी पाकिस्तान या बांग्लादेश से 24 मार्च, 1971 के बाद से गैर कानूनी तरीक़े से आए लोगों को वापस जाना होगा | ट्रिब्यूनल ऑर्डर-1964 के तहत असम में फॉरनर्स ट्रिब्यूनल का गठन किया गया है | इस वक़्त यहां 100 फॉरनर्स ट्रिब्यूनल हैं, फॉरनर्स एक्ट के सेक्शन 9 के अनुसार असम में अगर किसी भी नागरिक की नागरिकता पर शक़ है तो उसे खुद साबित करना होगा कि वह भारत का नागरिक है | यह राज्य की कोई ज़िम्मेदारी नहीं है | इस वक्त फॉरनर्स ट्रिब्यूनल में इस तरह के तीन लाख केस लंबित है , वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार असम में 34 फीसदी मुसलमान आबादी है और 1951 में यह 24 फीसदी थी. असमी भाषा बोलने वाले 48.3 फीसदी हैं और बांग्ला बोलने वाले 24 फीसदी हैं. देखने में आया है कि एनआरसी की तरफ से लोगों को नागरिकता साबित करने के लिए जो नोटिस आम लोगों को भेजे गए वह बहुतों को या तो मिले नहीं या फिर बहुत देर से मिले, जब वक्त निकल चुका था. इसी आधार पर एनआरसी ने अपनी आधी-अधूरी सूची फॉरनर्स ट्रिब्यूनल को भेज दी. ऐसे में जिन भी लोगों ने किसी कारणवश नोटिस का जवाब नहीं भेजा, या हाजिरी नहीं लगाई, उन्हें फॉरनर्स ट्रिब्यूनल ने एक्स पार्टी जजमेंट देकर विदेशी करार दे दिया. क्योंकि जिसे नोटिस भेजा गया उस तक तो नोटिस पहुंचा ही नहीं था.

एनआरसी में नाम दर्ज कराने के लिए 3.20 करोड़ के लोगों में 48 लाख नागरिक ग्राम पंचायत सचिव के प्रमाण पत्र के आधार पर दावा कर रहे हैं जिनमें अधिकतर औरते ही हैं। 26 मार्च 2018 को असम विधानसभा में पूछे गए एक सवाल के जबाव के मुताबिक असम के इन छह डिटेंशन सेंटर्स में विदेशी महिलाओं की संख्या इस प्रकार है। गोआलपाड़ा – 253, कोकराझार – 160, सिलचर – 91, जोरहाट – 120, डिबड़ूगढ़- 48, तेजपुर – 279 है. इस वक्त फारेनर्स ट्रिब्यूनल में इस तरह के तीन लाख केस लंबित है।

यूनाइटेड अगेंस्ट हेट की फैक्ट फाइंडिंग संस्था का कहना है कि इसमें कोई शक नहीं है कि एनआरसी का होना बहुत ज़रूरी है , लेकिन निचले स्तर पर इसके काम से लोग प्रताड़ित महसूस कर रहे हैं | किसी के लिए भी नागरिकता जीवन मरण का सवाल होती है , लेकिन यहां लोगों को पता ही नहीं कि करना क्या है, जाना कहां है, क्या दस्तावेज देने हैं, नोटिस का जवाब कैसे देना है आदि. दो जून की रोटी में मसरूफ गरीब, किसान, मज़दूर दस्तावेजों की गहन जानकारी नहीं रखता है |

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