क्या वैदिक आर्य गोमांस खाते थे? एक जिग्यासा और उत्तर—श्रवण शर्मा

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आजकल  गो हत्या  पर रोक और गोमांस के संबध मैं काफी चर्चा है. यह हमारी सामान्य और सर्व विदित  मान्यता रही है कि हिन्दू धर्म मै गाय को पवित्र पशु एवं गोमांस  भक्षण का पूर्ण  निषेध रहा है .इस मान्यता  के विपरीत हाल मै मैंने कुछ ऐसे लेख देखे है जिनमे यह कहा गया है कि वैदिक काल में आर्यों अर्थात हमारे पूर्वजों में गोमांस प्रचलित और यज्ञों  मै गाय सहित पशुओं  की बली दी जाती  थी .इसके लिए मुख्य रूप से मार्क्सवादी इतिहासकारों को उधृत  किया गया है.मैंने जिग्यासावश इस सम्बन्ध में तथ्यों और मूल वैदिक सन्दर्भों को जानने का प्रयास किया.आर्यों के याज्ञिक इतिहास में दो काल स्पष्ट दिखई पड़ते हैं, एक में जो शुद्ध संहिता काल है , उसमे पशु हिंसा नहीं पाई जाती है और दूसरे मै पशु हिंसा  के उल्लेख हैं जो  ब्राह्मण अथवा सूत्र काल है.यज्ञों में अध्वर्यु की नियुक्ति  होती है , जो अहिन्सा के लिए  ही है, अध्वर  का अर्थ  है अहिंसा.वेदों में गाय के अनेक नाम हैं , जिनमें से एक नाम `अघ्न्या`भी है, जिसका अर्थ है` किसी भी   स्थिति  मै न मारने  योग्य`वेदों  में उल्लेख है कि किसी भी स्थिति मै मांस जलाने वालीअग्नि अर्थात चिताग्नि का प्रवेश यज्ञ मै नहीं होना चाहिए..ऋग्वेद.१०.१६.९.वेद प्रत्येक प्रकार की पशु हिंसाका निषेध करते हैं.पशून पाहि, गां मा हिंसी.  ——-मा हिन्स्यातसर्वभूतानि …यजुर्वेद.अथर्ववेद में लिखा है कि गाय का,क्षीर , दधि और  घृत  ही खाने योग्य है ,मॉस  नहीं.          ऋग्वेद,१०.८७.१६  में कहता  है कि जो  मनुष्य का ,घोड़े का और गाय का मांस खाता वह दंडनीय  है.प्रशन यह है कि इतनी स्पष्ट वैदिक आज्ञाओं और व्यवस्थाओं  के बाद भी उत्तर काल में याज्ञिक हिंसा का प्रचलन कैसे हुआ? इसके अनेक संदर्भ मिलते हैं.महाभारत के शांतिपर्व अध्याय ३३६ मै कथा है कि `अज` शब्द  को लेकर देवताओं और ऋषियों के मध्य विवाद हुआ , देवता का कहते  थे कि अज का अर्थ बकरा है जबकि ऋषियों का कथन था कि अज शब्द का अर्थ बीज है . देवताओं के अनुसार पशु  मांस से यज्ञ होना चाहिए  , जबिक ऋषियों के अनुसार अन्न से.दोनों राजा वसु  के पास गये और उसने छाग से ही यज्ञ किए जाने की वयवस्था  दी और तब से पशु  यज्ञ होने  लगे.उससे पूर्व राजा वसु स्वयं यज्ञ किया था जिसमें पशुघात नहीं हुआ था.पशु हिंसा उत्तरकालीन  है इसका प्रमाण सुत्त्निपात्त  में भगवान  बुद्ध  द्वारा ब्राह्मणों को दिए गये उपदेश मै समाहित है,`पूर्व में अन्न ,बल ,कांति और सुख देने वाले गाय की हिंसा  नहीं  की जाती थी परन्तु आज् घडों दूध देने वाली गाय को यज्ञ  में मारते हैं.चारवाक  और महाभारत  में भी उल्लेख की पशु यज्ञ नवीन है और दुष्टों द्वारा लोलुपता मै प्रारंभ किया गया है.यह भी उल्लेखनीय है की  वेदों में गौ और अश्व आदि शब्दों के अनेक अर्थ है और प्रसंग तथा निरुक्त के अनुसार ही उन्हें समझना आवश्यक है.बाद के समय मै  मूल संहिता मै परिवर्तन करने और ब्राह्मण ग्रंथों मै वेदों से भिन्न बातें जोड़ कर मूल वेदिक धर्म मै परिवर्तन कर यज्ञों में पशु हिंसा को को शामिल किया गया जिसका महाभारत तथा अन्य स्थानों पर गंभीर विरोध है आये अंत में बुद्ध ने कथित ब्राह्मण धर्म का विरोध करते हुए पशु हिंसा के विरुद्ध आवाज़ उठाई और सनातन धर्म में पशु हिंसा बंद कर दी गयी.यह हिदू धर्म के क्रमिक रूप से आगे बढ़ने औए इवोल्व होने के कारण है.अव्ध्ये! ते रूपाय नमः. वेद की इस प्रेरणा का ले कर गाय का  महत्व बढ़ता गया.मध्य काल मै गोरक्षा किस प्रकार हिदू धर्मं का भाग बन गयी  इसके कुछ नमूने निम्न है.
The Mughal emperor Babar ruled in 1526 that killing cows was forbidden.[39] In his Wasiyyat namd-i-majchfi (Persian: secret testament‎‎) to his son and successor, Humayun, dated First Jamadi-ul-Awwal 935 Hijri (11 January 1529), Babur wrote,
The realm of Hindustan is full of diverse creeds. Praise be to God, the Righteous, the Glorious, the Highest, that He had granted unto you the Empire of it. It is but proper that you, with heart cleansed of all religious bigotry, should dispense justice according to the tenets of each community. And in particular refrain from the sacrifice of cow, for that way lies the conquest of the hearts of the people of Hindustan; and the subjects of the realm will, through royal favour, be devoted to you”.मुग़ल काल में मोटें तौर पर शासकों ने हिन्दुओं की भावना का सम्मान किया.
Later Mughal emperors Akbar (reign: 1556 – 1605), Jahangir (1605 – 1627), and Ahmad Shah (1748 – 1754), it is said, imposed selective restricted bans on cow slaughter.[42][43]
Cow slaughter was not prohibited during the reign of Aurangzeb. In 1645, soon after being appointed Governor of Gujarat, Aurangzeb converted the Chintamani Parshvanath Jain temple near Sarashpur, Gujarat into a mosque, and ordered that a cow be slaughtered in the shrine.[44][45] The building was later restored to the Hindus, by order of Aurangzeb’s father, then emperorShah Jahan.

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