महिलाओं का उत्थान ..चिन्ताएँ और समाधान
Ten News Network
By डॉ शिप्रा शिल्पी (कोलोन जर्मनी)
बड़ा विकट विमर्श, घोर चिंता पूरे विश्व मे गोष्ठी पर गोष्ठी।
आश्चर्य है लोग मानते है, स्वयं ऐसे विषयों पर भाग लेने वाली महिलाएं भी कि नारी का पतन हो चुका है क्योकि मेरी बाल बुद्धि कहती है उत्थान उसी का होता है जिसका पतन हो चुका हो।खैर।।किसी से कोई विरोध नही कभी कभी कुछ शब्द मन स्वीकार नही कर पाता बस इतना ही।
कुछ लिखा है जरूर पढियेगा………
विगत 8 मार्च को सम्पूर्ण विश्व में अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस की धूम रही। नारी की चिंतनीय दशा, उसके उत्थान, पतन शिक्षा, शोषण आदि अनेक विषयों पर अनेकोनेक गोष्ठियां, संवाद, वृतचित्र, वाद- विवाद, कवि सम्मलेन किये गए, किन्तु सहज ही मेरे मन मे एक प्रश्न कौंध गया कि कहा जाता है उत्थान उसी का किया जाता है जिसका पतन हो चुका हो,
तो अब प्रश्न ये है कि क्या महिलाओं का पतन हो चुका है? पर आप कहेगे, नहीं ! नारी तो पूज्य है, क्योकि जिन महिलाओं की हम बात कर रहे , वो हमारे घर में, हमारे समाज मे, हमारे ह्रदय में माँ, बहन, बेटी, पत्नी ,दोस्त, सहकर्मी के रूप मे हर क्षण जीवन को सुखद बनाने के लिए प्रयास रत है। बल्कि ये कहना ज्यादा उचित होगा की युग युगान्तर से महिलाये समाज में, जीवन मे अपनी भूमिका को बखूबी निभाती आ रही है ।
जहाँ तक विषय उत्थान का है तो वो प्रयास महिलाओं के जीवन को श्रेष्ठ से श्रेष्ठतर बनाने के लिए युगों से किया जा रहा है, परंतु ये उत्थान शैक्षिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनितिक, स्वास्थ्य, जागरूकता, शोषण, उत्तपीड़न, सामाजिक कुरीतियों आदि की दिशा मे निरंतर किया जा रहा है। अनेको राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्वयंसेवी संस्थाये, सरकार समय -समय पर नियम, क़ानून और महिला उत्थान के कार्यक्रम चला कर उपरोक्त विषयों पर बहुउपयोगी श्लाघनीय कार्य कर रहे है और भविष्य मे भी करते रहेगे ।

पर पुनः प्रश्न उठता है इतने सारे सद्प्रयासों के परिणाम हमें क्यों नहीं दिख रहे? क्यों हर वर्ष हम महिलाओ के उत्थान के लिए चिंतित दिखाई देते है? क्यों आज भी नारी की अस्मत तार तार हो रही है ? क्यों कन्या भ्रूण हत्याओं मे कमी नहीं आ रही? क्यों आज भी अधिकतर बच्चियां शिक्षा से वंचित है? क्यों आज भी महिलाओ का बाहर निकलना, काम करना , आधुनिक परिधान पहनना उनके चरित्र का निर्धारण कर देता है? क्यों आज भी समाज के तथाकथित संस्कारों के ठेकेदार भक्षक बनकर नारी के अस्तित्व को निगलते जा रहे है ,उसके एक सामान्य इंसान होने के अधिकार को भी नकार रहे है ? क्यों ससुराल में मानसिक यंत्रणाओं से तंग आकर आएशाये आत्महत्या कर रही है और जो मरती नही वो जला दी जाती है कभी तेज़ाब से कभी शब्दों से तो कभी आग से!! क्यों अस्पताल के बाहर एक 3 साल की बच्ची खुले पेट बिना इलाज के तड़प तड़प के दम तोड़ रही है ? क्यों महानगरों के कई इलाकों में बाल वेश्यावृत्ति, यौन उत्तपीडन चंद रुपयों के लिए हो रहा है?
इन प्रश्नो का कोई अंत नहीं जैसे कुत्सित, घृणित, विकृत विचारो का, सोच का ।
सच तो ये है नारी की इस दशा के लिए मात्र पुरुष नहीं बल्कि वो “सोच ” जिम्मेदार है, जो स्वयं नारियों और पुरुषों मे समान रूप से विद्यमान है। जनम के साथ ही बच्चे को बच्चा नहीं लड़का और लड़की के रूप मे देखा जाने लगता है और बांधा जाता है उन्हें सीमाओ मे रूढ़िगत परम्पराओं मे और फिर घर की देहरी से ही प्रारम्भ होता है नारी के पतन का उत्थान।
मैं ये नहीं कह रही कि नियम, आदर्श, संस्कार और मर्यादाओ को जानना, उनका पालन करना गलत है और ये भी नहीं कह रही की शैक्षिक, आर्थिक, सामाजिक सहायता देना गलत है और इस तथ्य से भी अनजान नही हूँ कि नारी हो या पुरुष उसके अपने कुछ स्वाभाविक गुण होते है जो ईश्वर उन्हें देता है पर एक दूसरे की सोच पर , व्यक्तिव पर , शरीर पर आधिपत्य जताना, क्यों हम अपने घरों में बेटा बेटी तैयार करते है, सामान्य इंसान क्यों नही तैयार करते जबकि यदि चाकू से उँगली कट जाए तो खून तो बेटा हो या बेटी दोनो को ही लाल निकलता है, पर यकीनन कुछ छोटे छोटे प्रयास इन समस्याओं का निदान जरूर बन सकते है।
मैंने अपने बच्चे के साथ कुछ वर्ष पूर्व एक शुरुवात की थी बचपन से ही उसे स्वावलंबी बनाने की। इसका लाभ ये हुआ एक तो वो अपने छोटे- छोटे कार्य स्वयं करने लगा, दूसरे पूरी तरह हम पर निर्भर न रहकर,अपने दायित्वों को समझने के साथ साथ हमारी जिम्मेदारियों को कम भी करने लगा। सोने पर सुहागा ये रहा की वो मेरे द्वारा घर मे किये जा रहे कार्यों मे लगे श्रम और मेरी थकान को समझता है, मान करता है, साथ ही पिता की मेहनत और रिश्तों मे एक दूसरे के महत्त्व और दिए जा रहे सम्मान को भी समझने लगा है। मेरी दृष्टि मे जिम्मेदारी उठाना गलत नहीं है पर जिम्मेदारियों को आपस मे मिलजुलकर बाँटना भी गलत नहीं होता । मेरा उद्देश्य बस उसकी इन्ही भावनाओ को जगाना है कि वो इंसान को इंसान समझे।
जब एक बार आप दूसरे की परिस्थिति को अपने ऊपर रखकर सोचते है और स्वयं उस दर्द को महसूस करने लगते है, तब आप कभी किसी को कष्ट नहीं पहुँचा सकते है, अगर ये भाव बचपन से ही मन मे जगा दिया जाए तो नारी ही क्या पुरुष भी सुरक्षित रहेंगे।
घर परिवार मे परिजन जिस प्रकार एक दूसरे से व्यवहार करते है ,वही व्यवहार हमारी भावी पीढ़ी का भविष्य होता है। मैं जानती हूँ समस्या इससे कही ज्यादा विकट है पर कभी तो शुरुआत करनी होगी ।आज मेरा बच्चा जैसे अपनी माँ के समर्पण, त्याग ,श्रम को समझता है मुझे आशा ही नहीं विश्वास है, कल वो अपनी दोस्तों, सहकर्मियों, बहनो व पत्नी के महत्त्व उनकी पीड़ा, ख़ुशी, भावनाओ को समझेगा ।
मैं कोई राजनेता या स्वयं सेवी नहीं पर गर्व है मुझे अपने गृहणी होने पर, नारी होने पर। परेशानियां, कष्ट सबके जीवन मे है पर मैं अपने अबला होने का रोना नही रोती कोशिश करती हूँ समस्याओं को सुलझा सकूँ बिना नकारात्मक हुए।नारी को अपनों के साथ साथ अपने लिए भी जीना होगा। ख़ुशी आपके मन के वशीभूत है और आपका मन आपके, इसलिए दायित्वों का निर्वहन करना गलत नहीं पर अपने मन का करना भी आवश्यक है, सम्मान मे झुकना गलत नहीं, पर कोई डरा कर झुकाये तो आवाज उठाना जरूरी है। समझना होगा हमें अपने इंसान होने के महत्त्व को। दूसरों से मान की अपेक्षा से पहले एक नारी को दूसरी नारी को मान देना होगा ।स्वयं के आत्म सम्मान का मान रखना होगा। छोटे छोटे प्रयास निश्चय ही आपके जीवन को बेहतर बनाएंगे।
अधिकारों की बात करने से ही अधिकार नहीं मिलते, नारी हो या पुरुष दोनों को ही स्वयं को उस योग्य बनाना होता है। बात बराबरी के अधिकारों की नहीं, इंसान को इंसान समझने की है। नारी या पुरुष का अंतर करने से, उत्थान के कोई भी प्रयास कभी सफल नहीं हो सकते। ये अंतर तो सर्व विदित है, ईश्वर प्रदत्त है, समझना ये है की ये एक दूसरे के पूरक है और इस पूर्णता को समझने के बीज हमें अपने घर मे ही बोने होगे।
विगत मे जो हुआ उसे बदलने का प्रयास किया जा सकता है पर भविष्य आज भी हमारे हाथ मे है मैंने तो शुरुआत कर दी है अब आपकी बारी है ……