मेडिकल के ऑल इंडिया कोटे की सीटों में ओबीसी आरक्षण शून्य , रामाशंकर कुशवाहा ने उठाई आवाज

Rohit Sharma

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नई दिल्ली :– मेडिकल की ऑल इंडिया कोटा की यूजी व पीजी पाठ्यक्रम की सीटों में ओबीसी को आरक्षण नहीं मिलने के मुद्दे ने तूल पकड़ लिया है। वही इस मामले में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने अब केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर इस मामले पर 15 दिन के भीतर जवाब तलब किया है।

यहीं नहीं आयोग ने मेडिकल प्रवेश के इस ऑल इंडिया कोटे की सीटों में ओबीसी आरक्षण शून्य होने के मामले की संविधान के आर्टिकल 338 बी के तहत जांच भी प्रारम्भ की है।

आयोग ने नोटिस में लेख किया है कि समय सीमा में उत्तर न मिलने की दशा में भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण सचिव को आयोग व्यक्तिगत तौर पर उपस्थित होने का समन भी जारी करेगा। वर्ष 2008 से अखिल भारतीय अपाक्स भी इस मामले को प्रमुखता से उठा रहा है।

राज्य सरकारों के मेडिकल कॉलेजों के यूजी प्रवेश के 15 फीसदी ऑल इण्डिया कोटे की 10,000 सीटों व पीजी प्रवेश के 50 फीसदी ऑल इंडिया कोटे की 8,000 सीटों में आरक्षण मिलने की बांट जोह रहा है, क्योंकि अभी इन सीटों में ओबीसी आरक्षण शून्य है।

वही इस मामले में ‘वी द सबल्टर्न’ के संयोजक रामाशंकर कुशवाहा ने टेन न्यूज़ को बताया कि बड़ी आश्चर्य की बात है कि मेडिकल की ऑल इंडिया कोटा की यूजी व पीजी पाठ्यक्रम की सीटों में ओबीसी को आरक्षण नहीं मिला , खासबात यह है कि 3 साल में 10 हज़ार सीटें खाली रही है ।

उन्होंने कहा कि शिक्षा खासकर उच्च शिक्षा में शोषितों की व्यापक हिस्सेदारी समतामूलक समाज की स्थापना में निर्णायक सिद्ध हो सकता है।किन्तु जातिवादी मानसिकता वाले लोग इसमें तिकड़म करके वंचितों की हकमारी करने का कोई मौका नहीं छोड़ते।

ताजा मामला मेडिकल पीजी कोर्सों (एमडी/एमएस/एमडीएस/डिप्लोमा) में नीट के माध्यम से चल रहे दाखिले में पहले की तरह इस वर्ष (2020) भी पिछड़ी जातियों के छात्र-छात्राओं को आल इंडिया कोटा में राज्यों के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण से वंचित कर दिया गया है।

उन्होंने कहा कि दाखिले में मिलने कुल सीटों को दो हिस्सों में बाँट दिया जाता है। आधी सीटों पर राज्य सरकार के नियमों के तहत दाखिला होता है और आधी पर केंद्र सरकार के नियमों के तहत। केंद्र सरकार के तहत होने वाले दाखिले में ओबीसी को 27% आरक्षण मिलता है। लेकिन राज्य सरकारें राज्य के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में ओबीसी को आरक्षण से वंचित करने का आधार संविधान का आर्टिकल 15(5) को बताती हैं जिसके तहत शिक्षा में ओबीसी आरक्षण केंद्र सरकार की शिक्षण संस्थाओं पर लागू होता है।

आश्चर्य की बात यह है कि वही राज्य एससी/एसटी और ईडब्ल्यूएस को केंद्र के नियमानुसार आरक्षण दे रहे हैं , लेकिन ओबीसी को नहीं देते। यह दोहरा मापदंड आरक्षण के नियमों के साथ-साथ संवैधानिक प्रावधान के भी खिलाफ है। 2017 से लेकर 20 21 तक पीजी मेडिकल (एम डी / एम एस ) में 27062 सीटों पर दाखिला हुआ है जिसमें 21092 (77.93%) प्रतिशत दाखिला सामान्य वर्ग का है। यही हाल पीजी डेंटल (एम डी एस ), यूजी डेंटल (बी डी एस ) यूजी मेडिकल (एम बी बी एस) का भी है।

रामाशंकर कुशवाहा ने कहा कि संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार पचास प्रतिशत सीटें SC/ST/OBC तथा पचास प्रतिशत सीटें सामान्य वर्ग को मिलनी चाहिए किन्तु यहाँ सामान्य वर्ग को प्रत्येक वर्ष 77 प्रतिशत से ज्यादा मिल रही हैं। यह आंकड़ें केवल चार साल के हैं। ओबीसी आरक्षण 2007 से लागू हैं। 2007 से पहले जब ओबीसी आरक्षण नहीं था तो राज्य की सीटों पर ओबीसी आरक्षण था। इस धांधली से हजारों हजार ओबीसी जातियों के छात्र/छात्राओं को डॉक्टर/विशेषज्ञ बनने से रोक दिया जाता है।

उन्होंने कहा कि बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था राष्ट्र निर्माण का प्रमुख अवयव है। देश की बड़ी आबादी गाँवों में निवास करती है। ग्रामीण इलाके में डॉक्टर सेवा देना नहीं चाहते हैं। कोरोना महामारी ने एक समावेशी स्वास्थ्य व्यवस्था की जरूरत को गंभीरता से रेखांकित किया है। समावेशी स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए केवल इतना ही जरूरी नहीं है कि स्वास्थ्य सेवा गरीब लोगों के पहुँच के भीतर हो बल्कि इसके लिए यह भी जरूरी है कि नीचले तबकों से आनेवाले डॉक्टरों की अच्छी भागीदारी भी हो।

रामाशंकर कुशवाहा ने कहा कि शोषित समाज के लोगों को मेडिकल पढ़ाई से वंचित करने का अर्थ स्वास्थ्य सेवाओं को देश की विशाल गरीब और पिछड़ी आबादी से दूर रखना होगा। जरुरत है इस व्यवस्था का विरोध करने की , वरना यह अन्याय होता रहेगा।

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