आत्मनिर्भरता का गौरव पथ

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प्रोफेसर भगवती प्रकाश, कुलपति, गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय

विश्व की सर्वाधिक कृषि-योग्य भूमि, सर्वोच्च युवा जनसंख्या और सर्वाधिक सूक्ष्म व लघु उद्योगों से युक्त भारत का आर्थिक स्वावलम्बन के पथ पर अग्रसर होना अत्यन्त महत्वपूर्ण है। देश में उपलब्ध जल संसाधनों के अनुकूलतम उपयोगों से हम अपनी 16 करोड हैक्टर कृषि योग्य भूमि के सिंचित क्षेत्रफल को 7 करोड़ से बढाकर 14 करोड़ हैक्टर कर विश्व की दो तिहाई जनसंख्या की खाद्य आपूर्ति कर विश्व की खाद्य महाशक्ति बन सकते हैं। विश्व की।तीसरी विशालतम तकनीकी जनशक्ति के बल पर आज चीन से विश्व की विमुखता के बाद भारत विश्व का ओद्योगिक उत्पादन केन्द्र बनने में भी समर्थ है। उच्च आयातों व विदेशी निवेशकों के कारण, आज चाहे वर्ल्ड मैन्यूफेक्चरिंग में चीन के 28 प्रतिशत अंश की तुलना में भारत का अंश मात्र 3 प्रतिशत ही होने पर भी स्वदेशी व स्वावलम्बन से यह सम्भव है।

स्वावलम्बन का आधार – स्वदेशी
अपनी आवष्यकता की वस्तुओं व सेवाओं के क्रय में ‘स्वदेशी’ अर्थात ‘मेड बाई भारत’ वस्तुओं व ब्राण्डों को प्राथमिकता देकर हम देश में उत्पादन, रोजगार, आय व सकल घरेलू उत्पाद में द्रवुत वृद्धि कर सकते हैं। इससे सरकार के राजस्व में वृद्धि और देश के व्यापार घाटे पर भी नियन्त्रण सम्भव हो सकेगा। इससे रूपया सुदृढ़ होगा, उन्नत प्रोधोगिकी का विकास होगा और समावेशी विकास का लक्ष्य प्राप्त हो सकेगा।

जापान का वैश्विक जनसंख्या में मात्र 1.6 प्रतिशत अश होने पर भी प्रबल स्वदेशी व स्वावलम्बन की भावना के कारण वर्ल्ड मेन्यूफेक्चरिंग में उसका अश विगत 3 दशकों में निरन्तर 7 से 12 प्रतिशत तक रहा है। जापान में केवल 4 प्रतिशत विदेशी कारों व 96 प्रतिशत स्वदेशी अर्थात मेड बाई जापान कारें बिकती हैं। खाद्य पदार्थों से लेकर टीवी, मोबाइल सहित सभी वस्तुओं व सेवाओं के सम्बन्ध में है, जो चाहे कितनी ही महंगी हों या उनकी गुणवत्ता में कितना ही अन्तर रहे। भारत में आज केवल 13 प्रतिशत कारें ही स्वदेशी या ‘मेड बाई भारत’ हैं। रतन टाटा व महिन्द्रा की और शेष 87 प्रतिशत कारें विदेशे कम्पनियों की बिकती हैं। ये विदेशी कम्पनियाँ उनके पुर्जों को बाहर से लाकर देश में एसेम्बल करती है।

स्वदेशी अर्थात ‘मेड बाई इण्डिया’:
आज शीतल पेय, साबुन, पेस्ट व कपडे धोने का पाउडर व जुतों के पाॅलिश से लेकर मोबाइल फोन, टीवी, फ्रिज आदि की 70 से 100 प्रतिषत उत्पादन क्षमता पर विदेशी कम्पनियों का स्वामित्व है। इन अनेक उत्पादों पर मेड इन इण्डिया लिखा रहता है और विदेशी कम्पनियाँ जिन्हें ‘मेक इन इण्डिया’ के नाम पर यहाँ एसेम्बल मात्र करती हैं। उनके भी अधिकांश आदाय व पुर्जे विदेशी में बनने से अधिकांश रोजगार सृजन व मूल्य संवर्द्धन विदेशों में ही होता है। नब्बे के दशक में आयात व विदेशी निवेश प्रोत्साहन की नीतियों के प्रारम्भ किये जाने से पहले देश में शत प्रतिषत टी.वी, फ्रिज, शीतल पेय, सीमेण्ट, स्वचालित वाहन आदि अधिकांश वस्तुएँ पूर्ण ‘स्वदेशी’ या ‘मेड बाई भारत’ श्रेणी की ही थीं। वैश्वीकरण के अन्तर्गत आयात उदारीकरण और विदेशी निवेश प्रोत्साहन के चलते भारतीय उद्यम रूग्ण या बन्द होते गये अथवा उन्हें विदेशी कम्पनियों द्वारा अधिग्रहीत कर लिया गया। उदाहरण के लिए भारतीय रेफ्रीजिरेटर कम्पनी केल्वीनेटर को अमेरिकी कम्पनी व्हर्लपूल द्वारा, बिरला सम ूह की आल्विन को व एक
अन्य कम्पनी महाराजा इण्टरनेशनल को स्वीडिन कम्पनी इलेक्टेलक्स द्वारा अधिग्रहीत किये जाने के पूर्व सारे रेफ्रीजिरेटर स्वदेशी थे। टाटा समूह के सीमेंट संयत्रों, ए.सी.सी, रेमण्ड के सीमेण्ट संयत्रों, जुआरी सीमेण्ट, गुजरात अम्बुजा आदि का यूरोपीय कम्पनियों लाफार्ज,
हाल्सिम आदि द्वारा अधिग्रहण के पूर्व सारी सीमेण्ट भारतीयों द्वारा ही बनाई जाती थी। विगत 29 वर्षों में बोतलबन्द पानी, शीतल पेय, आइसक्रीम, साबुन, सौंदर्य प्रसाधन से लेकर फ्रिज व सीमेण्ट पर्यन्त देश के उत्पादन संयत्रों के विदेशी स्वामित्व में जाने के क्रम में प्रश्न यह
उभरता है कि देश के उद्योग व्यापार वाणिज्य व कृषि के ऊपर किसका नियन्त्रण रहेगा? कृषि पर भी दृष्टि डालें तो अमेरिकी कम्पनी देश में ठेको पर गेहूं की खेती करवा कर अपना नेचर फ्रेश आटा बाजार में बेचती है या यूरोपीयन कम्पनी लीवर अन्नपूर्णा आटा, टमाटर सास, आलू के चिप्स आदि बाजार में लाने के लिए ठेकों पर खेती कराती है। ऐसे खेत खलिहान से रसोई घर तक की खाद्य आपूत्र्ति श्रंखला के विदेशी कम्पनियों के नियन्त्रण में जाने जैसे अनेक उदाहरण हैं। इसलिये स्वावलम्बन का प्रथम मंत्र है-स्वदेशी और उसमें मात्र मेड इन इण्डिया नहीं वरन्-‘‘मेड बाई इण्डिया या मेड बाई भारत’’

चीन पर निर्भरता समाप्ति:
आज चीन से हमारा इलेक्ट्राॅनिक सामानों का आयात लगभग 45 प्रतिशत है, मशीनरी का आयात 35 प्रतिशत, कार्बनिक रसायन 40 प्रतिशत, मोटर वाहन स्पेयर्स और उर्वरक प्रत्येक 25 प्रतिशत, सक्रिय फार्मा स्युटिकल सामग्री 65-70 प्रतिशत और मोबाइल के साज सामान 90
प्रतिशत व सोलर पेनल भी 90 प्रतिशत चीन से आते हैं। भारत को विविध उत्पादों व औद्योगिक आदायों की आपूर्ति में चीन पर निर्भरता समाप्त करनी होगी। इसके अतिरिक्त मेक इन इण्डिया के नाम पर मोबाइल फोन आदि के पुर्जे बाहर से लाकर 5-10 प्रतिशत मूल्य संवर्द्धन देश में कर चीनी या अन्य विदेशी कम्पनियाँ मेड इन इण्डिया लेबल लगा देती हैं। उससे स्वावलम्बन सम्भव नहीं है। उसका अधिकांश लाभ विदेश में जाता है।

वैश्विक आपूर्ति श्रंखलाओं का आगमन – उचित प्राथमिकताएँ आवश्यकः
वैश्विक औद्योगिक आपूर्ति श्रंखलाओं के चीन से बाहर निकलने का दौर चल पडने से चिकित्सा उपकरण, खाद्य प्रसंस्करण, वस्त्रोद्योगों, चर्मोद्योगों व आॅटो पार्टस उत्पादक आदि बड़ी संख्या में भारत में आने को इच्छुक है। हमारे हिताहित को दृष्टिगत रखकर विचार करें तो चिकित्सा उपकरणों इलेक्ट्रानिक्स उत्पादों आदि क्षेत्रों में जहाँ भारत में आवश्यक उत्पादन क्षमताओं का अभाव है, विदेशी कम्पनियों का आना तो वांछित है। लेकिन, वस्त्रोद्योग, चर्मोद्ययोग, खाद्य प्रसंस्करण आदि के क्षेत्रों में सुस्थापित उद्यम हैं। जहाँ देश में अनेक और वे भारी मात्रा में रोजगार सुलभ करा रहे हैं, व वहाँ विदेशी उत्पादकों के आने से उद्यम बन्दी भी हो सकती है। आज देश में वस्त्रोद्ययोग में ही 1.20 करोड़ लोग मध्यम आकार वृहदाकार के उद्ययोगों में नियोजित हैं और इससे भी अधिक 1.50 करोड़ लोग घरों से संचालित गारमेण्ट उत्पादन इकाईयों में लगे है। इस सम्बन्ध में उचित चयन व घरेलू श्रंखलाओं का सशक्तिकरण भी आवश्यक है। विदेशी प्रत्यक्ष निवेशक के स्थान पर घर घरेलू निवेश को प्राथमिकता व राजकोषीय समर्थ न:
वर्तमान रिवर्स ग्लोबलाइजेन अर्थात वैश्वीकरण के प्रतीपगमन के दौर में देश में ग्रीन फील्ड मेन्युफेक्चरिंग के क्षेत्र में स्वदेशी उद्यमों का प्रवेश और विशेष कर रोजगार प्रधान सूक्ष्म व लघु उद्यमों सहित अर्थात स्वदेशी कम्पनियों द्वारा नवीन उत्पादन क्षमताओं का विकास कर ‘मेड बाई भारत’ उत्पादों व ब्राण्डों का प्रवर्तन देन हित में सिद्ध होगा। देश में पहले से ही सीमा से कहीं अधिक विदेशी प्रत्यक्ष निवेश हो जाने व भारत के बाहर हमारा निवेश अर्थात आउटबाउन्ड डायरेक्ट इनवेस्टमेंट कम होने से पहले ही 40 अरब डालर से अधिक इनवेस्टमेण्ट इनकम डेफिसिट है। लगभग 160 अरब डाॅलर के विदेश व्यापार घाटे के साथ 40 अरब डाॅलर से अधिक का निवेश आय का घाटा जुड़ जाने से ही रूपये की कीमत मे गिरावट आती है। आर्थिक सुधारों के प्रारम्भ में 1991 में रूपये का मूल्य 18 रूपये तुल्य एक डाॅलर था वह अब गिरकर 75 रूपये बराबर एक डालर रह गया है। इसलिये घरेलू निवेश संवर्द्धन हेतु मौद्रिक तरलता के साथ-साथ राजकोषीय सहायोग भी आवश्यक है।

उदीयमान उद्ययोगों के लिए उचित पारिस्थितिकी तंत्र व राजकोषीय सहायता पैकेज:
देश आज 2जी, 3जी, 4जी व 5जी टेलीकाम टैक्नालाॅजी, बायोमैडिकल उपकरण, आर्टिफिसियल इण्टेलिजेन्स आधारित निदान व चिकित्सा उत्पाद से लैकर अधिकांश कम्प्यूटर हार्डवेयर, मैटोरेल, रोलिंग स्टाॅक, सुपर फास्ट टेन, कम्प्यूटर आपरेटिंग सिस्टम, डाटा विश्लेषण साफटवेयर प्रोडक्ट्स, आवश्यक रसायन, एक्टिव फार्मा स्यूटिकल इनग्रेडिएण्ट्स, उन्नत इलेक्ट्राॅनिक उपकरण के लिए चीनी व विदेशी कम्पनियों पर आश्रित है, उसमे भी स्वावलम्बन लाना होगा। वर्तमान चतुर्थ औद्योगिक क्रान्ति के दौर में बैट्री चलित या हाइडेंजन फ्यूल सेल आधारित कारें, बस व अन्य वाहन कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निदान चिकित्सा सम्बन्धी सेवा उत्पाद, मशीन लर्निंग, डीप लर्निंग, 3डी प्रिंटिंग, ब्लाक चेन, आई ओटी, बुलेट ट्रेन, जैव प्रोद्ययोगिक आधारित औषधियाँ अन्य उत्पाद, पाँचवी पीढ़ी के लड़ाकू विमान आदि के लिए भी देश में अनुसन्धान, उत्पाद विकास व उनके उत्पादन की क्षमता विकसित करनी होगी। इस हेतु उदार राजकाओषीय सहायता व अनुदान की भी आवश्यकता रहेगी।

समेकित ग्राम विकास और कृषि का खाद्य तंत्र से एकीकरण:
समावेशी विकास के लिए हमें विकेन्द्रित नियोजन व समेकित ग्राम विकास के लिए ग्राम संकुलो विकेंन्द्रित उत्पादन, ग्रामीण उद्योगों के विकास, ग्रामीण लघु उद्योग सकुलो के विकास, कृषक उत्पादन संगठनों, फार्मर प्रोड्यूसर आॅर्गनाइजेशन के निर्मा ण करने के साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में ग्रामोद्ययोग व कृषि को देशज व अन्तर्राष्ट्रीय खाद्य श्रंखलाओं से जोड़ना होगा। तहसील स्तर पर कितना पशु धन है? कितनी जनशक्ति है? किस प्रकार के प्राकृतिक संसाधन हैं, कौन सी कृषि उपजें होती हैं? किस प्रकार के कुटीर, सुक्ष्म, लघु व बडे उद्योग सम्भव हैं? इन सूचनाओं के माध्यम से विकेन्द्रित नियोजन, पूर्वक जीरो टैक्नालाॅजी व न्यून टेक्नाॅलाॅजी वाले उद्योग गाँवों में ले जाने होंगे।

स्वावलम्बन हेतु राजकोषीय सहायता का औचित्य:
स्वावलम्बन हेतु देश औद्योगिक विकास के लिए उदार राजकोषीय सहायता भी परम आवश्यक है। ऐसे उद्योग जिनमें हम आयातों पर आधारित हैं, घरेलू प्रोद्योगिकी का अभाव है, हमारी प्रोद्ययोगिकी पुरानी व अप्रचलित हो गयी है अथवा जिन क्षेत्रों में उच्च जोखिम व उच्च पूंजी निवेश की आवश्यकता होने से निजी उद्यमी सम्पूर्ण जोखिम उठाकर आवश्यक निवेश करने में सक्षम नहीं है। उन सभी क्षेत्रों में राजकोषीय अनुदान व सहयोग, संवर्द्धन, इक्विटी कैपीटल भागीदारी, सह-अनुसन्धान, प्रोद्योगिकी विकास, उद्योग सहायता संघों के संवर्द्धन आदि के लिये उदार राजकोषीय सहायता देना आवश्यक है। आज उन्नत प्रोद्योगिकी में निवेश व राजकोषीय सहायता के अभाव में वर्ल्डशिप बिल्डिंग में भारत का अंश 1 प्रतिशत से भी न्यून
है। जबकि कोरिया का अंश 24 प्रतिशत है। इसी प्रकार भारत की तुलना में, सिंगापुर व चीन के उच्च प्रोद्योगिकी निर्यात क्रमश: 7.5 गुने व 30 गुने है।

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